Pithori Amavasya 2026 Date: भाद्रपद महीने की अमावस्या को कुशग्रहणी अमावस्या कहा जाता है. इसे पिठोरी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है. पितरों के तर्पण और उनकी शांति के लिए यह अमावस्या बेहद खास मानी जाती है. इस दिन कुशा का इस्तेमाल करना भी बहुत शुभ माना गया है.
वेद-पुराणों में पितरों के तर्पण और पूजा-पाठ में कुशा का विशेष महत्व बताया गया है. मान्यता है कि कुशग्रहणी अमावस्या के दिन कुशा तोड़कर रखी जा सकती है और फिर पूरे साल इसका इस्तेमाल पूजा, तर्पण और धार्मिक कार्यों में किया जाता है. तो आइए जानते हैं कि कब मनाई जाएगी पिठौरी अमावस्या.
पिठोरी अमावस्या 2026 डेट (Pithori Amavasya 2026 Tithi)
द्रिक पंचांग के अनुसार, पिठोरी अमावस्या की तिथि 10 सितंबर को सुबह 10 बजकर 33 मिनट पर शुरू होगी और तिथि का समापन 11 सितंबर को सुबह 8 बजकर 56 मिनट पर होगा. यानी पिठोरी अमावस्या 10 सितंबर को ही मनाई जाएगी.
पिठोरी अमावस्या 2026 स्नान-दान का मुहूर्त (Pithori Amavasya 2026 Snan Daan Muhurat)
पिठोरी अमावस्या पर स्नान दान का मुहूर्त सुबह 4 बजकर 31 मिनट से लेकर सुबह 5 बजकर 17 मिनट तक रहेगा.
पिठोरी अमावस्या पूजन विधि (Pithori Amavasya Pujan Vidhi)
पिठोरी अमावस्या के दिन माताएं अपनी संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखकर सूर्योदय से पूर्व स्नान करें और संकल्प लें. पूजा के लिए चावल के आटे (पीठ) से 64 योगिनियों और सप्तमातृकाओं की प्रतीकात्मक मूर्तियां बनाई जाती हैं, जिन्हें लाल वस्त्र बिछी चौकी पर स्थापित कर गणेश पूजन के बाद रोली, हल्दी, कुमकुम, दूर्वा, लाल पुष्प और सुहाग सामग्री अर्पित की जाती है. तत्पश्चात आटे के बने पकवान व खीर-पूरी का भोग लगाकर पिठोरी अमावस्या की कथा सुनी जाती है, और अंत में आरती के बाद वरिष्ठ महिलाओं व ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र व दक्षिणा देकर संतान की रक्षा का आशीर्वाद लिया जाता है.
पूजा और साधना में क्यों इस्तेमाल होती है कुशा?
कुशा का इस्तेमाल पूजा-पाठ के साथ-साथ आसन के रूप में भी किया जाता है. मान्यता है कि जब कोई व्यक्ति मंत्र जाप या साधना करता है, तो उसके शरीर में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है. कुशा का आसन इस ऊर्जा को धरती में जाने से रोकने में मदद करता है. इसलिए मंत्र साधना और धार्मिक अनुष्ठानों में कुशा के आसन को खास माना गया है.
भगवान विष्णु से जुड़ा है कुशा का संबंध
कुशा को इतना पवित्र क्यों माना जाता है, इसके पीछे एक पौराणिक कथा भी बताई जाती है. मत्स्य पुराण के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लिया था, तब उनके शरीर से कुछ बाल टूटकर धरती पर गिर गए थे. इन्हीं बालों से कुशा की उत्पत्ति मानी जाती है. इसी वजह से कुशा को बेहद पवित्र माना गया और इसे धार्मिक कार्यों में इस्तेमाल करने की परंपरा शुरू हुई.
पीपल के पेड़ पर चढ़ाएं जल
कुशग्रहणी अमावस्या के दिन पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाना भी शुभ माना जाता है. पितरों की शांति के लिए पीपल के नीचे दीपक जलाने की परंपरा भी कई जगह देखने को मिलती है. अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में शनि या राहु से जुड़े दोष बताए गए हैं, तो वह अपनी श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार इस दिन शिवजी का जलाभिषेक भी कर सकता है.
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