इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 17 अक्टूबर 1983 को फतेहपुर, उत्तर प्रदेश में घटित सामूहिक दुष्कर्म के 43‑वर्षीय मामले में तीन आरोपियों की दोषसिद्धि निरस्त कर उन्हें बरी कर दिया। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों में गंभीर विरोधाभास और प्राथमिकी दाखिल करने में छह दिन की देरी ने उन्हें संदेह से परे साबित नहीं किया।
सर्वप्रथम, अदालत ने बताया कि यौन अपराध के मामलों में पीड़िता की गवाही को महत्वपूर्ण माना जाता है, परन्तु उसकी विश्वसनीयता और परिस्थितियों के अनुरूप होने का आकलन किये बिना उसे अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। इस परिप्रेक्ष्य में, फतेहपुर के दो पीड़िताओं के बयानों में विरोधाभास, घटना के समय पहने गए कपड़ों का पुलिस को न सौंपना, और चिकित्सा परीक्षण में ताज़ी चोटों की अनुपस्थिति ने अभियोजन पक्ष की कहानी को कमजोर कर दिया।
न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद की पीठ ने पाया कि प्राथमिकी दाखिल करने में छह दिन की देरी के बावजूद, अभियोजन पक्ष ने इस देरी का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया। साथ ही, पीड़िताओं के बयान में घटनाक्रम, आरोपियों की भूमिका और परिवार के सदस्यों को कैसे रोका गया, इस पर महत्वपूर्ण विसंगतियाँ थीं। इन तथ्यों को देखते हुए, अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष ने आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।
मामले का पृष्ठभूमि इस प्रकार है: 17 अक्टूबर 1983 की रात, फतेहपुर के बिंदकी क्षेत्र में दो महिलाओं पर सामूहिक दुष्कर्म का आरोप लगाया गया था। एक पीड़िता दूसरी की भाभी और दूसरी उसकी ननद थी। चार नामजद आरोपी दो अन्य लोगों के साथ उनके घर में घुसे, परिवार के सदस्यों को धमकाया और घटना को अंजाम दिया। 23 अक्टूबर 1983 को ही इस मामले में प्राथमिकी दर्ज कराई गई।
निचली अदालत ने 22 अप्रैल 1985 को आरोपियों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई। इसके बाद दोषसिद्धि के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की गई। अपील के दौरान बचाव पक्ष ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों पर सवाल उठाए और प्राथमिकी दाखिल करने में हुई देरी का उल्लेख किया।
अदालत ने पाया कि प्रारंभिक शिकायत में दो अन्य कथित आरोपियों के नाम का उल्लेख नहीं था, जबकि बाद में उनकी भूमिका बताई गई। पहली पीड़िता ने पूछताछ के दौरान उन दोनों के नाम नहीं बताए थे। दोनों पीड़िताओं के बयानों में घटना के क्रम, आरोपियों की भूमिका और परिवार के सदस्यों को रोके जाने के तरीके पर भी महत्वपूर्ण विसंगतियाँ थीं।
इसके अतिरिक्त, घटना के समय पहने गए कपड़े पुलिस को उपलब्ध नहीं कराए गए। चिकित्सा परीक्षण में दोनों महिलाओं के शरीर पर कोई ताज़ी बाहरी या आंतरिक चोट नहीं मिली। हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल चोट न मिलने या चिकित्सकीय साक्ष्यों से आरोपों की पुष्टि न होने के आधार पर यौन अपराध के आरोप को खारिज नहीं किया जा सकता। इसी तरह, प्राथमिकी दाखिल करने में देरी भी अपने आप में अभियोजन के मामले को समाप्त करने का आधार नहीं है।
इन सभी तथ्यों के आधार पर, अदालत ने निर्णय लिया कि अभियोजन पक्ष की कहानी संदेह से परे साबित नहीं हो सकी। अतः, हाईकोर्ट ने सिराजुल, छोटेलाल और फक्कू की अपील स्वीकार करते हुए उनकी दोषसिद्धि निरस्त कर उन्हें बरी कर दिया।
मोहम्मद अनीस खान, मुख्य आरोपी, की अपील उसकी मृत्यु के कारण 16 मार्च 2026 को समाप्त हो गई थी। इस प्रकार, 1983 की घटना से जुड़े इस पुराने मामले में हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का मूल्यांकन कर तीन आरोपियों को राहत दी।
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