हाईकोर्ट ने एससी‑एसटी एक्ट के तहत एक परिवार को 23 लाख से अधिक मुआवजा देने के बाद दुरुपयोग की सम्भावना पर पूरे उत्तर प्रदेश में जांच का आदेश दिया।
झांसी के विशेष न्यायाधीश (एससी‑एसटी एक्ट) द्वारा 23 जुलाई 2024 को दिये गये फैसले के खिलाफ अरविंद कुमार व दो अन्य तथा संतोष कुमार धोहरे की आपराधिक अपीलों की सुनवाई के दौरान यह पता चला कि एक ही परिवार को 23 लाख से अधिक का मुआवजा दिया गया है।
पहला मामला थाना कोतवाली में आईपीसी की धारा 170, 323, 504, 506 तथा एससी‑एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r), 3(1)(s), 3(2)(va) के तहत दर्ज है। दूसरा मामला थाना सिपरी बाजार में दर्ज केस से संबंधित है। अपीलकर्ताओं का दावा था कि प्रत्येक पीड़ित को 2 लाख रुपये की राहत राशि का प्रस्ताव भेजा गया था, जिसके तहत चार्जशीट दाखिल होने तक 75 प्रतिशत यानी 1 50 000 रुपये मिलने चाहिए थे। परंतु जिला समाज कल्याण अधिकारी ने मनमाने ढंग से केवल 37.5 प्रतिशत यानी 75 000 रुपये ही जारी किए।
न्यायमूर्ति संतोष राय की एकल पीठ ने पाया कि निचली अदालत ने नियम 12(7) की व्याख्या में गलती की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह नियम विशेष न्यायालय को केवल औपचारिकता निभाने वाला निकाय नहीं बनाता, बल्कि उसे यह अधिकार भी देता है कि वह जांच करे कि पीड़ित को समय पर पर्याप्त राहत मिली या नहीं, और यदि नहीं मिली तो बकाया राशि के भुगतान का आदेश दे।
संतोष कुमार धोहरे, जो स्वयं अधिवक्ता हैं, और उनके परिवार के सदस्यों को अब तक कुल 23 36 250 रुपये की राहत राशि मिल चुकी है। लगभग 10 से 12 और मामले जिला स्तरीय समिति के समक्ष लंबित हैं।
हाईकोर्ट ने आदेश पारित किया कि झांसी के जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के साथ मिलकर धोहरे और उनके परिवार द्वारा दर्ज कराए गए मामलों तथा प्राप्त राहत राशि की तीन महीने में निष्पक्ष जांच पूरी करेंगे। यदि योजना के दुरुपयोग की पुष्टि होती है, तो दोषी व्यक्तियों के साथ-साथ जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।
कोर्ट ने एससी‑एसटी एक्ट और नियमावली 1995 के तहत बार‑बार दावा करने वालों के मामलों की प्रदेश व्यापी व्यापक जांच कर एक प्रभावी नियामक तंत्र और निगरानी व्यवस्था विकसित करने का निर्देश दिया। हर जिले के विशेष न्यायाधीश (एससी‑एसटी एक्ट) को सतर्क रहने को कहा गया है कि यह योजना वास्तविक पीड़ितों तक ही सीमित रहे।
दोनों मामलों में झांसी की विशेष अदालत को छह सप्ताह के भीतर आवेदनों पर नए सिरे से निर्णय लेने का आदेश दिया गया, यह तय करते हुए कि पीड़ितों को 1 लाख या 2 लाख रुपये की राहत राशि में से कौन सी दर लागू होगी। यह स्पष्ट किया गया कि यह आदेश दावों के गुण‑दोष पर कोई राय नहीं है, और जांच स्वतंत्र रूप से अपने आधार पर चलेगी।
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि एससी‑एसटी एक्ट के तहत राहत योजना अत्याचार के वास्तविक पीड़ितों के पुनर्वास के लिए एक कल्याणकारी प्रावधान है, और इसकी पवित्रता बनाए रखना जरूरी है।
रजिस्ट्रार जनरल को आदेश दिया गया कि इस फैसले की प्रति दस दिनों के भीतर प्रदेश के सभी जिलों के जिला एवं सत्र न्यायाधीश, जिलाधिकारी, एसएसपी/एसपी, पुलिस आयुक्त, विशेष न्यायाधीश (एससी‑एसटी एक्ट), मुख्य सचिव, गृह विभाग के प्रमुख सचिव और विधि/न्याय विभाग के प्रमुख सचिव को भेजी जाए।
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