Allahabad Highcourt: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) के तहत संविदा पर नियुक्त मल्टी-पर्पज हेल्थ वर्कर (पुरुष) को बड़ी राहत देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि संविदा पर करीब तीन साल काम करने मात्र से कर्मचारियों को सेवा में बने रहने या नियमित नियुक्ति का कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता। न्यायमूर्ति विकास बुधवार ने इस आधार पर अनिकेत पाठक और 139 अन्य समेत संबंधित याचिकाओं को खारिज कर दिया।
मामले में याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति वर्ष 2012-13 में एनआरएचएम के तहत मल्टी-पर्पज हेल्थ वर्कर (पुरुष) के रूप में संविदा पर हुई थी। उन्हें छह हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय दिया जाता था। भारत सरकार ने वर्ष 2011 में 235 पिछड़े और अधिक बीमारी वाले जिलों में ऐसे स्वास्थ्य कर्मियों की तीन वर्ष के लिए संविदा नियुक्ति को मंजूरी दी थी। योजना के लिए केंद्र सरकार ने तीन वर्षों में क्रमश: 85, 75 और 65 प्रतिशत वित्तीय सहायता देने और शेष खर्च राज्य सरकार द्वारा वहन करने की व्यवस्था की थी। साथ ही राज्य सरकार को तीन वर्ष के भीतर आवश्यक पद सृजित कर उन्हें नियमित आधार पर भरने की सलाह दी गई थी।
वर्ष 2014 में मिशन निदेशक ने आदेश जारी कर स्पष्ट किया था कि एमपीडब्ल्यू की संविदा 31 मार्च 2014 के बाद आगे न बढ़ाई जाए। हालांकि बाद में नौ जुलाई और 14 जुलाई 2014 के पत्रों में 30 सितंबर 2014 तक उन्हें बनाए रखने के संबंध में निर्देश दिए गए थे। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने वर्ष 2015 में अंतरिम आदेश देते हुए याचिकाकर्ताओं को 31 मार्च 2014 के बाद भी काम करने देने और संतोषजनक कार्य एवं आचरण की स्थिति में वेतन देने का निर्देश दिया था। राज्य की ओर से इस आदेश का पालन नहीं किए जाने पर अवमानना की कार्यवाही भी हुई। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी अंतरिम आदेश से जुड़े मामले में हाईकोर्ट को मुख्य याचिकाओं की शीघ्र सुनवाई कर अंतिम निर्णय करने का रास्ता साफ किया था।
अंतिम सुनवाई में याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि स्वास्थ्य एवं स्वच्छता से जुड़ा उनका काम निरंतर प्रकृति का है और राज्य में स्वास्थ्य कर्मियों के पद खाली हैं। उनका कहना था कि नियमित भर्ती होने तक उन्हें उन्हीं शर्तों पर काम करने दिया जाना चाहिए। उन्होंने नियमित नियुक्ति की मांग नहीं बल्कि अंतरिम तौर पर संविदा पर काम जारी रखने की मांग की। राज्य सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति पूरी तरह एक योजना के तहत संविदा पर हुई थी। योजना समाप्त हो चुकी है और अब नियमों के तहत नियमित चयन किया जाना है। इसलिए संविदा कर्मचारियों को योजना समाप्त होने के बाद भी सेवा में बने रहने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति किसी स्थायी पद पर नहीं हुई थी। नियुक्ति संविदा पर थी और अनुबंध में एक माह के नोटिस पर सेवा समाप्त करने का प्रावधान भी था। इसलिए वे नियमित कर्मचारी के समान अधिकार का दावाग नहीं कर सकते।
कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी योजना को जारी रखना या बंद करना नियोक्ता के अधिकार क्षेत्र में है, जब तक उसमें मनमानी या भेदभाव न हो। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल कुछ पदों के रिक्त होने या अधिकारियों की ओर से पूर्व में किए गए पत्राचार के आधार पर अदालत सरकार को नियुक्ति करने का आदेश नहीं दे सकती। पदों को भरने में प्रशासनिक व्यवहार्यता और अन्य पहलुओं पर विचार करना सरकार के क्षेत्राधिकार में है। चूंकि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि उन्हें सेवा में बने रहने का कोई कानूनी अधिकार प्राप्त है, इसलिए उन्हें मांगी गई राहत नहीं दी जा सकती। अंततः हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के पक्ष में ऐसा कोई कानूनी अधिकार नहीं है, जिसके आधार पर उन्हें मल्टी-पर्पज हेल्थ वर्कर के रूप में जारी रखने का आदेश दिया जा सके। इसी निष्कर्ष के साथ सभी संबंधित रिट याचिकाएं खारिज कर दी गईं। आदेश एक सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति विकास बुधवार ने सुनाया।
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