High Court Akriti Chaudhary NSA Case Order: उत्तर प्रदेश के नोएडा में न्यूनतम वेतन, ओवरटाइम और साप्ताहिक अवकाश जैसे मुद्दों को लेकर इस साल अप्रैल में हुए मजदूर आंदोलन से जुड़े मामले में गिरफ्तार छात्रा आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत को रद्द करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बेहद कड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने इस मामले ने दो सितंबर को फैसला सुनाया था, आदेश की प्रति सोमवार को हाई की वेबसाइट पर उपलब्ध कराई गई। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मजदूरों के आंदोलन से जुड़े मामले में छात्रा आकृति चौधरी की गिरफ्तारी पर कहा कि एनएसए के तहत हिरासत असाधारण कार्रवाई है। इसे जमानत मिलने की स्थिति में किसी व्यक्ति को जेल में बनाए रखने के विकल्प के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। केवल आरोप, अनुमान, पूर्वाग्रह और अटकलों के आधार पर किसी नागरिक की स्वतंत्रता नहीं छीनी जा सकती।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने कहा कि हिरासत के आधार केवल जिलाधिकारी की राय नहीं हो सकते। उस राय के समर्थन में ठोस सामग्री होनी चाहिए। ऐसी सामग्री के अभाव में हिरासत का आदेश मनमाना माना जाएगा, क्योंकि इससे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिक के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का सीधा उल्लंघन होता है। कोर्ट ने कहा कि आकृति चौधरी ने मजदूरों के अधिकारों के समर्थन में लोगों से एकत्र होने और शांतिपूर्ण आंदोलन में शामिल होने की अपील की थी। रिकॉर्ड में ऐसा कोई संदेश या वीडियो नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि उन्होंने लोगों को हिंसा, आगजनी या सार्वजनिक एवं निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए उकसाया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण ढंग से अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना और सार्वजनिक स्थान पर एकत्र होना संविधान द्वारा संरक्षित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है।
पीठ ने यह भी कहा कि शांतिपूर्ण आंदोलन में बाद में कुछ शरारती तत्व हिंसा कर दें तो पूरे आंदोलन को हिंसक बताना उचित नहीं है। राज्य को बड़े जमावड़ों में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सक्षम पुलिस व्यवस्था करनी चाहिए और घटनाओं की वीडियोग्राफी कर जवाबदेही तय करनी चाहिए। अदालत ने आंदोलन को समाज के दबाव को बाहर निकालने वाले 'सुरक्षा वाल्व' की संज्ञा देते हुए कहा कि लोकतांत्रिक समाज में असहमति और आंदोलन के लिए जगह होना जरूरी है।
कोर्ट ने गौतमबुद्धनगर के जिलाधिकारी की भूमिका पर भी गंभीर नाराजगी जताई। कहा कि पुलिस की रिपोर्ट महज आरोपों पर आधारित थी और कोई विश्वसनीय सामग्री नहीं थी, फिर भी जिलाधिकारी ने रिकॉर्ड की गहराई से जांच किए बिना एनएसए जैसी कठोर कार्रवाई कर दी। अदालत ने इसे सत्ता का लापरवाहीपूर्ण और मनमाना इस्तेमाल माना। अदालत ने कहा कि नौकरशाही और पुलिस के पास व्यापक शक्तियां हैं, लेकिन अधिक शक्ति के साथ अधिक जिम्मेदारी भी आती है। अधिकारियों की निष्ठा संविधान और जनता के प्रति होनी चाहिए, न कि राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति। नागरिकों के मौलिक अधिकारों को पर्याप्त कारण और विधि की उचित प्रक्रिया के बिना कुचला गया तो अदालत ऐसे मामलों में कठोर आदेश पारित करने से पीछे नहीं हटेगी।
हाईकोर्ट ने एनएसए के तहत हिरासत का आदेश और हिरासत के आधार निरस्त करते हुए आकृति चौधरी को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया, यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित न हों। साथ ही संविधान के अनुच्छेद 21 के उल्लंघन के लिए पांच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। यह राशि गौतमबुद्धनगर के जिलाधिकारी समेत जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से वसूलने और उनके सेवा अभिलेख में अदालत की नाराजगी दर्ज करने का भी निर्देश दिया गया।
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