RSS के सुप्रीमो मोहन भागवत ब्रिटेन दौरे पर हैं और लंदन में आयोजित "Celebration Oneness" कार्यक्रम में भाग ले रहे हैं। उन्होंने हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्र, सेवा और समाज के भविष्य पर अपने विचार साझा किए।
उन्होंने कहा कि संघ के काम का आधार नफ़रत नहीं, बल्कि शुद्ध सात्त्विक प्रेम है। संघ का लक्ष्य लोगों को जोड़ना, सभी में अपनापन पैदा करना है।
भागवत ने बताया कि अपनापन ही संघ को समझने की मुख्य कुंजी है। हिंदू सोच में परिवार, समाज, मानवता और प्रकृति एक‑दूसरे से जुड़े हैं। हिंदू केवल पूजा करने वाला नहीं, वह प्रकृति से भी प्रेम करता है और उसे जीतने की कोशिश नहीं करता; इंसान स्वयं प्रकृति का हिस्सा है।
विकास का दायरा केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं होना चाहिए। व्यक्ति, समाज, मानवता और प्रकृति की समान प्रगति आवश्यक है। यदि केवल व्यक्ति को महत्व दिया गया तो समाज कमजोर होगा, और यदि केवल समाज को प्राथमिकता मिली तो व्यक्तिगत स्वतंत्रता खतरे में पड़ सकती है। इसलिए संतुलन बनाये रखना ज़रूरी है।
उन्होंने कहा, "यदि मुझे संघ को परिभाषित करने वाला एकमात्र सिद्धांत चुनना पड़े, तो वह ‘अपनापन’ है – सभी के लिए शुद्ध सात्त्विक प्रेम। यही हिंदू की पारम्परिक प्रकृति है।"
हिंदू विचार में दुनिया को एक इकाई के रूप में देखा जाता है, जिससे विविधताओं को स्वीकार करने की भावना उत्पन्न होती है। विविधता स्वाभाविक है, लेकिन उसके पीछे एकता को देखना आवश्यक है। उनका संदेश है कि जो चीज़ लोगों को जोड़ती है, उस पर अधिक ज़ोर देना चाहिए।
जब हिंदू राष्ट्र और हिंदुत्व के बारे में पूछा गया, तो भागवत ने कहा कि हिंदू केवल धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि एक प्रकृति‑संबंधी सोच है। भारत में विभिन्न विचारधाराओं के लोग रहे हैं, और हिंदू सोच विभिन्न रास्तों को स्वीकार कर सकती है।
उन्होंने राष्ट्र और ‘नेशन’ में अंतर बताया। नेशन अक्सर एक राज्य और उसकी प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा होता है, जबकि ‘राष्ट्र’ का आधार साझा चेतना और उद्देश्य होता है, न कि केवल शासन।
भागवत ने कहा कि हिंदू राष्ट्र का लक्ष्य यह दिखाना है कि विविधता स्वाभाविक है और एकता वास्तविकता। भारत के इतिहास में कई राजशासन बदलते रहे, पर सामाजिक‑राष्ट्रीय चेतना बनी रही। भारत की प्रगति का मतलब किसी अन्य देश के खिलाफ जाना नहीं, बल्कि विश्व को शांति, समृद्धि और मानवता के लिए लाभ पहुंचाना है।
ब्रिटेन में रहने वाले हिंदुओं को उन्होंने कहा कि वे अपनी कर्मभूमि के प्रति वफादार रहें, साथ ही ब्रिटेन के प्रति भी ईमानदार रहें। "Think globally, act locally" की भावना के साथ वे भारत की सेवा कर सकते हैं, पर अपनी मातृभूमि की जिम्मेदारी नहीं भूलें।
उन्होंने युवाओं में भरोसा जताया, कहा कि नई पीढ़ी में दुनिया को बेहतर बनाने की इच्छा है। युवाओं को उद्देश्य देना, अनुभव साझा करना चाहिए, लेकिन उनके रास्ते पर ज़बरदस्ती नहीं थोपनी चाहिए। उन्हें अपना मार्ग खोजने का अवसर मिलना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां देश और विश्व के लिए बेहतर काम कर सकें।
अंत में उन्होंने कहा कि सेवा केवल उपकार नहीं, बल्कि स्वयं को सौभाग्य मानना है। अच्छी सेवा वह है जिसमें मदद मिलने वाला व्यक्ति भविष्य में दूसरों की मदद करने वाला बन जाए।
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