उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों में शिक्षा के अधिकार (RTE) के तहत किस प्राइवेट स्कूल में किस-किस का एडमिशन हुआ, यह पूरी जानकारी इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मांग ली है। कोर्ट ने राज्य सरकार को आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को निजी सहायता प्राप्त और गैर-मान्यता प्राप्त और गैर-सहायता प्राप्त प्राथमिक स्कूलों में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा (आरटीई) उपलब्ध कराने का पूरा जिलावार ब्योरा पेश करने का निर्देश दिया है।
यह आदेश न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चाहे कोई स्कूल सीबीएसई, सीआईएससीई या किसी अन्य बोर्ड से संबद्ध हो, राज्य के भीतर प्रारंभिक शिक्षा देने वाले सभी स्कूल राज्य सरकार के नियमों और आरटीई अधिनियम के दायित्वों से बंधे हैं। किसी अन्य बोर्ड से संबद्धता उन्हें इन नियमों से कोई छूट नहीं देती।
बेसिक शिक्षा अधिकारियों और जिला विद्यालय निरीक्षकों के माध्यम से प्रदेश के सभी निजी स्कूलों की जिलावार सूची, जिसमें जूनियर बेसिक, जूनियर हाईस्कूल, हाईस्कूल और इंटरमीडिएट स्तर पर नामांकित छात्रों की संख्या अलग-अलग दर्ज हो। यह भी जानकारी हो कि पिछले पांच शैक्षणिक सत्रों में स्कूलवार आरटीई के तहत वास्तव में कितने बच्चों को प्रवेश दिया गया। साथ ही सक्षम प्राधिकारी द्वारा आवंटित ऐसे कितने बच्चे थे जिन्हें स्कूलों ने दाखिला देने से मना किया या जिनका प्रवेश नहीं हो सका, साथ ही इसके कारण क्या थे।
इसके अलावा कैपिटेशन फीस वसूलने या गैर-कानूनी स्क्रीनिंग प्रक्रिया अपनाने को लेकर मिली शिकायतों की संख्या और उन पर सरकार द्वारा की गई कार्रवाई का विवरण भी पेश किया जाए। कोर्ट ने सीबीएसई और सीआईएससीई संबद्ध स्कूलों को निर्देश दिया है कि बीएसए और डीआईओएस को आवश्यक डेटा जुटाने में पूरा सहयोग करें।
कोर्ट ने यह आदेश सेंट जॉन्स स्कूल बभनौटी, पचवाल द्वारा प्रदेश सरकार एवं अन्य के विरुद्ध दाखिल याचिका पर सुनवाई के बाद दिया है। याचिका में निजी स्कूल की ओर से निशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम के प्रावधानों के लागू होने को लेकर आपत्तियां जताई गई थीं। इस दौरान यह सवाल उठा कि गैर-सहायता प्राप्त निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर और सामाजिक रूप से वंचित वर्ग के बच्चों (दिव्यांग बच्चों सहित) को कक्षा एक में प्रवेश और मुफ्त प्रारंभिक शिक्षा किस प्रकार सुनिश्चित की जा रही है। कोर्ट के संज्ञान में यह तथ्य लाया गया कि राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त या एनओसी प्राप्त कई निजी स्कूल ऐसे बच्चों को प्रवेश देने और अपनी निर्धारित फीस और अन्य शुल्क माफ करने में आनाकानी/अनिच्छा दिखा रहे हैं। इसी विवाद और आरोपों की जमीनी हकीकत का पता लगाने के लिए कोर्ट ने राज्य सरकार से पूरे प्रदेश के निजी स्कूलों में आरटीई दाखिलों, अस्वीकृत आवेदनों और शिकायतों का विस्तृत डेटा हलफनामे पर मांगा है। आदेश की कॉपी प्रमुख सचिव (बेसिक शिक्षा), बेसिक व माध्यमिक शिक्षा निदेशकों और संबंधित बोर्डों को अनुपालन के लिए भेजी गई है।
Comments ()
Be the first to share your perspective on this story!