पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस हफ्ते ममता बनर्जी के गुट के लिए कई झटके सामने आए। चुनाव आयोग ने ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल‑घास’ चिन्ह को अस्थायी रूप से फ्रीज कर दिया, फिर नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव में गुट की प्रत्याशी संचिता प्रधान डे ने अचानक अपना नामांकन वापस ले लिया।
नामांकन वापसी के कुछ ही घंटे बाद ममता ने कांग्रेस के मिलन प्रधान को समर्थन दिया, लेकिन उनके समर्थन के बाद ही मिलन प्रधान को एक पुराने हत्या मामले में गिरफ्तार कर लिया गया। इस घटना ने राजनीतिक माहौल को और गरम कर दिया।
इन घटनाओं के बीच ममता गुट ने सुप्रीम कोर्ट के सामने दो अलग‑अलग याचिकाएँ दायर कीं। पहली याचिका में चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश को चुनौती दी गई है, जिसके तहत पार्टी के मूल नाम‑सिंबल पर रोक लगाई गई थी। गुट का तर्क है कि आयोग ने पार्टी के बहुसंख्यक कार्यकर्ताओं और संगठनात्मक ढांचे को नजरअंदाज कर बागी गुट के दावों को प्राथमिकता दी है।
दूसरी याचिका में पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष द्वारा बागी विधायकों की अयोग्यता पर निर्णय लेने में देरी को लेकर सवाल उठाए गए हैं। ममता गुट का कहना है कि जब तक इन विधायकों की सदस्यता पर फैसला नहीं हो जाता, तब तक उनका नाम‑सिंबल या पार्टी का बंटवारा करना संवैधानिक रूप से गलत है।
सुप्रीम कोर्ट इन याचिकाओं की सुनवाई 21 सितंबर 2026 को कर सकता है।
विधायी स्तर पर भी विवाद जारी है। ममता गुट के वरिष्ठ नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने SC में याचिका दायर कर विधानसभा में नेता‑प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी सहित दस बागी विधायकों को दल‑बदल कानून के तहत अयोग्य ठहराने की मांग की है। विधानसभा सचिवालय ने इन दस विधायकों को नोटिस जारी कर एक हफ्ते में जवाब माँगा है।
नेता‑प्रतिपक्ष पद को लेकर भी दोनों पक्षों में टकराव है। ममता खेमे ने चट्टोपाध्याय को अपना उम्मीदवार बनाया था, जबकि विधानसभा अध्यक्ष ने ऋतब्रत बनर्जी को मान्यता दी। इस फैसले को ममता गुट ने कोलकाता हाईकोर्ट में चुनौती दी, पर हाईकोर्ट ने अगस्त में तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया।
नंदीग्राम उपचुनाव की तैयारी के बीच यह सब और भी जटिल हो गया। 6 अक्टूबर को निर्धारित मतदान के लिए गुट ने नया नाम ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और नया चिन्ह ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ प्राप्त किया था, पर उम्मीदवार की कमी ने उन्हें कांग्रेस की ओर मुड़ने पर मजबूर किया। मिलन प्रधान की गिरफ्तारी के बाद कांग्रेस ने इस कदम को सत्तारूढ़ भाजपा का राजनीतिक प्रतिशोध कहा, जबकि भाजपा ने इसे सामान्य कानूनी प्रक्रिया बताया।
ममता बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी, जिसका पहचान चिन्ह ‘जोड़ा फूल’ रहा है। अब दोनों गुट इस ही नाम‑सिंबल को लेकर कानूनी जंग में उलझे हुए हैं, जबकि चुनाव आयोग ने अस्थायी तौर पर अलग‑अलग नाम और प्रतीक प्रदान किए हैं, जो अक्टूबर के नंदीग्राम और रेजीनगर उपचुनाव में उपयोग होंगे।
अब ममता गुट को सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार है—एक ओर पार्टी की मूल पहचान वापस पाने के लिए, और दूसरी ओर बागी विधायकों की अयोग्यता प्रक्रिया के नतीजे के लिए।
Comments ()
Be the first to share your perspective on this story!