सुप्रीम कोर्ट ने 10 अक्टूबर को जंतर‑मंतर के पास हुए प्रदर्शन से जुड़े मामले में रविवार को विशेष सुनवाई की और 9 अक्टूबर के अपने आदेश के उल्लंघन के आरोपों पर संबंधित अधिकारियों को कारण‑बताओ नोटिस तथा अवमानना नोटिस जारी किया। कोर्ट ने पूछा कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों नहीं शुरू की गई और अधिकारियों को हलफनामा दाखिल कर जवाब देने को कहा।
वकीलों ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में लिया, कुछ पर बल प्रयोग किया, मेट्रो सेवाएं बंद कर दीं, इंटरनेट पर रोक लगाई और लोगों की आवाज़ाही बाधित की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून के तहत केवल आवश्यक प्रतिबंध ही लग सकते हैं, पूरी तरह से बंदी नहीं हो सकती।
कोर्ट ने पहले निर्देश दिया था कि सुरक्षा के नाम पर मेट्रो और रेल सेवाओं को पूरी तरह बंद नहीं किया जाए। अधिकारियों को 57 मेट्रो स्टेशनों को बंद करने के फैसले पर पुनर्विचार, निर्णय सार्वजनिक करने और नई ट्रैफ़िक एडवाइसरी जारी करने का आदेश दिया गया था।
आज की सुनवाई में कोर्ट ने अधिकारियों से पूछा कि प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लेने का कारण क्या था और किन परिस्थितियों में यह कार्रवाई हुई। साथ ही बंदी‑प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं पर भी जवाब मांगा गया।
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि दिल्ली में मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य रूप से चलती रहें। सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने की आशंका होने पर ही न्यूनतम प्रतिबंध लग सकते हैं। अधिकारियों को मेट्रो स्टेशनों को बंद करने के फैसले पर दोबारा विचार करने, बदलाव की जानकारी जनता तक पहुंचाने और मंगलवार तक अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया।
सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि 303 मेट्रो स्टेशनों में से 45 पर एंट्री‑एग्जिट सीमित किया गया था, बाकी सभी स्टेशन सामान्य रूप से खुले थे और 7,981 ट्रेन ट्रिप्स संचालित हुईं। जस्टिस बागची ने DMRC से उन स्टेशनों का नक्शा मांगा जहाँ प्रतिबंध लागू था, और यह समझना चाहा कि 57 से घटाकर 45 क्यों कर दिए गए।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि दिल्ली में इंटरनेट सेवाएं बाधित नहीं की जाएँ; केवल कानूनी प्रावधानों के तहत ही रोक लगाई जा सकती है। साथ ही ट्रैफ़िक की आवाज़ाही बहाल रखी जाए और बैरिकेडिंग की तुरंत समीक्षा की जाए।
सुप्रीम कोर्ट परिसर के बाहर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 का बोर्ड लगा हुआ था, जिससे वकीलों को कोर्ट में प्रवेश में दिक्कत हो रही थी। कोर्ट ने इस बोर्ड को तुरंत हटाने का आदेश दिया और कहा कि न्याय पाने के लिए सभी को अदालत तक पहुंचने में बाधा नहीं होनी चाहिए।
कोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई पर भी जवाब मांगा। वकीलों ने बताया कि प्रदर्शन के दौरान कई लोगों को बल प्रयोग, जबरन बस में बैठाकर दूर ले जाया गया और फोन जब्त किए गए। कोर्ट ने इस मुद्दे पर आगे की सुनवाई का समय तय किया।
वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि प्रदर्शन के दौरान लगभग 7,000 लोगों को हिरासत में लिया गया और आधिकारिक आंकड़े जारी करने की मांग की। सॉलिसिटर जनरल ने कुछ दावों पर आपत्ति जताई और कहा कि सभी याचिकाओं को सरकार ने नहीं भेजा था।
कपिल सिब्बल ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार का हवाला देते हुए अनुच्छेद 19(1)(a) का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि प्रदर्शन का अधिकार संविधान में है, पर इसे कानून के दायरे में ही प्रयोग किया जा सकता है और प्रतिबंधों की संवैधानिकता का भी परीक्षण होगा।
सुनवाई के दौरान कोर्टरूम में वकीलों और पुलिस अधिकारियों के बीच टकराव हुआ। कुछ वकीलों ने पुलिसकर्मियों के बैठने की जगह पर आपत्ति जताई और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग लिंक की खराबी के कारण 15 मिनट की रोक लगाई गई। फिर सुनवाई कोर्टरूम नंबर 5 में जारी रही।
अगली सुनवाई मंगलवार को निर्धारित की गई। सभी पक्षों को हलफनामे और हस्तक्षेप याचिकाओं की प्रतियां सॉलिसिटर जनरल के कार्यालय में आज ही देनी होगी। कोर्ट ने कहा कि वह अनुच्छेद 32 के तहत मौलिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए बाध्य है और पुलिस की कार्रवाई, हिरासत, फोन जब्ती और प्रतिबंधों से जुड़े मुद्दों पर आगे की सुनवाई होगी।
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