मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के कामकाज को चुनौती देने वाली लगभग तीन दर्जन याचिकाओं पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी। इन याचिकाओं में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की प्रक्रिया, आयोग के निर्णय लेने के तरीके और 2023 के चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून की संवैधानिकता को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच इन मामलों की सुनवाई करेगी। याचिकाओं में दो प्रमुख मुद्दे सामने हैं: पहला, ज्ञानेश कुमार के फैसलों और SIR प्रक्रिया पर; दूसरा, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए 2023 में पास हुए कानून की वैधता पर।
ज्ञानेश कुमार के फैसलों को लेकर विवाद तब तेज़ हुआ जब कई विपक्षी नेताओं और नागरिक समूहों ने आरोप लगाया कि उन्होंने दो अन्य चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—की सहमति के बिना कई अहम निर्णय लिए। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच इन दो आयुक्तों ने मतदाता सूची के प्रबंधन और डेटा के केंद्रीकरण जैसे मुद्दों पर कम से कम 14 लिखित आपत्तियां दर्ज करवाई थीं।
याचिकाओं में फॉर्म‑6 में किए गए बदलाव और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में लाखों मतदाताओं के नाम हटाने को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नाम हटाने की प्रक्रिया में आवश्यक नियमों का पालन नहीं किया गया।
इन आरोपों के जवाब में चुनाव आयोग ने संयुक्त हलफनामे में कहा कि SIR से जुड़े सभी आदेश जून‑2025, अक्टूबर‑2025 और मई‑2026 में तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिये गये थे और फॉर्म‑6 में कोई बदलाव नहीं किया गया है। आयोग ने यह भी बताया कि किसी फाइल पर टिप्पणी या आपत्ति को अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता।
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि कोई सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में जांच आयोग या विशेष जांच दल (SIT) बनाकर SIR प्रक्रिया की पूरी जांच करवाई जाए और इसे तत्काल अवैध घोषित करके रोक लगाई जाए।
दूसरी ओर, कुछ याचिकाओं ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की वैधता को चुनौती दी है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), एनजीओ लोक प्रहरी और कांग्रेस नेता जया ठाकुर ने इस कानून के तहत चयन समिति की संरचना को असंवैधानिक बताया है।
2023 के कानून में मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति से हटा कर एक केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया, जिससे सरकार का बहुमत बन जाता है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे नियुक्ति प्रक्रिया में पक्षपात हो सकता है और उन्होंने मुख्य न्यायाधीश को फिर से समिति में शामिल करने का अनुरोध किया है।
कानून की धारा 16, जो चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कार्यों से जुड़े कुछ मामलों में कानूनी कार्रवाई से सुरक्षा प्रदान करती है, को भी याचिकाकर्ताओं ने चुनौती दी है। उनका तर्क है कि यह प्रावधान आयोग की जवाबदेही को कमजोर कर सकता है।
पहले भी इस कानून पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई थी, जहाँ जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एस.सी. शर्मा की पीठ के बीच राय में अंतर रहा। दोनों जजों की अलग‑अलग राय के बाद मामला पाँच जजों की संविधान पीठ के पास भेजने की सिफारिश की गई थी।
अब अदालत के सामने SIR प्रक्रिया, चुनाव आयोग के निर्णय‑लेने के तरीके और 2023 के चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून से जुड़े प्रश्नों की पूरी सुनवाई होगी, जिसमें याचिकाकर्ताओं की मांगें और चुनाव आयोग का उत्तर दोनों प्रस्तुत किए जाएंगे।
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