सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 2 नवम्बर को दिल्ली‑NCR में ग्रीन पटाखे जलाने को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने दिवाली से पहले 7 नवम्बर और त्यौहार के दिन 8 नवम्बर को तय समय‑सीमा में ही ग्रीन पटाखे जलाने की अनुमति दी। दोनों दिन सुबह 6 से 7 बजे और रात 8 से 10 बजे के बीच ही पटाखे जलाए जा सकेंगे।
जस्टिस एम एम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की बेंच ने यह आदेश दिया। अस्पताल, नर्सिंग होम, प्राथमिक और जिला स्वास्थ्य केंद्र, वृद्धाश्रम और साइलेंस जोन के 300 मीटर के दायरे में पटाखे जलाना प्रतिबंधित रहेगा। इन स्थानों के अलावा शैक्षणिक संस्थानों को भी ‘नो‑क्रैकर जोन’ घोषित किया जाएगा, जहाँ उचित साइनबोर्ड लगाए जाएंगे और सार्वजनिक घोषणा के माध्यम से लोगों को सूचित किया जाएगा।
पिछले हफ्ते की सुनवाई में कोर्ट ने पूरी तरह पटाखों पर प्रतिबंध लगाने से इनकार किया था, यह कहते हुए कि बार‑बार आदेश देना तब तक फायदेमंद नहीं जब तक जमीन पर उनका पालन न हो। बेंच ने कहा कि यह मामला हर जीव से जुड़ा है, अधिकारियों को नियमों को गंभीरता से लेना होगा और उनका कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना होगा। कोर्ट ने लोगों की भावनाओं को समझते हुए कहा कि वह पूरी तरह प्रतिबंध के पक्ष में नहीं है, पर नियमों का पालन अनिवार्य है।
केंद्रीय पक्ष से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि दिल्ली सरकार ने प्रदूषण नियंत्रण के लिए विस्तृत कार्ययोजना तैयार की है, जिसमें पुराने वाहनों पर पाबंदी, निर्माण‑तोड़फोड़ पर रोक और सरकारी दफ्तरों के समय में बदलाव जैसे कदम शामिल हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पटाखों में बेरियम के उपयोग को लेकर आंतरिक चर्चा चल रही है और इसे अंतिम रूप देने के लिए तीन हफ्ते का समय मांगा गया है।
सुनवाई के दौरान बाजार में बिक रहे ग्रीन पटाखों की पहचान को लेकर भी सवाल उठे। एमिकस क्यूरी ने कहा कि पटाखे जलाने से बड़ी मात्रा में हानिकारक कण निकलते हैं, जो फेफड़ों व अन्य अंगों को नुकसान पहुँचा सकते हैं। उन्होंने निर्माताओं और दुकानदारों द्वारा दावे किए गए ‘ग्रीन’ लेबल की जांच के लिए प्रभावी व्यवस्था न होने की चिंता जताई। वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों के बार‑बार उल्लंघन को उजागर करते हुए पटाखों के निर्माण पर रोक लगाने की मांग की।
ग्रीन पटाखे सामान्य पटाखों की तुलना में कम प्रदूषण फैलाते हैं। इन्हें वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) के राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (NEERI) ने विकसित किया है। इनमें लगभग 30 % कम धुआँ और कण निकलते हैं, और बेरियम नाइट्रेट जैसे जहरीले धातु का उपयोग नहीं किया जाता। हालांकि, इनसे भी कुछ मात्रा में प्रदूषण होता है, इसलिए बड़े पैमाने पर उपयोग पर्यावरण के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
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