एलन मस्क की स्पेसएक्स की उपग्रह इंटरनेट सेवा स्टारलिंक ने भारत में 165 देशों में लाइसेंस प्राप्त किया है, फिर भी भारत सरकार ने इसे मंजूरी नहीं दी है। मस्क ने अपनी आपत्तियों में कहा कि सरकार ने सुरक्षा जांच के कारण देरी की है, पर दूरसंचार मंत्रालय ने 8 अक्टूबर को बताया कि यह प्रक्रिया निष्पक्ष और भेदभाव रहित है।
स्टारलिंक ने 2022 में भारत में सेवा शुरू करने की कोशिश शुरू की थी और जून 2025 में उसे दूरसंचार विभाग से सैटेलाइट कम्युनिकेशन सर्विस का लाइसेंस मिला। सितंबर 2025 में ट्रायल के लिए स्पेक्ट्रम दिया गया, पर व्यावसायिक सेवा के लिए सुरक्षा मंजूरी और अन्य प्रक्रियाएँ अभी लंबित हैं।
मंत्रालय ने यह भी कहा कि स्टारलिंक के साथ-साथ जियो सैटेलाइट और एयरटेल की वनवेब भी समान रेगुलेटरी फेज में हैं। 9 अक्टूबर 2026 को दूरसंचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बताया कि स्पेक्ट्रम की कीमत तय करने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है।
भारत सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा किसी भी सरकार का सॉवरेन राइट है और इस पर कोई भी हलचल बर्दाश्त नहीं की जा सकती। इस पृष्ठभूमि में मस्क की आपत्तियाँ सरकार के निर्णय के सामने निरर्थक लगती हैं।
स्टारलिंक की सेवा कैसे काम करती है? यह 550 किमी ऊँचाई पर स्थित छोटे उपग्रहों के नेटवर्क के जरिए इंटरनेट उपलब्ध कराती है। पारंपरिक उपग्रहों के मुकाबले यह कम लेटेंसी के कारण वीडियो कॉलिंग, ऑनलाइन गेमिंग और स्ट्रीमिंग जैसी सेवाओं को बेहतर बनाता है।
स्टारलिंक की खासियत है कि यह मोबाइल टावर या फाइबर केबल पर निर्भर नहीं है। उपयोगकर्ता को एक विशेष डिश और राउटर की जरूरत होती है, जिससे पहाड़ों, दूरदराज के गांवों, समुद्री इलाकों और आपदा प्रभावित क्षेत्रों में भी कनेक्टिविटी मिलती है।
मस्क का दावा है कि इस तकनीक से भारत के दूरदराज के इलाकों में भी बिना केबल बिछाए इंटरनेट सेवा दी जा सकती है। पर यह निर्बाध सप्लाई सुरक्षा के सवाल भी खड़ी करती है, इसलिए सरकार ने धीरे-धीरे कदम बढ़ाया है।
अमेरिका भी सुरक्षा के मामलों में सख्त मानक रखता है। अमेरिकी सरकार ने चीन की दूरसंचार और निगरानी तकनीक पर राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। हुआवेई, जेडटीई, हिकविजन, कास्परस्की और टिकटॉक जैसी कंपनियों पर भी प्रतिबंध हैं।
भारत की सुरक्षा चिंताएँ भी अहम हैं। स्टारलिंक के अलावा भारती समूह से जुड़ी यूटेलसैट वनवेब और रिलायंस समूह की जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस भी मंजूरी की प्रक्रिया से गुजर रही हैं। भारतीय अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना है कि मस्क के नेटवर्क की वैश्विक मौजूदगी के बावजूद भारत अपने सुरक्षा नियमों को प्रभावी ढंग से लागू कर सके।
इस बीच, भारतीय दूरसंचार नीति में PSU, AI, Best XI, IPO, EV, RBI, CEO जैसे प्रमुख शब्दों का प्रयोग होता है, जो इस क्षेत्र के व्यापक और जटिल ढांचे को दर्शाता है। सरकार के निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए तकनीकी उन्नति को संतुलित करना आवश्यक है।
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