यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) ने जनवरी 2026 में नए "Equity Regulations" जारी किए, जिससे कैंपस में जाति‑आधारित भेदभाव को रोकने के लिए 24×7 हेल्पलाइन, Equal Opportunity Centre, Equity Squads और Equity Committee की स्थापना अनिवार्य की गई। इन नियमों की उल्लंघन पर मान्यता रद्द या फंड रोकने जैसी सख्त कार्रवाई की जा सकती थी।
नियमों को लागू होते ही सामान्य वर्ग के संगठनों ने विरोध जताया। उनका मुख्य तर्क था कि रेगुलेशन 3(1)(c) में केवल SC, ST और OBC को ही "caste‑based discrimination" की परिभाषा में शामिल किया गया है, जबकि सामान्य वर्ग को बाहर रखा गया है। वे पूछते हैं कि अगर सामान्य वर्ग के छात्र के साथ भी जाति के आधार पर भेदभाव हो, तो उन्हें समान सुरक्षा क्यों नहीं मिलेगी। वहीं 3(1)(e) में सभी हितधारकों को शामिल करने वाली व्यापक परिभाषा मौजूद है, जिससे दोहरी परिभाषा की जरूरत पर सवाल उठे।
ड्राफ्ट में झूठी शिकायत पर जुर्माना या अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान था, परंतु अंतिम नियमों में इसे हटा दिया गया, जिससे विरोध का एक और कारण बना।
इन आपत्तियों के चलते देश भर में प्रदर्शन हुए। राजपूत करणी सेना के अध्यक्ष महिपाल सिंह मकराना ने राजस्थान के कई शहरों में रोल‑बैक की मांग की, जबकि दिल्ली के जंतर‑मंतर पर भी छात्रों ने विरोध किया।
सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर पाँच प्रमुख सवाल उठाए: (i) 3(1)(c) की अलग परिभाषा की आवश्यकता, (ii) SC‑ST‑OBC के भीतर सबसे पिछड़े समूहों को पर्याप्त सुरक्षा, (iii) हॉस्टल व क्लासरूम में "segregation" का अर्थ, (iv) 2012 के नियमों में मौजूद रैगिंग प्रावधान को 2026 के नियमों में क्यों नहीं रखा गया, और (v) इन प्रावधानों का संवैधानिक समानता अधिकार पर क्या असर पड़ेगा।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने बताया कि वह इन नियमों की दोबारा समीक्षा के लिए एक विशेष समिति बनाने पर विचार कर रही है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस दिशा में कदम उठाने की सूचना दी। कोर्ट ने याचिकाओं की सुनवाई को चार हफ्ते के लिए टाल दिया, जबकि समिति का औपचारिक ऐलान अभी बाकी है।
राजनीतिक रूप से इस मुद्दे ने बीजेपी के लिए नई चुनौती खड़ी कर दी है। सवर्ण वर्ग के बीच UGC नियमों के प्रति असंतोष बढ़ रहा है, जिससे पार्टी को हालिया MLC चुनाव में झटका लगा। इस कारण से पार्टी ने 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले संविधान, UGC, SIR और आरक्षण जैसे मुद्दों पर विपक्ष के आरोपों का तथ्य‑आधारित जवाब देने के लिए विशेष प्रकोष्ठ स्थापित करने का निर्देश दिया है। इस पहल में शिक्षकों, डॉक्टरों, वकीलों, व्यापारियों और युवाओं के साथ सीधा संवाद, घर‑घर संपर्क और मतदाता सूची की जाँच शामिल होगी।
अब सवाल यह है कि एक वर्ग की नाराज़गी दूर करने के लिए किए गए बदलाव दूसरे वर्ग में नई असंतोष की लहर नहीं पैदा करेंगे। केंद्र सरकार की समिति की रिपोर्ट और संभावित यू‑टर्न अभी भी अनिश्चित हैं, लेकिन इस विवाद ने भारतीय उच्च शिक्षा नीति में सामाजिक न्याय और समानता के सवालों को फिर से उजागर कर दिया है।
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