उत्तर प्रदेश के चुनावी कैलेंडर में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अक्टूबर में होने वाले 10 राज्यसभा सीटों और 11 MLC (विधान परिषद) सीटों के चुनाव का ऐलान किया गया है। इन चुनावों को प्रदेश की राजनीति में ‘सेमीफाइनल’ के रूप में देखा जा रहा है।
राज्यसभा और MLC के चुनाव सिर्फ उच्च सदन के सदस्यों के चयन तक सीमित नहीं हैं; ये भाजपा के ‘मिशन 2027’ और सपा के ‘PDA अभियान’ दोनों की जमीनी पकड़, रणनीतिक क्षमता और कैडर की तैयारी का सबसे बड़ा लिटमस टेस्ट बन रहे हैं।
भाजपा ने इन चुनावों को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया है, जबकि कांग्रेस और सपा ने अलग-अलग चुनावी मैदान में उतरने की पूरी तैयारी कर रखी है। सपा ने MLC के लिए उम्मीदवारों के नाम पहले ही घोषित कर दिए हैं, और कांग्रेस ने भी अपने पत्ते खोल दिए हैं। 2027 से ठीक पहले होने वाले इन चुनावों में कोई भी दल किसी तरह की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ना चाहता।
भाजपा की कोर कमेटी की बैठक 25 सितंबर को होने वाली है, जिसमें राज्यसभा और MLC के प्रत्याशियों के नाम तय करने पर चर्चा होगी। बैठक में सीएम योगी आदित्यनाथ, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य, डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक, प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और प्रदेश महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह शामिल होंगे। प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े भी अपने सह-प्रभारियों के साथ बैठक में शामिल हो सकते हैं।
भाजपा यूपी के जातीय समीकरण को देखते हुए उम्मीदवारों का चयन करेगा, ताकि सपा के PDA को काउंटर किया जा सके। राज्यसभा प्रत्याशियों के चयन में जातीय समीकरण के साथ पुराने और जमीनी कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देने की चर्चा है। MLC चुनाव में कई क्षेत्रों के पुराने शिक्षक संघ नेताओं ने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है।
10 राज्यसभा सीटों के लिए मुकाबला तीव्र होने की संभावना है। बीजेपी अपने सहयोगी दलों के सहारे आसानी से 7 सीटें जीतने की स्थिति में है, जबकि सपा अपने विधायकों के दम पर 2 सीटें जीत लेगी। वास्तविक जंग 10वीं सीट पर होगी, जहाँ सपा को अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी।
23 अक्टूबर को होने वाले MLC चुनाव में 5 स्नातक और 6 शिक्षक क्षेत्र की सीटें तय होंगी। यह चुनाव सीधे शिक्षकों और शिक्षित स्नातकों के वोटों से तय होता है, और यह वर्ग राज्य की नीतिगत और राजनीतिक हवा तय करने में अहम भूमिका निभाता है। भाजपा का फोकस इन सीटों पर बुद्धिजीवी वर्ग का समर्थन पाने पर है, जबकि सपा PDA फॉर्मूले के तहत शिक्षकों और कर्मचारियों के मुद्दों को उठाकर जीत दर्ज करना चाहती है।
विधान परिषद की 11 सीटों में से 2020 में भाजपा ने 6 सीटें जीती थीं, और इस बार पार्टी सभी सीटों पर जीत का लक्ष्य रख रही है। इन दोनों चुनावों के नतीजों को 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है। 2027 के चुनाव के लिए अब कुछ ही महीनों का समय बचा है, इसलिए इन 21 सीटों के चुनावी नतीजे जिस पार्टी के पक्ष में झुकेंगे, उसे बड़ा मनोवैज्ञानिक लाभ मिलेगा।
भाजपा के लिए यह अपनी संगठनात्मक मशीनरी की कार्यकुशलता और सत्ता की पकड़ को साबित करने का मौका है, जबकि सपा के लिए यह अपने कैडर में नए उत्साह का संचार करने और 2027 के महासमर से पहले बढ़त बनाने का स्वर्णिम अवसर है। राज्यसभा और MLC के चुनाव को 2027 के ‘सत्ता संग्राम का लिटमस टेस्ट’ माना जा रहा है, जहाँ राज्यसभा चुनाव दलों के फ्लोर मैनेजमेंट और राजनीतिक चालों की परीक्षा लेंगे, वहीं MLC चुनाव प्रदेश के पढ़े-लिखे तबके का रुझान स्पष्ट कर देंगे। यही वजह है कि दोनों प्रमुख दल इसे किसी सेमीफाइनल से कम नहीं मान रहे हैं।
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