अमेरिका की वैश्विक शक्ति पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि चीन अब डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने की ठोस रणनीति अपना रहा है। दशकों से चल रहा अमेरिकी‑डॉलर‑केन्द्रित वित्तीय ढांचा अब बदलाव की दहलीज पर है, और कई उभरती अर्थव्यवस्थाएं इस बदलाव में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
पश्चिमी प्रतिबंधों, भू‑राजनीतिक तनाव और गुटबंदी के माहौल में, रूस‑चीन द्विपक्षीय व्यापार में चीनी युआन (Yuan) सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली स्थानीय मुद्रा बन चुकी है। अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद रूस को SWIFT से बाहर कर दिया गया, जिससे दोनों देशों ने डॉलर और यूरो को पूरी तरह नकार दिया। आज रूस‑चीन के 90 % से अधिक व्यापार युआन‑रूबल में ही होता है, जिसमें युआन का हिस्सा लगभग 70 % है। यह प्रतिबंध‑प्रतिक्रिया है, लेकिन इसका मुख्य लक्ष्य डॉलर पर दबाव बढ़ाना है।
रूस के सेंट्रल बैंक ने अपने रिज़र्व में डॉलर की जगह युआन को प्रमुखता दी है। चीन‑रूस मिलकर ‘डी‑डॉलराइजेशन’ यानी डॉलर पर निर्भरता ख़त्म करने का अभियान चला रहे हैं। कई देशों ने भी अमेरिकी नीतियों से असंतोष जताते हुए इस दिशा में कदम बढ़ाए हैं। चीन ने अपना क्रॉस‑बॉर्डर इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम (CIPS) विकसित किया, जबकि रूस ने SPFS तैयार किया, जिससे SWIFT के विकल्प उपलब्ध हो गए।
रूस से चीन को निर्यातित कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस और कोयले का भुगतान अब सीधे युआन और रूबल में हो रहा है। दोनों देशों ने अमेरिकी बैंकों और डॉलर को पूरी तरह बाहर कर दिया है, जिससे लेन‑देन में अमेरिकी नियंत्रण का कोई रास्ता नहीं बचता।
अमेरिका को चीन से सबसे बड़ा रणनीतिक और आर्थिक खतरा क्यों लगता है? चीन वैश्विक सप्लाई‑चेन का प्रमुख हब और सबसे बड़ा निर्यातक है। यदि चीन अपने अंतरराष्ट्रीय व्यापार में युआन को अनिवार्य कर दे, तो मौजूदा वित्तीय व्यवस्था में बड़ा उलटफेर हो सकता है। साथ ही, चीन अपनी डिजिटल करेंसी को वैश्विक स्तर पर पेश करने की तैयारी कर रहा है, जिससे पारंपरिक बैंकिंग चैनल कम प्रभावी हो जाएंगे। अगर दुनिया डॉलर में व्यापार करना बंद कर दे, तो अमेरिका अपनी मौद्रिक नीतियों और आर्थिक प्रतिबंधों का हथियार खो देगा।
ब्रिक्स (BRICS) इस दौर में क्यों महत्वपूर्ण हैं? भारत, रूस, चीन, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका और नए सदस्य देशों का समूह वैश्विक अर्थव्यवस्था का लगभग एक‑तिहाई हिस्सा नियंत्रित करता है। ये देश डॉलर की मनमानी को रोकने और अपने व्यापार को राष्ट्रीय मुद्राओं (रुपया, युआन, रियल आदि) में निपटाने की दिशा में सक्रिय हैं। हालांकि वैश्विक कुल व्यापार में डॉलर की हिस्सेदारी अभी भी 85 % से अधिक है, लेकिन ब्रिक्स स्थानीय मुद्रा‑आधारित वित्तीय बुनियादी ढांचा बनाकर इस अनुपात को घटाने की कोशिश कर रहा है।
भारत का रुख अधिक व्यावहारिक और संतुलित है। भारत किसी एक मुद्रा (युआन या डॉलर) के वर्चस्व को नहीं अपनाना चाहता, बल्कि ‘मल्टी‑पोलर’ वित्तीय प्रणाली का समर्थन करता है। भारतीय रुपये को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बढ़ावा देकर, भारत अपनी अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहा है।
क्या ब्रिक्स सदस्य अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में ट्रेड करने में सक्षम हैं? तकनीकी और व्यावहारिक तौर पर धीरे‑धीरे प्रगति हो रही है, लेकिन चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। जब दो देशों के बीच आयात‑निर्यात का संतुलन लगभग बराबर हो, तो स्थानीय मुद्रा में लेन‑देन आसान हो जाता है। चीन‑रूस का व्यापार इस मॉडल पर काम कर रहा है, लेकिन जब असंतुलन बड़ा हो, तो समस्या उत्पन्न होती है। उदाहरण के तौर पर, भारत रूस से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदता है, जबकि रूस को भारत से उतनी वस्तु नहीं मिलती। इस असंतुलन को दूर करने के लिए भारत‑रूस व्यापार में यूएई दिरहाम और युआन जैसी तृतीय पक्ष मुद्राओं का उपयोग किया जाता है।
संक्षेप में, चीन‑रूस की डॉलरस्ट्रिपिंग पहल और ब्रिक्स की सामूहिक रणनीति वैश्विक वित्तीय परिदृश्य को बदल सकती है, जबकि भारत अपनी बहु‑ध्रुवीय नीति के साथ इस बदलाव को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है।
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