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यहूदी देश इस्राइल की राजनीति में अरब समुदाय की क्या भूमिका, कितनी आबादी और चुनाव में कितना दबदबा?

Ajay Tiwari
30 October 2026 • 0 • 14
यहूदी देश इस्राइल की राजनीति में अरब समुदाय की क्या भूमिका, कितनी आबादी और चुनाव में कितना दबदबा?

इस्राइल में अरब समुदाय की राजनीतिक यात्रा आसान नहीं रही है। देश की स्थापना के बाद लंबे समय तक सीमित प्रतिनिधित्व के बाद अब अरब दल चुनावी राजनीति में अहम भूमिका निभा रहे हैं। करीब 21 फीसदी आबादी वाले इस समुदाय की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी और सरकार गठन में संभावित भूमिका ने एक बार फिर सबका ध्यान खींचा है। आइए विस्तार से जानते हैं।

इस्राइल में अरब समुदाय की आबादी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का इतिहास काफी अहम रहा है। देश की स्थापना के बाद से इस समुदाय की स्थिति में कई बदलाव आए हैं और अब चुनाव के बीच अरब राजनीतिक दलों की भूमिका भी चर्चा में है। 

इस्राइल के गठन का इतिहास यहूदियों की अलग देश बनाने की मांग और फलस्तीनी अरबों के अपने राजनीतिक अधिकारों के संघर्ष से जुड़ा है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 70 ईस्वी में रोमन सेना ने यरुशलम पर कब्जा कर दूसरे यहूदी मंदिर को नष्ट कर दिया। इसके बाद यहूदी आबादी के बड़े हिस्से को विस्थापन और दमन का सामना करना पड़ा। 135 ईस्वी में रोमन सम्राट हैड्रियन के शासन के दौरान यहूदियों को यरुशलम में प्रवेश करने से रोकने जैसे प्रतिबंध लगाए गए और यहूदी आबादी का दुनिया के दूसरे हिस्सों में फैलाव बढ़ा। हालांकि, यहूदी समुदाय पूरी तरह इस क्षेत्र से समाप्त नहीं हुआ था।  .ads-row{display:flex;gap:10px;flex-wrap:wrap;}

29 नवंबर 1947 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव 181 पारित किया। इसके तहत फलस्तीन को दो राज्यों में बांटने की योजना बनाई गई। एक यहूदी राज्य और दूसरा अरब राज्य बनाया जाना था। यरुशलम को अंतरराष्ट्रीय प्रशासन के अधीन रखने का प्रस्ताव भी था। यहूदी नेतृत्व ने इस योजना को स्वीकार कर लिया, जबकि अरब फलस्तीनी नेतृत्व और अरब देशों ने इसका विरोध किया। इसके बाद क्षेत्र में संघर्ष तेज हो गया। 14 मई 1948 को ब्रिटिश शासन समाप्त होने के साथ डेविड बेन-गुरियन ने इस्राइल की स्वतंत्रता की घोषणा की। अमेरिका ने उसी दिन इस्राइल की अस्थायी सरकार को मान्यता दे दी। अगले दिन अरब देशों की सेनाओं के युद्ध में शामिल होने के साथ पहला अरब-इस्राइल युद्ध शुरू हो गया। युद्ध के दौरान करीब 7.5 लाख फलस्तीनी अपने घरों से विस्थापित हो गए या उन्हें वहां से निकलना पड़ा। फलस्तीनी इस घटना को नकबा कहते हैं, जिसका अर्थ है तबाही। युद्ध के बाद इस्राइल का नियंत्रण संयुक्त राष्ट्र की विभाजन योजना में प्रस्तावित क्षेत्र से आगे तक फैल गया। गाजा पट्टी पर मिस्र और पश्चिमी तट पर जॉर्डन का नियंत्रण हो गया। इस युद्ध के बाद फलस्तीनियों की एक बड़ी आबादी अपने घरों से दूर हो गई, जबकि कुछ अरब परिवार इस्राइल की सीमाओं के भीतर रह गए। 

इस्राइल की स्थापना के बाद देश की सीमाओं के भीतर रह गए अरब नागरिकों को इस्राइली नागरिकता मिली। उन्हें 1949 के पहले संसदीय चुनाव से ही मतदान का अधिकार भी हासिल था। हालांकि, नागरिकता मिलने के बावजूद शुरुआती दशकों में उनकी राजनीतिक भागीदारी सीमित रही। अरब नागरिक 1966 तक सैन्य प्रशासन के अधीन रहे। इस दौरान उनकी आवाजाही पर प्रतिबंध थे। संसद में उनका प्रतिनिधित्व अक्सर तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड बेन-गुरियन की प्रमुख पार्टी मपाई से जुड़ी राजनीतिक सूचियों के माध्यम से होता था। इन सूचियों के जरिए अरब प्रतिनिधि संसद पहुंचे, लेकिन उन्हें स्वतंत्र राजनीतिक फैसले लेने की सीमित गुंजाइश मिलती थी। इसी दौर में अरब नागरिकों के बीच स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग भी विकसित हुई। कुछ लोगों ने इस्राइल की व्यवस्था के भीतर रहकर समान अधिकार हासिल करने पर जोर दिया, जबकि दूसरे समूहों ने फलस्तीनी राष्ट्रीय पहचान और व्यापक फलस्तीनी आंदोलन के साथ अपने संबंधों को प्रमुखता दी। यही अंतर आगे चलकर अरब राजनीतिक दलों की अलग-अलग विचारधाराओं में दिखाई दिया।

इस्राइल केके आंकड़ों के मुताबिक, देश में अरब आबादी में लगातार वृद्धि हुई है। 1950 में यह आबादी करीब 1.67 लाख थी। 1970 में बढ़कर 4.40 लाख और 1990 में 8.75 लाख हो गई। वर्ष 2003 के अंत तक अरब आबादी 13.02 लाख पहुंच गई थी, जो उस समय इस्राइल की कुल आबादी का करीब 19 फीसदी थी। इसके बाद भी आबादी बढ़ती रही। 2015 में अरब आबादी करीब 18.14 लाख थी। 2026 में अरब आबादी बढ़कर 21.47 लाख पहुंच गई। 2003 के अंत के आंकड़ों के मुताबिक, अरब आबादी में 82 फीसदी मुस्लिम, नौ फीसदी ईसाई और नौ फीसदी द्रूज समुदाय के लोग थे। इनमें मुस्लिम सबसे बड़ा धार्मिक समुदाय है। इस्राइल की कुल आबादी करीब एक करोड़ है। अरब इस्राइल की कुल आबादी का 21.1 फीसदी हैं।

इस्राइल में अरब राजनीति की एक प्रमुख धारा कम्युनिस्ट आंदोलन से विकसित हुई। इस्राइली कम्युनिस्ट पार्टी में अरब और यहूदी कार्यकर्ता भेदभाव के खिलाफ, समाजवाद और फलस्तीनी अधिकारों के समर्थन में साथ आए। बाद में कम्युनिस्ट आंदोलन में विभाजन हुआ और राका नाम का समूह अरब मतदाताओं के बीच एक प्रमुख राजनीतिक ताकत बना। 1977 में इसने हदाश यानी डेमोक्रेटिक फ्रंट फॉर पीस एंड इक्वैलिटी की स्थापना में भूमिका निभाई। यह अरब और यहूदी कार्यकर्ताओं का साझा राजनीतिक मंच है। दूसरी ओर, स्वतंत्र फलस्तीनी राष्ट्रवादी राजनीति की भी कोशिशें जारी रहीं। 1995 में नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस यानी बलद की स्थापना हुई। इसने 1996 में नेसेट में प्रवेश किया। बलद का तर्क था कि इस्राइल के अरब नागरिकों को फलस्तीनी राष्ट्रीय अल्पसंख्यक के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए। अरब राजनीति की एक अन्य धारा इस्लामी आंदोलन से निकली। इसी से यूनाइटेड अरब लिस्ट यानी राअम का उदय हुआ। यह पार्टी धार्मिक पहचान, सामाजिक मुद्दों और अरब समुदायों के लिए व्यावहारिक लाभ हासिल करने पर जोर देती है।

दिसंबर 1987 में पश्चिमी तट और गाजा पट्टी में पहला इंतिफादा (विद्रोह) शुरू हुआ। इस आंदोलन ने इस्राइल के अरब नागरिकों के बीच फलस्तीनी पहचान और कब्जे वाले क्षेत्रों में रहने वाले फलस्तीनियों के साथ एकजुटता के मुद्दे को प्रमुख बना दिया। 1990 के दशक में ओस्लो शांति प्रक्रिया से इस्राइल-फलस्तीन संघर्ष के समाधान की उम्मीदें बढ़ीं। हालांकि, इस्राइल के भीतर अरब नागरिकों की स्थिति और समान अधिकारों को लेकर असंतोष बना रहा। सितंबर 2000 में दूसरा इंतिफादा शुरू होने के बाद इस्राइल के अरब कस्बों और गांवों में भी प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों ने कब्जे वाले फलस्तीनी क्षेत्रों के लोगों के समर्थन में आवाज उठाई। अक्तूबर 2000 में इस्राइली पुलिस की कार्रवाई के दौरान 13 अरब नागरिक मारे गए। इन घटनाओं के बाद सरकार और पुलिस के प्रति अविश्वास बढ़ा। इसका असर मतदान पर भी दिखाई दिया। इस्राइल डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट के अनुसार, 2003 से 2013 के बीच हुए चार चुनावों में अरब नागरिकों का औसत मतदान करीब 57 फीसदी रहा, जबकि राष्ट्रीय औसत लगभग 66 फीसदी था। इस दौर ने अरब राजनीति में यह सवाल और अहम बना दिया कि समुदाय अपने अधिकारों के लिए स्वतंत्र राजनीतिक आवाज उठाए, यहूदी पार्टियों के साथ मिलकर काम करे या चुनावी व्यवस्था के भीतर दूसरे तरीकों से बदलाव की कोशिश करे।

अरब राजनीतिक दलों के सामने एक बड़ी चुनौती यह थी कि अलग-अलग चुनाव लड़ने पर उनके वोट बंट सकते थे। मार्च 2014 में इस्राइल ने संसद में प्रवेश के लिए न्यूनतम चुनावी सीमा दो फीसदी से बढ़ाकर 3.25 फीसदी कर दी। इससे छोटी पार्टियों के लिए नेसेट में सीट हासिल करना मुश्किल हो गया। इसी पृष्ठभूमि में 2015 में जॉइंट लिस्ट का गठन हुआ। इसमें चार प्रमुख पार्टियां शामिल थीं। हदाश अरब-यहूदी सहयोग और वामपंथी राजनीति से जुड़ी थी, बलद फलस्तीनी राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती थी, ताअल अरब राष्ट्रवादी राजनीति से जुड़ी थी और राअम इस्लामी आंदोलन से निकली पार्टी थी। इस गठबंधन का उद्देश्य अरब मतों के बंटवारे को कम करना और संसद में प्रतिनिधित्व मजबूत करना था।  जनवरी 2019 में अहमद तिबी की पार्टी ताअल के अलग होने के बाद जॉइंट लिस्ट टूट गई। सितंबर 2019 और मार्च 2020 के चुनावों के लिए इसे फिर से बनाया गया। मार्च 2021 में राअम ने अलग चुनाव लड़ने का फैसला किया। उस चुनाव में जॉइंट लिस्ट को छह सीटें मिलीं, जिनमें हदाश को तीन, ताअल को दो और बलद को एक सीट मिली। नवंबर 2022 के चुनाव से पहले हदाश और ताअल ने साथ चुनाव लड़ने का फैसला किया, जबकि बलद और राअम इससे बाहर रहीं। जनवरी 2026 में अरब समुदायों में बढ़ते अपराध और सुरक्षा को लेकर असंतोष के बीच जॉइंट लिस्ट फिर से गठित हुई। हालांकि, राअम इसमें शामिल नहीं हुई। वह अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखना चाहती थी और भविष्य में सरकार बनाने वाले गठबंधन में शामिल होने का विकल्प खुला रखना चाहती थी।

इस्राइल में अरब पार्टियों को चुनाव लड़ने से रोकने की कोशिशें कई बार हुई हैं। 1964 में सरकार ने अल-अर्द आंदोलन पर प्रतिबंध लगाया। 1965 में इससे जुड़ी स्वतंत्र अरब सूची को भी सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव लड़ने से रोक दिया। इसके बाद 2003 और 2013 के चुनावों से पहले बलद और राअम-ताअल जैसी पार्टियों को अयोग्य ठहराने की मांग उठी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 2003 में बलद और उसके नेता अजमी बिशारा को चुनाव लड़ने की अनुमति दे दी। 2026 के चुनाव से पहले 23 सितंबर को केंद्रीय चुनाव समिति ने राअम और जॉइंट लिस्ट को चुनाव लड़ने से रोकने का फैसला किया। समिति में इन पार्टियों पर इस्राइल की यहूदी और लोकतांत्रिक पहचान को नकारने और सशस्त्र संघर्ष का समर्थन करने के आरोप लगाए गए। हालांकि, 2 अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पार्टियों को चुनाव लड़ने की अनुमति दे दी।

इस्राइल की संसद को नेसेट कहा जाता है। इसमें कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। इसलिए जब बड़े गठबंधनों में से कोई भी बहुमत तक नहीं पहुंचता, तो छोटे दलों का समर्थन सरकार गठन की बातचीत में महत्वपूर्ण हो सकता है। एग्जिट पोल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के गठबंधन को करीब 53 सीटें मिल सकती हैं। लिकुड पार्टी गादी आइजेनकॉट की यशर पार्टी से पांच से छह सीटें आगे बताई गई है। आइजेनकॉट के गठबंधन को 48 सीटें मिलती दिख रही हैं।  वहीं जॉइंट लिस्ट और राअम पार्टी को मिलाकर 19 सीटें मिल रही हैं। अरब पार्टियों के अनुसार, उनके समुदाय में मतदान 75 प्रतिशत से ज्यादा रहा। अरब समुदाय में भी मतदान में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई।  यह इस्राइल में अरब प्रतिनिधित्व का अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा हो सकता है। इस बार अरब समुदाय में मतदान बढ़ने को नेतन्याहू की दक्षिणपंथी सरकार के खिलाफ नाराजगी से जोड़कर देखा जा रहा है। इस बीच नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने मतदान में गड़बड़ी के आरोप लगाए हैं। पार्टी ने दावा किया कि अरब पार्टियों ने कथित तौर पर वोट खरीदने, मतदाताओं को धमकाने, हिंसा, जालसाजी और अवैध सॉफ्टवेयर के जरिए मतदाताओं को जुटाने जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया। पार्टी ने पुलिस और इस्राइल की आंतरिक सुरक्षा एजेंसी शिन बेट से जांच कराने की मांग की।

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• वंदे भारत स्लीपर अब बेंगलुरु‑मुंबई रूट पर भी • अर्शदीप सिंह का रिकॉर्ड बनाने का मौका • बिहार सरकार ने 37 पुलिस इंस्पेक्टरों को डीएसपी पद पर प्रोन्नत किया, पूरी सूची देखें • एथलीट नीरज यादव की मृत्यु: 6 घंटे फोन पर, महिला मित्र से आखिरी मुलाकात के बाद क्या हुआ? • भूटान की ग्लेशियर झील के फटने से अलीपुरद्वार में 10,000 लोगों का विस्थापन • ईडन पार्क में छोटा बाउंड्री, भारत की टॉप‑टेन रेट पर 199 रन का लक्ष्य • छठ पर घर लौटने के लिए 15 हजार रुपये से हवाई टिकट खरीदी: नालंदा के प्रवासी मजदूर शत्रुघ्न की कहानी • AI के कारण कंप्यूटर साइंस में दाखिले घटे, नौकरी के डर से छात्रों का मन बदल रहा है • क्लीनिक में 55 वर्षीय महिला की गोली मारकर हत्या, पुलिस खोजे अज्ञात हमलावर • कच्चे माल की बढ़ती कीमतों से 25 करोड़ का कारोबार ठप • पटना में ABVP का विरोध, नगर निगमकर्मी मांगों के साथ जुटे, गंगा जल संधि पर चर्चा • सीएम योगी ने कहा, बाजार अब रात में भी खुले, व्यापारियों का डर दूर • पटना में कार्डिकॉन 2026 का आरम्भ, 500 कार्डियोलॉजिस्ट जुटेंगे • वाहनों के धुएँ से हवा की गुणवत्ता गिरी, गांवों में स्वास्थ्य पर असर • चक्रवात अर्नब से आंध्र प्रदेश-ओडिशा में भारी बाढ़, कांग्रेस ने राहत कार्यवाही की अपील • पीएम किसान सम्मान निधि: कुछ ही देर में आपके खाते में आएंगे 2000 रुपये, मोदी करेंगे 24वीं किस्त जारी • किसानों के लिए नई आय का स्रोत: खेतों में तालाब बनवाने पर 52,500 रुपये की सब्सिडी, मछली पालन से भी बढ़ेगी कमाई • बिहार में जमीन कारोबारी पर गोलीबारी: चार गोलियों से गंभीर चोट • मुथुरामलिंग थेवर की जयंती पर तमिलनाडु में उमड़ा जनसैलाब; सीएम विजय, स्टालिन समेत नेताओं ने किया नमन • पश्चिम बंगाल के एसआईआर ट्रिब्यूनल में छह महीने बाद भी लाखों अपीलें लंबित क्यों? एक जज ने बताईं वजहें • अनंत सिंह को सुप्रीम कोर्ट से झटका: दुलारचंद यादव हत्याकांड में जमानत रद्द; 1 दिसंबर तक सरेंडर का आदेश • सुप्रीम कोर्ट ने अनंत सिंह को 1 दिसंबर तक सरेंडर करने का आदेश, दुलारचंद मर्डर केस में बड़ा झटका • किस्तों पर लैपटॉप खरीदकर डॉलर‑क्रिप्टो कमाई, अंकित के स्लीपर मॉड्यूल पर जांच • शिखर धवन‑सोफी शाइन ने मनाया पहला करवा चौथ, धवन ने चूमा पत्नी का माथा • नेतन्याहू के बहुमत से पिछड़ने पर अरब मीडिया में क्या कहा जा रहा है • इज़राइल में सरकार न बन पाई तो भी नेतन्याहू अगले साल तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री रह सकते हैं • कर्नाटक के कांग्रेसी मंत्री सतीश जारकीहोली ने SIR पर अपने बयान को लेकर स्पष्टीकरण दिया • मोदी के कार्यक्रम में महिलाएं 'मोदी कहीं नहीं जाएंगे' पोस्टर लेकर पहुंचीं • आज ही दो भर्तियों की अंतिम तिथि; फॉर्म तुरंत भरें • अमरुजाला हिंदी न्यूज ऐप से पाएं ताज़ा खबरें • रॉयल एनफील्ड हिमालयन 750: EICMA 2026 से पहले नया टीज़र और लॉन्च की तारीख पर चर्चा • भाजपा की चूक और इसके राजनीतिक प्रभाव • बिहार में अक्टूबर में ठंड, भारी वर्षा और तेज हवाओं का अलर्ट जारी • ग्रेटर नोएडा में बालकनी से फिसलते बाप‑बेटे की 23वीं मंजिल से गिरकर मौत • श्रद्धा दुबे के मोबाइल बरामद में पुलिस की विफलता, कस्टडी रिमांड भी नहीं • विराट कोहली हैं भारत के सबसे बड़े फिटनेस आइकन, टाइगर वुड्स से मिली शुरुआती प्रेरणा • कानपुर के जासूसी‑आतंकी नेटवर्क पर यूपी एटीएस की कार्रवाई • उत्तर प्रदेश में 19 आयुर्वेद डॉक्टरों की फर्जी डिग्रियाँ उजागर, पंजीयन रद्द • 10 संग्रहालयों में बिहार म्यूजियम: वैश्विक सूची में नौवां स्थान; भारत और एशिया का इकलौता संग्रहालय • यहूदी देश इस्राइल की राजनीति में अरब समुदाय की क्या भूमिका, कितनी आबादी और चुनाव में कितना दबदबा? • वंदे भारत स्लीपर अब बेंगलुरु‑मुंबई रूट पर भी • अर्शदीप सिंह का रिकॉर्ड बनाने का मौका • बिहार सरकार ने 37 पुलिस इंस्पेक्टरों को डीएसपी पद पर प्रोन्नत किया, पूरी सूची देखें • एथलीट नीरज यादव की मृत्यु: 6 घंटे फोन पर, महिला मित्र से आखिरी मुलाकात के बाद क्या हुआ? • भूटान की ग्लेशियर झील के फटने से अलीपुरद्वार में 10,000 लोगों का विस्थापन • ईडन पार्क में छोटा बाउंड्री, भारत की टॉप‑टेन रेट पर 199 रन का लक्ष्य • छठ पर घर लौटने के लिए 15 हजार रुपये से हवाई टिकट खरीदी: नालंदा के प्रवासी मजदूर शत्रुघ्न की कहानी • AI के कारण कंप्यूटर साइंस में दाखिले घटे, नौकरी के डर से छात्रों का मन बदल रहा है • क्लीनिक में 55 वर्षीय महिला की गोली मारकर हत्या, पुलिस खोजे अज्ञात हमलावर • कच्चे माल की बढ़ती कीमतों से 25 करोड़ का कारोबार ठप • पटना में ABVP का विरोध, नगर निगमकर्मी मांगों के साथ जुटे, गंगा जल संधि पर चर्चा • सीएम योगी ने कहा, बाजार अब रात में भी खुले, व्यापारियों का डर दूर • पटना में कार्डिकॉन 2026 का आरम्भ, 500 कार्डियोलॉजिस्ट जुटेंगे • वाहनों के धुएँ से हवा की गुणवत्ता गिरी, गांवों में स्वास्थ्य पर असर • चक्रवात अर्नब से आंध्र प्रदेश-ओडिशा में भारी बाढ़, कांग्रेस ने राहत कार्यवाही की अपील • पीएम किसान सम्मान निधि: कुछ ही देर में आपके खाते में आएंगे 2000 रुपये, मोदी करेंगे 24वीं किस्त जारी • किसानों के लिए नई आय का स्रोत: खेतों में तालाब बनवाने पर 52,500 रुपये की सब्सिडी, मछली पालन से भी बढ़ेगी कमाई • बिहार में जमीन कारोबारी पर गोलीबारी: चार गोलियों से गंभीर चोट • मुथुरामलिंग थेवर की जयंती पर तमिलनाडु में उमड़ा जनसैलाब; सीएम विजय, स्टालिन समेत नेताओं ने किया नमन • पश्चिम बंगाल के एसआईआर ट्रिब्यूनल में छह महीने बाद भी लाखों अपीलें लंबित क्यों? 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