अक्षय कुमार और सैफ अली खान की जोड़ी पूरे 18 साल बाद पर्दे पर साथ आई है...और साथ में हैं सस्पेंस सिनेमा के महारथी प्रियदर्शन। फिल्म 'हैवान' रिलीज हो चुकी है और अगर आप इसे देखने का मन बना रहे हैं, तो पहले जान लीजिए कि यह फिल्म आखिर बनी कैसी है।
कहानी फिल्म प्रियदर्शन की ही 2016 की मलयालम हिट 'ओप्पम' की रीमेक है। कहानी है श्याम (सैफ अली खान) की, जो जन्म से भले ही देख नहीं सकता, लेकिन मार्शल आर्ट्स का उस्ताद है और उसकी सुनने-महसूस करने की ताकत कमाल की है। श्याम एक पॉश सोसाइटी में मेंटेनेंस मैनेजर है। कहानी में भूचाल तब आता है जब सोसाइटी के मेंबर और रिटायर्ड जज प्रधान (बोमन ईरानी) का कत्ल हो जाता है। कत्ल से पहले जज प्रधान, श्याम को अपने अतीत के एक खौफनाक राज...परशुराम (अक्षय कुमार) के बारे में बताते हैं। परशुराम एक बेगुनाह लड़का था जिसे जज के गलत फैसले के कारण सजा हुई, उसका परिवार तबाह हो गया और वो मेंटल हॉस्पिटल पहुंच गया। अब जेल से छूटा परशुराम एक साइको किलर बन चुका है और जज से जुड़े हर इंसान को तड़पा-तड़पा कर मार रहा है। उसकी अगली नजर जज की सीक्रेट बेटी नंदिनी पर है, जिसे अब इस 'हैवान' से बचाना अंधे श्याम की जिम्मेदारी है।
एक्टिंग सैफ अली खान: यह फिल्म पूरी तरह सैफ के नाम रहती है। बिना आंखों के एक इंसान की मजबूरी और चाल-ढाल को उन्होंने बहुत सधे हुए अंदाज में जिया है, जो कहीं भी बनावटी नहीं लगता। एक्शन सीन्स में उनकी फुर्ती देखने लायक है .. सिर्फ आहटों से खतरा भांपने का उनका तरीका सीन में जान डाल देता है। बिना किसी ओवर-एक्टिंग के, सिर्फ अपनी बॉडी लैंग्वेज से उन्होंने इस किरदार को बेहद रियल बनाया है। अक्षय कुमार: अक्षय को 'परशुराम' जैसे खूंखार साइको किलर के रोल में देखना कागज पर बहुत धमाकेदार आइडिया लगता है। बिना बोले सिर्फ अपनी कद-काठी, चाल-ढाल और आंखों की सनक से वो शुरुआत में माहौल में एक खौफ जरूर बनाते हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि खराब लिखावट की वजह से उनके किरदार को कोई गहराई नहीं मिल पाई। वो ज्यादातर सीन्स में बस घूरते या खड़े नजर आते हैं, जिससे उनका डरावना असर धीरे-धीरे कम होने लगता है। अक्षय की मेहनत दिखती है... पर स्क्रिप्ट उनका साथ नहीं देती। असरानी साहब, बोमन ईरानी और बाकी स्टारकास्ट: दिवंगत एक्टर असरानी साहब की यह आखिरी फिल्म है। सोसाइटी के सिक्योरिटी गार्ड हुसैन के रोल में उनका 'लाश मैंने पहले देखी' वाला सीन आपको सीधे 'दे दना दन' के दौर में ले जाता है और चेहरे पर हंसी ले आता है। बोमन ईरानी ने किरदार में वजन डाला है, सयामी खेर (पुलिस अफसर), मनोज जोशी, राजेश शर्मा और श्रीया पिलगांवकर ने ठीक-ठाक काम किया है। शारिब हाशमी और राजपाल यादव का काम भी ठीक है, हालांकि उनके सीन्स जबरदस्ती ठूंसे हुए लगते हैं। और हां, अगर आप मोहनलाल के सरप्राइज कैमियो को लेकर उत्साहित हैं, तो वह फिल्म के सबसे खास मोमेंट्स में से एक है।
डायरेक्शन प्रियदर्शन का ट्रेडमार्क पैटर्न रहा है कि साउथ की अपनी ही फिल्मों को बॉलीवुड में लाते वक्त वो उनका मिजाज बदल देते हैं। 2016 की 'ओप्पम' में मोहनलाल के साथ उन्होंने जो दमघोटू, स्लो-बर्न और रियलिस्टिक सस्पेंस रचा था, वो बिना किसी शोर-शराबे के खौफ पैदा करता था। लेकिन इस फिल्म में ओरिजिनल की सादगी और तनाव को लार्जर-दैन-लाइफ ट्रीटमेंट और कॉमेडी ने काफी कमजोर कर दिया है..ओरिजिनल का डार्क फ्लेवर चमकीले सेट्स, गैर-जरूरी गानों और लाउड कॉमेडी में खो गया है। 'ओप्पम' का सस्पेंस जहां दिमागी घुटन पैदा करता था, वहीं फिल्म में थ्रिलर के बीच जबरदस्ती डाली गई प्रियदर्शन-स्टाइल लाउड कॉमेडी कई जगह सस्पेंस का माहौल तोड़ देती है।
स्क्रीनप्ले और राइटिंग 2 घंटे 44 मिनट की लंबाई और लचर राइटिंग फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी है। लॉजिक और प्रेडिक्टेबिलिटी की कमी: सिनेमैटिक लिबर्टी के नाम पर एक नेत्रहीन व्यक्ति का बार-बार पूरी पुलिस फोर्स को चकमा दे जाना हजम नहीं होता... पॉश सोसाइटी की हाई-प्रोफाइल सिक्योरिटी और मर्डर इन्वेस्टिगेशन को बहुत बचकाने ढंग से दिखाया गया है। अगर आप सस्पेंस फिल्में देखते हैं.. तो कहानी का अगला ट्विस्ट बहुत पहले ही भांप लेंगे। कोई बड़ा सरप्राइज एलिमेंट नहीं बचता। भटकता प्लॉट: लव एंगल, शादी का सीक्वेंस और नीलोफर वाला सब-प्लॉट जबरदस्ती ठूंसा हुआ लगता है। पुलिस जांच में भी कॉमेडी घुसाने से थ्रिल खत्म हो जाता है। क्लाइमेक्स में बिखराव: सेकेंड हाफ शॉर्टकट्स पर चलता है। अंत आते-आते फिल्म साइकोलॉजिकल थ्रिलर से भटककर हॉरर बनने की कोशिश करती है, जहां अक्षय का नन वाला गेटअप खौफनाक कम और अजीब ज्यादा लगता है। कुल मिलाकर, एक बेहतरीन कॉन्सेप्ट कमजोर लिखावट की भेंट चढ़ गया।
देखें या नहीं? क्यों देखें: अगर आप सैफ अली खान का एक सधा हुआ, बिना ड्रामे वाला एलीट क्लास परफॉर्मेंस देखना चाहते हैं। या फिर सिनेमा के दिग्गज असरानी साहब को आखिरी बार बड़ी स्क्रीन पर मुस्कुराते हुए देखना है। विजुअल्स और सिनेमैटोग्राफी के शौकीनों के लिए भी फिल्म देखने लायक है। क्यों छोड़े? ना रोंगटे खड़े करने वाला सस्पेंस, ना अक्षय का खौफनाक विलेन रूप... फिल्म में सिर्फ सैफ की परफॉर्मेंस के अलावा कुछ खास नहीं है। 2 घंटे 44 मिनट का यह 'सस्पेंस ड्रामा' आपका खौफ से ज्यादा कई जगह आपके सब्र का इम्तिहान लेता है।
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