हिंदी सिनेमा में कुछ फिल्मकार ऐसे रहे जिन्होंने बड़े पर्दे पर भव्यता के बजाय आम आदमी की जिंदगी को जगह दी। ऋषिकेश मुखर्जी ऐसे ही निर्देशकों में शामिल थे। उन्होंने परिवार, दोस्ती, प्रेम, नौकरी, संघर्ष और रिश्तों जैसे रोजमर्रा के विषयों को अपनी फिल्मों का हिस्सा बनाया और उन्हें ऐसी कहानियों में ढाला, जिनमें दर्शक खुद को देख पाए।
ऋषिकेश मुखर्जी का जीवन
ऋषि दा हिंदी सिनेमा के उन प्रमुख फिल्मकारों में गिने जाते हैं जिन्होंने आम आदमी की संवेदनाओं को बेहद सहज और मनोरंजक ढंग से पर्दे पर प्रस्तुत किया। उनका जन्म 30 सितंबर 1922 में कोलकाता में हुआ था।
फिल्म- अनाड़ी यादगार डायलॉग- ‘सब कुछ सीखा हमने, ना सीखी होशियारी’ साल 1959 में ऋषि दा की दूसरी फिल्म ‘अनाड़ी’ रिलीज हुई, जिसे दर्शकों ने खूब पसंद किया था। फिल्म का निर्देशन ऋषिकेश मुखर्जी ने किया था। फिल्म में राज कपूर, नूतन, मोतीलाल, ललिता पवार ने अभिनय किया था। ‘अनाड़ी’ का संगीत शंकर–जयकिशन ने दिया था। वहीं इसका निर्माण एल. बी. लछमन के द्वारा हुआ। फिल्म बॉक्स ऑफिस की सफल फिल्मों में से है।
फिल्म- अनुराधा यादगार डायलॉग- ‘हाय रे, वो दिन क्यों न आए’
साल 1960 में फिल्म ‘अनुराधा’ एक संवेदनशील और विचारप्रधान हिंदी फिल्म है। ऋषिकेश मुखर्जी ने फिल्म में कमाल का निर्देशन किया था। फिल्म में लीला नायडू, बलराज साहनी, अशोक कुमार मुख्य भूमिकाओं में थे। ‘अनुराधा’ का संगीत पंडित रविशंकर ने दिया था। फिल्म ‘अनुराधा’ को 1960 की सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था।
फिल्म- सत्यकाम यादगार डायलॉग- ‘जिस समाज में ईमानदारी की कद्र न हो, वहां ईमानदार रहना सबसे बड़ा संघर्ष है’ फिल्म ‘सत्यकाम’ साल 1969 में रिलीज हुई थी। कहानी सत्य और नैतिकता पर आधारित है। फिल्म में धर्मेंद्र, शर्मिला टैगोर, संजीव कुमार, अशोक कुमार ने अभिनय किया था। यह फिल्म नारायण सान्याल के उपन्यास सत्यकाम पर आधारित थी।
फिल्म- आनंद यादगार डायलॉग- 'बाबू मोशाय, जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं' 1971 में रिलीज हुई फिल्म 'आनंद' को ऋषि दा की सबसे यादगार फिल्म कहें तो गलत नहीं होगा। यह भारतीय सिनेमा की भी एक कालजयी और सदाबहार ड्रामा फिल्म है। फिल्म जिंदगी को जिंदादिली से जीने का संदेश देती है और इसका संवाद 'बाबू मोशाय, जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं', आज भी लोगों की जुबान पर है। फिल्म में राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन और सुमिता सान्याल ने अहम किरदार निभाए थे। फिल्म के गाने भी सुपर-डुपर हिट रहे थे। फिल्म- गुड्डी डायलॉग- 'आपको एक बार देख लिया तो कैसे भूल सकते हैं?' फिल्म ‘गुड्डी’ भी साल 1971 में ही रिलीज हुई थी। फिल्म में बॉलीवुड की दुनिया और वास्तविक जीवन के अंतर को दर्शाया गया है। फिल्म में जया भादुड़ी, धर्मेंद्र, उत्पल दत्त, विजय शर्मा मुख्य किरदारों में थे। इसे ऋषिकेश मुखर्जी ने निर्देशित किया था। इसका संगीत वसंत देसाई ने दिया था। फिल्म से जया भादुड़ी (बच्चन) बॉलीवुड में स्थापति हुई थीं।
फिल्म- बावर्ची यादगार डायलॉग- ‘किसी बड़ी खुशी के इंतजार में हम छोटी-छोटी खुशियां खो देते हैं’ बावर्ची, ऋषिकेश मुखर्जी की लोकप्रिय पारिवारिक फिल्मों में से एक है। इसमें राजेश खन्ना, जया बच्चन, असरानी, ए.के. हंगल और उषा किरण प्रमुख भूमिकाओं में हैं। फिल्म की कहानी शर्मा परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है। परिवार में आपसी तनाव, छोटी-छोटी बातों पर झगड़े और असंतोष का माहौल रहता है, जिसे एक बावर्ची आकर सुधार देता है।
फिल्म- अभिमान यादगार डायलॉग- पहले मैं अकेला था.. और अब बिल्कुल अकेला हूं फिल्म ‘अभिमान’ 1973 में रिलीज हुई थी। इसमें वैवाहिक तनाव, असुरक्षा जैसे मुद्दों पर रोशनी डाली गई थी। यह ऋषिकेश मुखर्जी निर्देशित सबसे पॉपुलर फिल्मों में से एक है। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी मुख्य किरदारों में थे। फिल्म का संगीत सचिन देव बर्मन ने दिया था। यह अमिताभ के करियर की सबसे यादगार फिल्मों में से एक है।
फिल्म- नमक हराम यादगार डायलॉग- 'बारिश की बूंदों से डरने वाले तूफान का मुकाबला नहीं कर सकते' नमक हराम (1973) ऋषिकेश मुखर्जी की चर्चित सामाजिक-ड्रामा फिल्मों में से एक है। इसमें राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन ने मुख्य भूमिकाएं निभाईं। फिल्म दोस्ती, वर्ग-संघर्ष और बदलते सामाजिक संबंधों जैसे विषयों को सामने रखती है। फिल्म का संगीत आर डी बर्मन ने दिया था।
फिल्म- चुपके-चुपके यादगार डायलॉग- 'एक्टर क्या है? डायरेक्टर के हाथ की कठपुतली' ऋषिकेश मुखर्जी की चुपके-चुपके (1975) हिंदी सिनेमा की लोकप्रिय हास्य फिल्मों में शामिल है। फिल्म की खासियत है कि इसमें हास्य के साथ भाषा, रिश्तों और सामाजिक व्यवहार पर हल्का-फुल्का व्यंग्य किया गया है। फिल्म में धर्मेंद्र, शर्मिला टैगोर, अमिताभ बच्चन, जया भादुड़ी और ओम प्रकाश प्रमुख भूमिकाओं में हैं। कहानी प्रोफेसर परिमल त्रिपाठी (धर्मेंद्र) के इर्द-गिर्द घूमती है। वह अपनी पत्नी सुलेखा के जीजा राघवन (ओम प्रकाश) के सामने एक मजाकिया प्रयोग करने का फैसला करता है।
फिल्म- गोल माल यादगार डायलॉग- मूंछ तो मन का दर्पण हैं ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म गोल माल (1979) हिंदी सिनेमा की लोकप्रिय हास्य फिल्मों में से एक है। फिल्म में अमोल पालेकर, उत्पल दत्त, बिंदिया गोस्वामी और देवेन वर्मा प्रमुख भूमिकाओं में हैं। कहानी एक मध्यमवर्गीय युवक रामप्रसाद दशरथप्रसाद शर्मा के इर्द-गिर्द घूमती है।
ऋषिकेश मुखर्जी के अंतिम पल
प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक, पटकथा लेखक और संपादक ऋषिकेश मुखर्जी ने अपने जीवन की आखिरी फिल्म 'झूठ बोले कौवा काटे' बनाई, जो साल 1998 में रिलीज हुई। 7 अगस्त 2006 को मुंबई के लीलावती अस्पताल में ऋषि दा ने अपनी आखिरी सांसे लीं। उस समय उनकी उम्र 84 वर्ष थी। वे काफी समय से गंभीर रूप से बीमार थे। रिपोर्ट्स के अनुसार उन्हें किडनी की गंभीर बीमारी, निमोनिया और सेप्सिस की समस्या थी और वे नियमित रूप से डायलिसिस करवा रहे थे। यह खबर भी पढ़ें: धोनी- द अनटोल्ड स्टोरी: बच्चे ने माही से क्या पूछा, जो बनी बायोपिक; अक्षय को छोड़ कैसे सुशांत को मिला था रोल? ऋषि दा को मिले यह सम्मान
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