सऊदी अरब को यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ लड़ाई में नई चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। अब तक सबसे बड़े सहयोगी अमेरिका भी ईरान‑समर्थित हूती समूह के साथ सीधे संपर्क में आया है, और ओमान की राजधानी मस्कट में दोनों पक्षों के बीच बातचीत हुई है। हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि इस मुलाकात में कोई औपचारिक समझौता हुआ है या नहीं।
हूती ने पिछले हफ्ते लाल सागर के रणनीतिक बाब अल‑मंदेब स्ट्रेट के पास कई द्वीपों पर काबजा कर लिया, जिससे सऊदी अरब के तेल निर्यात पर सीधा असर पड़ता है। साथ ही वे सऊदी शहरों, तेल‑संबंधी ठिकानों और यहाँ तक कि मक्का में भी ड्रोन व मिसाइल के जरिए अलर्ट जारी कर रहे हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी अधिकारियों और हूती प्रतिनिधिमंडल के बीच पिछले सप्ताहांत मस्कट में ओमान की मध्यस्थता में मुलाकात हुई। हूती टीम में मोहम्मद अब्दुलसलाम, अब्देलमलिक अल‑अजीरी जैसे वरिष्ठ नेता शामिल थे। उन्होंने अमेरिकी अधिकारियों को आश्वासन दिया कि वे अमेरिकी जहाजों को निशाना नहीं बनाएंगे और 2025 के सीज‑फ़ायर समझौते का पालन करेंगे, जबकि इज़राइल के जहाजों को लक्षित करने की बात दोहराई।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने भी कहा कि वॉशिंगटन हूती समूह के साथ सीधे संवाद कर रहा है और स्थिति पर करीबी नज़र रख रहा है।
हालांकि अब तक दोनों पक्षों की ओर से कोई औपचारिक समझौते की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन पूर्व अमेरिकी राजनयिक नबील खौरी ने इसे “अनौपचारिक समझ” कहा है। उनके अनुसार, हूती अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाज़ाही को बाधित नहीं करेंगे, लेकिन सऊदी जहाजों और तेल‑वाहक शिप्स को अभी भी लक्ष्य बनाकर रखेंगे।
यह समझ अमेरिका के लिये भी महत्वपूर्ण हो सकती है। ईरान के साथ चल रहे तनाव के कारण अमेरिकी सैन्य क्षमता यमन में दीर्घकालिक लड़ाई को संभालने में सीमित है। इसलिए लाल सागर में जहाजों की सुरक्षित आवाज़ाही सुनिश्चित करना वॉशिंगटन की प्राथमिकता बन गया है, जिससे सीधी जंग से बचा जा सके।
सऊदी अरब पर बढ़ता दबाव स्पष्ट है। सऊदी‑समर्थित यमनी बल अभी तक हूती की पकड़ को तोड़ नहीं पाए हैं, और कई हवाई हमले भी प्रभावी नहीं साबित हुए। पाकिस्तान, तुर्की और कई अन्य देश ने सऊदी की सीधी सैन्य भागीदारी को अस्वीकार कर दिया है, जबकि अमेरिका और ब्रिटेन ने भी हूती ठिकानों पर सऊदी की एयरस्ट्राइक मांग को नहीं माना। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि सऊदी ने खुफिया सहयोग के लिए इज़राइल से भी संपर्क किया है।
यदि भविष्य में अमेरिकी‑हूती समझौता औपचारिक हो जाता है और हूती केवल अंतरराष्ट्रीय जहाजों को छोड़कर सऊदी शिप्स को ही निशाना बनाते रहते हैं, तो सऊदी अरब को अपने सबसे बड़े सहयोगियों से अपेक्षित सैन्य समर्थन मिलने की संभावना घटेगी, और उसे अकेले ही बढ़ते खतरे का सामना करना पड़ेगा।
इसलिए अभी यह स्पष्ट नहीं है कि यह एक औपचारिक डील है या केवल अनौपचारिक समझ, पर इतना ज़रूर है कि सऊदी अरब को यमन में बढ़ती हूती शक्ति से निपटने के लिये अब और अधिक रणनीतिक विकल्प तलाशने पड़ेंगे।
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