यदि आप बीहड़, डकैत, पुलिस और सियासत की ऐसी कहानियों में रुचि रखते हैं जहाँ गोली चलने से पहले दिमाग चलता है, तो ‘घमासान’ आपके लिये एक रोचक पैकेज है। तिग्मांशु धूलिया फिर से उसी दुनिया में लौटे हैं, जिसे उन्होंने ‘पान सिंह तोमर’ जैसी फ़िल्मों में बखूबी दिखाया था, लेकिन इस बार कहानी बुंदेलखंड में सेट है और मुख्य किरदारों में अरशद वारसी व प्रतीक गांधी हैं।
‘घमासान’ की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि यहाँ हीरो‑विलेन की टक्कर सिर्फ बंदूक‑बारूद की नहीं, बल्कि दिमाग, नेटवर्क, पुलिस, सियासत और पावर की जटिल लड़ाई है। यही कारण है कि फ़िल्म कई मोड़ पर दर्शक को स्क्रीन से जोड़े रखती है।
अरशद वारसी का किरदार पहले के हल्के‑फुल्के कॉमेडी रोल से पूरी तरह अलग है। वे ‘महाराज’ नाम के एक ख़ूंखार डकैत की भूमिका में हैं, जिसका साम्राज्य जंगलों से लेकर राजनीति और पुलिस तक फैला हुआ है। गाँव वाले उससे डरते हैं, पुलिस उसके इशारे पर चलती है और सत्ता भी चुनावी फ़ायदे के लिए उससे हाथ मिलाती है। लंबी नमक‑मिर्च वाली दाढ़ी, भारी‑भरकम अंदाज़ और लगातार मंडराते ख़तरनाक भाव इस किरदार को और डरावना बनाते हैं, लेकिन वह कोई सुपरपावर वाला विलेन नहीं है, जिससे कहानी में रियलिज़्म की झलक मिलती है।
प्रतीक गांधी ‘आदित्य’ नाम के एक सामान्य पुलिस अफसर को निभाते हैं, जो परिवार‑संबंधी ज़िम्मेदारियों के बीच अपने मिशन को आगे बढ़ाता है। वह शुरुआती तौर पर साधारण दिखता है, लेकिन धीरे‑धीरे महाराज के नेटवर्क को तोड़ने के लिए एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम बनाता है, फोन‑टैप करवाता है और डकैत की हर कड़ी को पकड़ने की कोशिश करता है। दोनों किरदार स्क्रीन पर आमने‑सामने नहीं आते, फिर भी उनके बीच की टकराव फ़ोन कॉल और चुनौतियों के माध्यम से लगातार महसूस होती रहती है।
फ़िल्म की असली ताकत छोटी‑छोटी डिटेलिंग में है। शुरुआती सीन में नवविवाहित जोड़े की साधारण झगड़ाहट, या STF द्वारा एक आदमी को ट्रैक करना क्योंकि वह मच्छर भगाने वाली दवा की 30 से अधिक ट्यूब खरीदता है—ऐसी बारीकियां कहानी को ‘डकैत‑बनाम‑पुलिस’ की सामान्य कथा से बचाती हैं और बुंदेलखंड की पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना को बिना लंबे भाषण के उजागर करती हैं।
दृश्यात्मक रूप से भी ‘घमासान’ प्रभावशाली है। सूखे, खुले लैंडस्केप और धूल‑भरी सड़कों ने फ़िल्म को एक वेस्टर्न‑जैसा लुक दिया है। सेट‑प्लेस की असली मिट्टी और धूल दर्शक को कहानी के माहौल में खींच लेती है, जबकि कई OTT प्रोजेक्ट्स में बनावटी सेट और नकली लोकेशन देखने को मिलते हैं।
राजपाल यादव का किरदार भी फ़िल्म में रंगीन पन लाता है, जबकि प्रतीक गांधी ने अपने किरदार में चार्म और गंभीरता का संतुलन बनाए रखा है, जिससे वह न ज़्यादा हीरो बनते हैं और न ही किरदार बोझिल लगता है।
हालाँकि फ़िल्म का अधिकांश भाग दर्शक को बांधे रखता है, लेकिन क्लाइमैक्स में गति बहुत तेज़ हो जाती है और तनाव कम हो जाता है। आखिरी भाग में भावनात्मक इम्पैक्ट की कमी महसूस होती है, जबकि पहले के भागों में निर्मित धैर्य और तनाव का स्तर बहुत ऊँचा था। इस वजह से फ़िल्म का अंतिम प्रभाव अपेक्षित नहीं रह पाता।
तिग्मांशु धूलिया की फ़िल्में अक्सर बीहड़, डकैत और सिस्टम के खिलाफ बगावत की भावना को उजागर करती हैं। ‘घमासान’ में भी वही तत्व मौजूद हैं, पर वह एक ही तीव्र बिंदु पर नहीं टिक पाती। फिर भी, यदि आप डकैत‑ड्रामा, पुलिस‑गैंगस्टर की टकराव, बुंदेलखंड की सच्ची पृष्ठभूमि और बिना ज़्यादा हीरोइज़्म के थ्रिलर चाहते हैं, तो ‘घमासान’ निराश नहीं करेगी।
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