ईओएस‑05, इसरो का नवीनतम अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट, पृथ्वी की सतह की विस्तृत तस्वीरें लेने के लिए जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में भेजा गया है। इसका वजन 2367 किलोग्राम है और यह 35,786 किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थित है, जहाँ यह पृथ्वी के घूमने के साथ तालमेल बनाए रखता है।
सैटेलाइट पर लगे सेंसर पृथ्वी की सतह से मिलने वाली जानकारी को रिकॉर्ड करते हैं, जिसे प्रोसेस करके उच्च‑रिज़ॉल्यूशन इमेज और संबंधित डेटा तैयार किया जाता है। इस डेटा से जमीन की स्थिति, वनस्पति में बदलाव, फसल की वृद्धि और आपदा‑ग्रस्त क्षेत्रों की स्थिति का पता लगाया जा सकता है।
उदाहरण के तौर पर, बाढ़ के दौरान ईओएस‑05 की तस्वीरों से पानी के फैलाव का क्षेत्रफल तुरंत पता चल सकता है, जबकि जंगल में आग लगने पर जलन के विस्तार की निगरानी की जा सकती है। कृषि में फसल की वृद्धि और वनस्पति की स्थिति पर नजर रखने के लिए भी यह सैटेलाइट उपयोगी है।
ईओएस‑05 को भारत के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से GSLV‑F17 रॉकेट द्वारा लॉन्च किया गया। GSLV‑F17 की लंबाई 51.7 मीटर और लिफ़्ट‑ऑफ मास 420.5 टन है। रॉकेट के तीन मुख्य स्टेज – GS‑1, GS‑2 और GS‑3 – क्रमशः एस‑139, एल‑40एच, जीएल‑40एचटी और सीयूएस‑15 प्रोपेलेंट का उपयोग करते हैं।
रॉकेट के पहले स्टेज के बाद GS‑1 अलग हो जाता है, फिर GS‑2 सक्रिय होता है, और अंत में GS‑3 सैटेलाइट को सब‑जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (सब‑GTO) में पहुँचाता है। यह एक अण्डाकार ऑर्बिट है, जहाँ पेरिजी 170 किमी और एपोजी 28,934 किमी है।
सब‑GTO से सैटेलाइट अपने प्रोपल्शन सिस्टम के जरिए धीरे‑धीरे अपनी ऊँचाई बढ़ाता है और जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में पहुँचता है। इस प्रक्रिया में सैटेलाइट के इंजन कई बार चलाए जाते हैं, जिससे उसकी कक्षा में आवश्यक परिवर्तन होता है।
जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में स्थित होने के कारण, ईओएस‑05 पृथ्वी के एक ही क्षेत्र को लगातार देख सकता है, जिससे समय‑समय पर होने वाले परिवर्तनों की निगरानी संभव होती है।
ईओएस‑05 के अलावा, इसरो ने अन्य मिशनों पर भी काम किया है। गगनयान कार्यक्रम के तहत भारत तीन अंतरिक्ष यात्रियों को 400 किमी की ऑर्बिट में तीन दिन के मिशन पर भेजने की योजना बना रहा है। भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन की योजना 2028 तक पहला मॉड्यूल और 2035 तक पूरा स्टेशन लॉन्च करने की है।
स्पैडेक्स‑2 और स्पैडेक्स‑3 मिशनों में डॉकिंग और अनडॉकिंग तकनीक को आगे बढ़ाया जा रहा है, जिससे भविष्य के चंद्रयान‑4, गगनयान और भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन में उपयोगी क्षमताएँ विकसित होंगी।
शुक्रयान (वीनस ऑर्बिटर) मिशन को मार्च 2028 में लॉन्च करने का लक्ष्य है, जो शुक्र ग्रह की भूगर्भीय संरचना, वायुमंडल और आयनमंडल का अध्ययन करेगा। इस मिशन में एरोब्रेकिंग और थर्मल मैनेजमेंट जैसी उन्नत तकनीकों का भी प्रदर्शन किया जाएगा।
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