दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर बने जबरदस्त उत्साह के बीच भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) वी. अनंत नागेश्वरन ने एक बड़ी वित्तीय चेतावनी जारी की है। उन्होंने साफ किया है कि यदि एआई को लेकर आज जो भारी उम्मीदें जताई जा रही हैं, वे आगे चलकर गलत साबित होती हैं, तो इसका वित्तीय और आर्थिक हर्जाना वित्त मंत्रालयों, केंद्रीय बैंकों और आम परिवारों (हाउसहोल्ड्स) को भुगतना पड़ेगा। नागेश्वरन के अनुसार, यदि एआई की उम्मीदें पूरी हो भी जाती हैं, तब भी इन संस्थाओं और आम जनता को इसका कुछ न कुछ बिल तो चुकाना ही पड़ेगा। एआई तकनीक से जुड़े आर्थिक और सामाजिक परिदृश्य को रेखांकित करते हुए उन्होंने पांच प्रमुख जोखिमों की पहचान की है।
मुख्य आर्थिक सलाहकार नागेश्वरन द्वारा रेखांकित पहला बड़ा जोखिम नौकरियों, विशेष रूप से करियर की शुरुआती सीढ़ी (एंट्री-लेवल जॉब्स) पर पड़ रहा प्रतिकूल प्रभाव है। कंपनियां अब जूनियर कर्मचारियों की भर्ती में कटौती कर रही हैं। 41 देशों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि जिन 31 देशों का मापन संभव था, उनमें से 23 देशों में कार्यबल (वर्कफोर्स) में जूनियर कर्मचारियों की हिस्सेदारी में भारी गिरावट आई है।
नागेश्वरन के अनुसार, दूसरा बड़ा जोखिम मानव क्षमताओं और मानसिक दक्षता में आ रही गिरावट है। एमआईटी मीडिया लैब के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए चार महीने के एक अध्ययन का संदर्भ देते हुए उन्होंने बताया कि जो प्रतिभागी निबंध लिखने के लिए एआई मॉडल (जैसे चैटजीपीटी) पर निर्भर थे, उनके मस्तिष्क की गतिविधियों और तंत्रिका जुड़ाव (ब्रेन एक्टिविटी एंड कनेक्टिविटी) में कमजोरी देखी गई।
मुख्य आर्थिक सलाहकार ने तीसरे और पांचवें जोखिम के रूप में सुरक्षा और सार्वजनिक वित्त से जुड़ी चिंताओं को रखा है। एआई प्रौद्योगिकियों का अनियंत्रित प्रसार जहां एक ओर सुरक्षा और गोपनीयता के लिए खतरे पैदा करता है, वहीं दूसरी ओर इसके कारण सरकारी खजाने व सार्वजनिक वित्त प्रबंधन पर भी अतिरिक्त भार पड़ने की आशंका है।
चौथा सबसे महत्वपूर्ण जोखिम एआई के वित्तपोषण और भारी पूंजीगत खर्च से जुड़ा हुआ है। अमेरिकी आंकड़ों के अनुसार, केवल अमेरिका में डेटा सेंटरों के निर्माण के लिए वर्ष 2032 तक 10 ट्रिलियन (10,000 अरब) डॉलर से अधिक की आवश्यकता हो सकती है, जो वहां के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लगभग 3.6% वार्षिक के बराबर है। नागेश्वरन ने आगाह किया कि इतिहास में पहली बार, बड़ी क्लाउड कंपनियां अपने नकद संग्रह (कैश जनरेशन) से ज्यादा पैसा कैपिटल एक्सपेंडिचर (कैपेक्स) पर खर्च कर रही हैं। कंपनियों की बैलेंस शीट में आ रहे इस वित्तीय अंतर (गैप) को भरने के लिए अब तेजी से कर्ज का सहारा लिया जा रहा है, जो वित्तीय स्थिरता के लिए एक नया जोखिम बन सकता है।
मुख्य आर्थिक सलाहकार अनंत नागेश्वरन के इस विस्तृत विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि एआई क्रांति केवल तकनीकी बदलाव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी वित्तीय, सामाजिक और राजकोषीय परिणाम भी हैं। उन्होंने संकेत दिया है कि भविष्य में सरकारें इन पांच जोखिमों को कम करने के लिए संभावित नीतिगत कदम उठाने की दिशा में विचार कर सकती हैं। नीति निर्माताओं, केंद्रीय बैंकों और कॉरपोरेट जगत को एआई के अंधाधुंध उपयोग से बचते हुए मानव पूंजी के संरक्षण, जिम्मेदार वित्तपोषण और वित्तीय जोखिमों के प्रबंधन को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल करना होगा।
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