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पैकेटबंद खाना खरीदते समय हम आमतौर पर उसकी कीमत, स्वाद और ब्रांड देखते हैं, लेकिन पैकेट पर लिखी निर्माण तारीख, समाप्ति तारीख और 'बेस्ट बिफोर' को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। हाल के दिनों में एक्सपायरी खाद्य पदार्थों की तारीख बदलकर उन्हें दोबारा बेचने के मामले सामने आए हैं।
मुंबई: 75 लाख रुपये से ज्यादा का एक्सपायरी खाना महाराष्ट्र के नवी मुंबई के तुर्भे इलाके में खाद्य एवं औषधि प्रशासन और पुलिस ने एक पैकेजिंग परिसर पर कार्रवाई की। यहां 4,942 कार्टन एक्सपायरी खाद्य पदार्थ मिले, जिनकी कीमत 75 लाख रुपये से ज्यादा बताई गई। अधिकारियों के अनुसार इन खाद्य पदार्थों की निर्माण और समाप्ति तारीख में छेड़छाड़ की गई थी। .ads-row{display:flex;gap:10px;flex-wrap:wrap;}
खाद्य पदार्थों की लेबलिंग, निर्माण/पैकिंग की तारीख, समाप्ति/उपयोग की अंतिम तारीख और 'बेस्ट बिफोर' से जुड़े प्रावधान एफएसएसएआई के खाद्य सुरक्षा एवं मानक (लेबलिंग एवं प्रदर्शन) विनियम, 2020 के तहत आते हैं। शेल्फ लाइफ क्या है? खाद्य उत्पाद की शेल्फ लाइफ से जुड़ी जानकारी के आधार पर उसके लेबल पर निर्माण या पैक करने की तारीख और समाप्ति/उपयोग की अंतिम तारीख दी जाती है। 'बेस्ट बिफोर' को वैकल्पिक या अतिरिक्त जानकारी के तौर पर दिया जा सकता है। 'बेस्ट बिफोर' क्या बताता है? एफएसएसएआई के अनुसार ‘बेस्ट बिफोर’ वह तारीख है जिसके अंत तक तय भंडारण परिस्थितियों में खाद्य उत्पाद बिक्री योग्य रहता है और अपनी बताई गई विशेष गुणवत्ता बनाए रखता है। इस तारीख के बाद खाद्य पदार्थ जरूरी नहीं कि तुरंत असुरक्षित हो जाए। उसकी गुणवत्ता कम हो सकती है। लेकिन अगर उत्पाद असुरक्षित हो जाता है तो उसे बेचा नहीं जा सकता। समाप्ति/उपयोग की अंतिम तारीख खाद्य पदार्थ के लेबल पर समाप्ति/उपयोग की अंतिम तारीख दी जाती है। अगर इस तारीख की वैधता किसी खास भंडारण स्थिति पर निर्भर करती है तो वह स्थिति भी लेबल पर बतानी होती है।
सात दिन या उससे कम शेल्फ लाइफ वाले खाद्य पदार्थों पर निर्माण की तारीख लिखना जरूरी नहीं हो सकता, लेकिन समाप्ति/उपयोग की अंतिम तारीख लिखना जरूरी है। अगर किसी मिश्रित पैकेट में अलग-अलग खाद्य पदार्थ हैं तो उसकी घोषित शेल्फ लाइफ सबसे कम शेल्फ लाइफ वाले उत्पाद के आधार पर होगी।
खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 की धारा 27 के तहत थोक विक्रेता या वितरक अगर खाद्य पदार्थ को उसकी समाप्ति तारीख के बाद सप्लाई करता है तो उसकी जिम्मेदारी तय की गई है। अगर खाद्य पदार्थ असुरक्षित है तो धारा 59 के तहत नुकसान की गंभीरता के आधार पर सजा हो सकती है।
कानून में नुकसान में स्थायी या अस्थायी शारीरिक क्षति को शामिल किया गया है। अगर खाद्य पदार्थ खाने से उपभोक्ता को नुकसान या मौत होती है तो धारा 65 के तहत मुआवजे का भी प्रावधान है। मौत पर कम से कम पांच लाख रुपये, गंभीर नुकसान पर तीन लाख रुपये तक और अन्य नुकसान पर एक लाख रुपये तक मुआवजा दिया जा सकता है। गंभीर चोट या मौत के मामले में लाइसेंस रद्द करने, बाजार से खाद्य पदार्थ वापस मंगाने और प्रतिष्ठान या संपत्ति जब्त करने का आदेश भी दिया जा सकता है।
उजाला सिग्नस अस्पताल के संस्थापक निदेशक डॉ. शुचिन बजाज ने बताया कि अगर आप एक्सपायर्ड खाना खाते हैं तो यह शरीर के लिए बहुत हानिकारक हो सकता है। पहला, खाने का पोषण मूल्य कम हो जाता है और दूसरा, संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इसमें कीटाणु, बैक्टीरिया और वायरस फैलने का खतरा भी बढ़ सकता है। हालांकि, यह खाने की पैकेजिंग पर भी निर्भर करता है। अगर कोई सूखा खाना है और वैक्यूम पैक किया गया है, तो संक्रमण का खतरा कम हो सकता है, लेकिन उसकी गुणवत्ता कम हो सकती है। वहीं, अगर खाना गीला है तो उसमें खतरनाक बैक्टीरिया बहुत जल्दी पनप सकते हैं। इससे इसे खाने वाले व्यक्ति को फूड पॉइजनिंग, डायरिया और बुखार हो सकता है। इसका असर कुछ घंटों से लेकर कुछ दिनों तक रह सकता है। लोगों में यह गलतफहमी है कि अगर ऐसे खराब खाने को गर्म या उबाल दिया जाए तो खतरा टल जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं है। ऐसे खाद्य पदार्थ खाने से गंभीर संक्रमण भी हो सकते हैं। खासकर छोटे बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं के लिए ऐसा खाना ज्यादा हानिकारक हो सकता है। साथ ही, जो लोग पहले से बीमार हैं या जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है, उन्हें भी खतरा हो सकता है। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि खाने को देखकर हमेशा पता नहीं चलता कि वह सुरक्षित है या नहीं। कई बार खाने की महक और स्वाद भी सामान्य होता है। ऐसे में हमें बहुत सावधानी बरतनी चाहिए और भरोसेमंद आपूर्ति श्रृंखला से ही खाना खरीदना चाहिए। खाने को किस तरह और किस तापमान पर रखा गया है, यह भी उसकी समाप्ति तारीख जितना ही महत्वपूर्ण है। अगर खाने का पैकेट फट गया हो या उसे गर्म तापमान में रखा गया हो तो वह समाप्ति तारीख से पहले भी खराब हो सकता है। ऐसे मामले खासकर डेयरी और मांसाहारी उत्पादों में देखने को मिलते हैं। डॉ. बजाज ने कहा, “जब संदेह हो, तो फेंक दें।” यानी खाने की सुरक्षा को लेकर थोड़ा भी शक हो तो उसे खाने के बजाय फेंक देना बेहतर है।
इस बीच भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने पैकेटबंद खाद्य पदार्थों और पेय पदार्थों के सामने लाल रंग का हेक्सागोन यानी छह कोनों वाला चेतावनी निशान लगाने का प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा है। इसमें जरूरत के अनुसार अधिक चीनी, अधिक नमक, अधिक फैट या अधिक मीठा पेय जैसी चेतावनी दी जा सकती है। इसका उद्देश्य उपभोक्ता को पैकेट के सामने ही यह जानकारी देना है कि उत्पाद में चिंता वाले पोषक तत्वों की मात्रा अधिक है। यह कैसे लागू होगा? एफएसएसएआई के प्रस्ताव के मुताबिक इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाना है। पहले चरण में ऐसे प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों पर चेतावनी लगाने का प्रस्ताव है, जिनमें चीनी, नमक या वसा में से कम से कम दो की मात्रा तय सीमा से अधिक होगी। बाद के चरण में यह व्यवस्था और सख्त करने का प्रस्ताव है, जिसमें इनमें से किसी एक की मात्रा अधिक होने पर भी चेतावनी लग सकती है।
भारत में अभी यह प्रस्ताव है, लेकिन कई देशों में पैकेट के सामने चेतावनी या पोषण संबंधी लेबल पहले से लागू हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, कई देशों ने फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग को उपभोक्ताओं को पोषण संबंधी जानकारी समझाने और बेहतर खाद्य विकल्प चुनने में मदद करने के लिए अपनाया है।
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