कठुआ में स्थित सीआईएसएफ शिविर में एक हेड कांस्टेबल ने बहस के बाद सहकर्मियों पर गोलीबारी कर दी, जिससे असिस्टेंट कमांडेंट अंकित कुमार पांडे, सब-इंस्पेक्टर लक्ष्मण सिंह, कांस्टेबल रफीक अहमद और संदीप कुमार की मौत हो गई। आरोपी हिरासत में है।
यह घटना अकेली नहीं है। 4 अगस्त 2026 को असम के नगांव में सीआरपीएफ की 34वीं बटालियन के शिविर में भी एक सहायक उप-निरीक्षक ने सहकर्मियों को गोली मारी, एक को घायल किया और स्वयं को गोली मार ली। 2025 के फरवरी में मणिपुर के एक शिविर में भी इसी तरह की फायरिंग हुई।
गृह मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, 2021‑2025 के बीच सहकर्मियों पर गोलीबारी में लगभग 40 जवान मारे गए, जबकि 2010‑2025 के बीच सीआरपीएफ में 30 ऐसी घटनाओं में 40 से अधिक जानें गईं। 2023‑2025 के बीच केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों, असम राइफल्स और एनएसजी में 438 आत्महत्या और सात फ्रेट्रीसाइड दर्ज हुए, जबकि 2020‑2024 में यह संख्या लगभग 730 तक पहुँच गई। उसी अवधि में हजारों जवानों ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति या इस्तीफा दिया।
इन आँकड़ों ने सरकार को 2021 में एक कार्यबल गठित करने के लिए प्रेरित किया, जिसने आत्महत्या और फ्रेट्रीसाइड के तीन प्रमुख कारणों को उजागर किया: सेवा शर्तें, कार्य स्थितियाँ और व्यक्तिगत दबाव। कार्यबल ने पाया कि अपमान, बुलीइंग, गाली-गलौज, उप-समूहों में भेदभाव और कमांडर से संवाद की कमी भी प्रमुख कारक हैं। लगभग 80 % आत्महत्या छुट्टी से लौटने के सात से पंद्रह दिनों के भीतर होती है।
कठुआ के मामले में भी इसी तरह की समस्याएँ पाई गईं। बाराबंकी के एक पीएसी जवान का वीडियो वायरल हुआ, जिसमें उन्होंने बैरक को “तबेले जैसा” बताया, बिस्तर पर सांप आने, शौचालय स्वयं साफ करने, खराब खाने और बच्चे के जन्म पर छुट्टी न मिलने की शिकायत की। विभाग ने वीडियो को भ्रामक कहा, पर यह सवाल उठाता है कि क्या वर्दीधारी जवानों को अपनी शिकायतें व्यक्त करने का सही मंच मिलता है।
साथियों की हत्या का कोई औचित्य नहीं है; तनाव अपराध को माफ नहीं करता। लेकिन राज्य केवल सजा देकर समस्या हल नहीं कर सकता। अर्धसैनिक बलों में सेना जैसी कठोरता और पुलिस जैसी निरंतर उपलब्धता दोनों की ज़रूरत है। सीमा, नक्सल क्षेत्र, चुनाव, हवाई अड्डे और बिजलीघर जैसी जगहों पर वे ही जिम्मेदार हैं। रिक्तियों के कारण मौजूदा जवानों पर बोझ बढ़ता है, और पारिवारिक आवास की कमी उन्हें लंबे समय तक अकेला रखती है। छुट्टियाँ कागज पर बेहतर दिखती हैं, पर मैदान में मंजूरी अक्सर अधिकारियों की दया पर निर्भर करती है।
इस संकट से बचने के लिए दो अतियों से बचना आवश्यक है। पहली, यह कहना कि पूरी व्यवस्था टूट गई है; लाखों जवान कठिन परिस्थितियों में डटे हुए हैं। दूसरी, यह कहना कि वर्दीधारी को शिकायत का अधिकार नहीं है। राष्ट्रभक्ति गंदे बैरक या परिवार से वर्षों की जुदाई का विकल्प नहीं है। साफ पानी, खाने योग्य भोजन, साफ शौचालय और बच्चे के जन्म पर छुट्टी सामान्य अपेक्षा होनी चाहिए।
कार्यबल की सिफ़ारिशों में रिक्तियों को भरना, पारदर्शी अवकाश प्रणाली, पदोन्नति के रास्ते और वरिष्ठों द्वारा गाली-गलौज बंद करना शामिल है। मानसिक स्वास्थ्य जाँच छुट्टी से लौटने पर होनी चाहिए, पर मदद मांगने से कैरेक्टर सर्टिफिकेट पर असर नहीं पड़ना चाहिए। थका और अपमानित जवान सतर्क नहीं रह सकता और न ही स्थिर रह सकता है।
कठुआ की जांच पूरी हो और दोष सिद्ध होने पर कड़ी सजा मिले। सरकार को यह भी देखना चाहिए कि 2021 की कार्यबल रिपोर्ट के बाद भी नगांव और कठुआ जैसी घटनाएँ क्यों दोहराई गईं। देश जवान से बलिदान मांगता है, पर जवान भी सम्मान के साथ जीने योग्य सेवा‑शर्तें मांगता है। जब रक्षक स्वयं असुरक्षित महसूस करने लगते हैं, तो सुरक्षा केवल बयानबाजी रह जाती है। वर्दी की शान परेड मैदान में नहीं, बल्कि बैरक की गरिमा और शिविर के अनुशासन में तय होती है।
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