गंगा के तट पर बसा बिजनौर जिला अपनी हरियाली, गन्ने की खेती, चीनी मिलों और ऐतिहासिक स्थलों के लिए प्रसिद्ध है। महात्मा विदुर से जुड़ी मान्यताओं के कारण इसे ‘विदुर भूमि’ भी कहा जाता है। यहाँ की राजनीति को समझने के लिए कृषि, सामाजिक समीकरण और पिछले चुनावों के नतीजों को साथ रखकर देखना आवश्यक है।
बिजनौर मुख्य रूप से कृषि प्रधान जिला है, जहाँ गन्ने के साथ गेहूं और धान की खेती बड़े पैमाने पर होती है। गन्ने की पैदावार जिले की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। चीनी मिलों के अलावा ग्रामीण इलाकों में कोल्हू और गन्ना क्रेशर भी स्थानीय रोजगार और कारोबार का हिस्सा हैं, जिससे चीनी और गुड़ का उत्पादन होता है। गन्ने के किसानों के लिए फसल का उचित मूल्य, भुगतान में देरी, खेती की लागत और सिंचाई जैसे मुद्दे अहम हैं, जो ग्रामीण परिवारों की आमदनी पर गहरा असर डालते हैं और चुनावी चर्चा में कृषि से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता देते हैं।
बिजनौर की भौगोलिक स्थिति भी इसे खास बनाती है। इसकी सीमाएँ उत्तराखंड के आसपास के क्षेत्रों से लगती हैं, और हरियाली व कृषि भूमि के कारण जिले के बड़े हिस्से में ग्रामीण जीवन की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। देहरादून यहाँ से अपेक्षाकृत नजदीक है, जबकि राजधानी लखनऊ से दूरी अधिक है।
इतिहास और धार्मिक पहचान भी जिले की खासियत है। मान्यता है कि महाभारत काल में महात्मा विदुर हस्तिनापुर छोड़कर यहाँ आकर रहने लगे थे, और गंगा किनारे उनकी कुटिया होने के कारण इस स्थान को ‘विदुर कुटी’ कहा जाता है, जो बिजनौर शहर से लगभग 10 किलोमीटर दूर है। जिले में कण्व आश्रम, विदुर कुटी, नजीबुद्दौला का किला, पारसनाथ का किला और जोगीरमपुरी की दरगाह-ए-आलिया नजफे हिंद जैसी ऐतिहासिक व धार्मिक स्थल हैं, जो सांस्कृतिक विविधता की झलक दिखाते हैं।
2011 की जनगणना के अनुसार, बिजनौर की आबादी करीब 36.08 लाख थी, जिसमें हिंदू 55 प्रतिशत और मुस्लिम 45 प्रतिशत हैं। हिंदू आबादी में दलित समुदाय की भी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है, और जाट, चौहान तथा त्यागी जैसे समुदायों का भी अलग-अलग क्षेत्रों में प्रभाव है। मुस्लिम मतदाता भी जिले के चुनावी समीकरणों में अहम भूमिका निभाते हैं।
बिजनौर जिले में आठ विधानसभा सीटें हैं: बिजनौर, चांदपुर, नूरपुर, धामपुर, बढ़ापुर, नगीना, नजीबाबाद और नहटौर। इनमें नगीना और नहटौर अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटें हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और समाजवादी पार्टी (SP) के बीच मुकाबला देखने को मिला, जहाँ दोनों दलों ने चार-चार सीटों पर जीत दर्ज की। सीटवार नतीजों में जीत का अंतर भी अलग-अलग रहा।
चांदपुर में समाजवादी पार्टी के स्वामी ओमवेश ने भाजपा के कमलेश सैनी को 234 वोटों से हराया। धामपुर में भाजपा के अशोक कुमार राणा ने सपा के नईम उल हसन को 203 वोटों से हराया। नगीना में सपा के मनोज कुमार ने भाजपा के डॉ. यशवंत सिंह को 26,000 से अधिक वोटों से हराया। नजीबाबाद में सपा के तसलीम अहमद ने भाजपा के राजा भारतेंद्र सिंह को 23,770 वोटों से हराया। नहटौर में भाजपा के ओमकुमार ने रालोद के मुंशीराम को मात्र 258 वोटों से हराया। नूरपुर में सपा के राम अवतार सिंह ने भाजपा के चंद्र प्रकाश को 6,065 वोटों से हराया। बढ़ापुर में भाजपा के कुंवर सुशांत सिंह ने सपा के कपिल कुमार को 14,345 वोटों से हराया। बिजनौर में भाजपा की सुचि ने रालोद के नीरज चौधरी को 1,445 वोटों से हराया।
2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जिले की आठ में से छह सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि नगीना और नजीबाबाद में समाजवादी पार्टी को जीत मिली थी। नूरपुर सीट पर उपचुनाव हुआ, जहाँ भाजपा विधायक की सड़क दुर्घटना में मृत्यु के बाद हुए उपचुनाव में सपा के नईमुल हसन ने जीत दर्ज की। 2017 और 2022 के नतीजों की तुलना करने पर स्पष्ट है कि बिजनौर में चुनावी समीकरण स्थायी नहीं हैं और मतदाताओं का रुख बदल सकता है।
लोकसभा चुनावों में भी अलग तस्वीर दिखी। बिजनौर जिले में बिजनौर और नगीना दो लोकसभा सीटें हैं। 2019 के चुनाव में बसपा-सपा गठबंधन को दोनों सीटों पर सफलता मिली थी, जहाँ बसपा के मलूक नागर और गिरीश चंद्र सांसद बने। 2024 के लोकसभा चुनाव में दोनों सीटों के नतीजे बदल गए: बिजनौर सीट पर राष्ट्रीय लोकदल के चंदन चौहान ने समाजवादी पार्टी के दीपक को हराया, जबकि नगीना सीट से आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के चंद्रशेखर ने जीत दर्ज की। भाजपा ने नगीना सीट पर ओम कुमार को उम्मीदवार बनाया था, जो नहटौर से तीन बार विधायक रहे थे।
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