ग्रेटर नोएडा में एक स्लीपर बस में लगी आग में नौ यात्रियों की मौत हो गई, जिससे स्लीपर बसों की सुरक्षा फिर से गंभीर सवालों के घेरे में आ गई। ऐसी बसों में आग लगने पर यात्रियों के पास बच निकलने के लिए बहुत कम समय रहता है।
बेसिक कारणों में से एक खराब वायरिंग है। मूल वाहन निर्माता (OEM) आधुनिक वायरिंग सिस्टम अपनाते हैं, पर कई बार स्थानीय बॉडी बिल्डर सस्ते और कम गुणवत्ता वाले पुर्ज़े लगाते हैं। जब तार गर्म होते हैं तो उनकी इंसुलेशन जल सकती है, जिससे चिंगारी निकलती है और आग तेज़ी से पूरे बस में फैल सकती है।
बस की सुरक्षा केवल निर्माण तक सीमित नहीं, बल्कि सड़क पर उतरने के बाद उसकी नियमित जांच भी उतनी ही जरूरी है। अनधिकृत बदलाव, अतिरिक्त बर्थ, आपातकालीन रास्तों का बंद होना, खराब वायरिंग या अग्निशमन उपकरणों की कमी जैसी खामियों को समय पर पकड़ना चाहिए। निगरानी व्यवस्था कमजोर होने पर ये खामियां लंबे समय तक बनी रह सकती हैं।
कई बसें अरुणाचल प्रदेश या नगालैंड जैसे दूरस्थ राज्यों में पंजीकृत होती हैं, पर हजारों किलोमीटर दूर अन्य राज्यों में चलती हैं। इससे वास्तविक फिटनेस परीक्षण और स्थानीय निगरानी में अंतर आ जाता है, क्योंकि जहाँ बस चलती है वहाँ की जांच सीमित रह सकती है।
हाल ही में सड़क परिवहन मंत्रालय की एक हितधारक बैठक में कस्टमाइज़्ड स्लीपर बसों पर पूरी तरह रोक और केवल OEM द्वारा निर्मित बसों को अनुमति देने की संभावना पर चर्चा हुई। 2012 में चीन ने कई घातक हादसों के बाद सभी स्लीपर बसों की बिक्री पर रोक लगा दी थी। भारत में सवाल यह है कि नियमों को कड़ा करना ही पर्याप्त होगा या वास्तविक जांच और संचालन की निरंतर निगरानी भी उतनी ही ज़रूरी है।
इन घटनाओं में प्रभावित यात्रियों में से अधिकांश ऐसे लोग हैं जिनके पास महंगी बस या ट्रेन का विकल्प नहीं होता। वे लंबी दूरी के सफर के लिए स्लीपर बस चुनते हैं और सुरक्षा पर भरोसा करते हैं। अगर आपातकालीन निकास सीमित हों, फायर फाइटिंग उपकरण न हों और वायरिंग या ज्वलनशील सामग्री आग को तेजी से फैलाए, तो साधारण यात्रा भी घातक बन सकती है।
राजस्थान में हाल की घटनाओं के बाद राज्य परिवहन विभाग ने निजी ऑपरेटरों और बस बॉडी निर्माताओं की जांच कड़ी करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। फिटनेस, फायर सेफ्टी सिस्टम और बिना अनुमति के किए गए बदलावों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
एक ही घटना के बाद कुछ दिनों की सख्ती पर्याप्त नहीं होगी। बसों की फिटनेस जांच लगातार चलनी चाहिए, प्रशिक्षित तकनीकी कर्मचारियों की कमी को दूर करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि रजिस्ट्रेशन के बाद कोई अनधिकृत बदलाव न किया गया हो जो यात्रियों की सुरक्षा को खतरे में डालता हो। स्लीपर बसों में अतिरिक्त बर्थ लगाकर यात्रियों की संख्या बढ़ाने से आपातकालीन रास्ते कम हो सकते हैं, जो सुरक्षा जोखिम को बढ़ाता है।
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