नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की शुरुआत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि ग्लोबल साउथ को अब नियम मानने वाला नहीं, बल्कि नियम बनाने वाला बनना चाहिए और इस परिवर्तन में भारत अग्रणी भूमिका निभाने को तैयार है।
‘रूल‑टेकर’‑‘रूल‑शेपर’ की शब्दावली से उनका मतलब है कि विकासशील देशों को अब केवल निर्णयों को अपनाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें बनाने में भी भागीदारी मिलनी चाहिए। वर्तमान वैश्विक शासन का ढांचा पिरामिड जैसा दिखता है, जहाँ ऊपरी स्तर पर शक्ति और निर्णय‑निर्माण केंद्रित है, जबकि निचले स्तर के ग्लोबल साउथ के देश प्रभाव तो महसूस करते हैं पर आकार नहीं दे पाते।
प्रधानमंत्री ने इस पिरामिड‑ऑफ़‑प्रिविलेज को ‘पार्टनरशिप प्लेटफ़ॉर्म’ में बदलने की बात की और ग्लोबल गवर्नेंस रिफॉर्म के लिए 10 प्रस्तावों का मसौदा तैयार करने का प्रस्ताव रखा। यह रोडमैप अगले ब्रिक्स summit तक अंतिम रूप दिया जाएगा।
‘ग्लोबल साउथ’ कोई आधिकारिक संगठन नहीं है; यह शब्द उन देशों के समूह को दर्शाता है जो ऐतिहासिक रूप से आर्थिक और राजनीतिक रूप से कम प्रभावशाली रहे हैं। इसमें एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, कैरेबियन और प्रशांत क्षेत्र के कई विकासशील देश शामिल हैं – जैसे भारत, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया और कई अफ्रीकी राष्ट्र।
इन देशों ने औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता प्राप्त कर आर्थिक विकास, गरीबी, कर्ज और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में सीमित प्रतिनिधित्व जैसी चुनौतियों का सामना किया है। मोदी ने इन देशों को उचित प्रतिनिधित्व दिलाने और उन्हें नीति‑निर्माण में शामिल करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।
उन्होंने कहा कि ब्रिक्स के माध्यम से ग्लोबल साउथ के युवा कूटनीतिज्ञों और नीति‑निर्माताओं को बातचीत कौशल, व्यावहारिक प्रशिक्षण और कानूनी विशेषज्ञता प्रदान की जा सकती है। साथ ही, संयुक्त राष्ट्र दिवस ‘साउथ‑साउथ को‑ऑपरेशन’ के अवसर पर भारत इस दिशा में नेतृत्व करने को तैयार है।
रिफॉर्म के तीन मुख्य स्तंभ – प्रतिनिधित्व (Representation), उत्तरदायित्व (Responsiveness) और नियम‑निर्माण (Rule‑Making) – पर विशेष ध्यान दिया गया। प्रतिनिधित्व के तहत यूएन सुरक्षा परिषद में सुधार को टाल नहीं सकते; वित्तीय संस्थानों में वोटिंग पावर को आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप होना चाहिए।
उत्तरदायित्व के संदर्भ में कहा गया कि वैश्विक संस्थाओं को समस्याओं का तेज़, व्यापक और अंतिम‑स्तर तक प्रभावी समाधान देना चाहिए। सामूहिक प्रतिक्रिया की गति, पैमाना और ‘लास्ट माइल’ इम्पैक्ट को बढ़ाना आवश्यक है।
समुद्री क्षेत्र में भी पहल की बात हुई। मोदी ने ‘सीफ़ेरर इमरजेंसी सपोर्ट नेटवर्क’ की प्रस्तावना रखी, जिससे कठिन परिस्थितियों में जहाज़ों को अलर्ट, मेडिकल सहायता, परिवार को सूचना और सुरक्षित निकासी जैसी मदद मिल सके।
ब्रिक्स की 20वीं वर्षगांठ को ‘कमिंग ऑफ एज’ कहा गया, जहाँ पिछले दो दशकों में समूह ने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान बनाई है। अब इसे नई, महत्वाकांक्षी एजेंडा और निरंतरता‑केन्द्रित कार्यान्वयन तंत्र की जरूरत है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि ब्रिक्स सदस्य एक‑दूसरे का सम्मान करते हुए सहयोगी रवैया अपनाते हैं; कोई भी विरोधी नहीं है। उन्होंने ‘निरंतरता और कार्यान्वयन तंत्र’ के तहत ट्रोइका (Troika) द्वारा सभी पहलों की फॉलो‑अप की व्यवस्था करने का प्रस्ताव रखा।
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