भारत का चुनाव आयोग लोकतंत्र का प्रमुख पहरेदार है, जिसकी तीन सदस्यीय संवैधानिक संरचना से एकरूपता की उम्मीद की जाती है। लेकिन वास्तविकता में आयोग के भीतर अक्सर मतभेद भी होते हैं।
हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के बीच SIR प्रक्रिया में 10 महीनों में कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्ति दर्ज हुई। इस खुलासे पर विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की और मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की भी पुकार की।
आयोग के सूत्रों ने बताया कि संधू और जोशी ने वोटर लिस्ट क्लीन‑अप के दौरान कुछ राज्यों में नाम हटाने और वोटर डेटाबेस के प्रबंधन को लेकर चिंताएँ जताई थीं।
ऐसी असहमति का इतिहास बहुत पुराना है। 1990‑के दशक में मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन और आयुक्त एमएस गिल व जीवीजी कृष्णमूर्ति के बीच गंभीर टकराव हुआ था।
1993 में राष्ट्रपति ने दो अतिरिक्त आयुक्तों को नियुक्त किया, जिससे आयोग एक सदस्यीय से बहुसदस्यीय बना। शेषन ने इस बदलाव को चुनौती दी, लेकिन जुलाई 1995 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने स्पष्ट किया कि बहुसदस्यीय चुनाव आयोग संविधान द्वारा मान्य है और निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जाएगा।
1995 में गिल ने आरोप लगाया कि शेषन उन्हें और कृष्णमूर्ति को पर्याप्त रूप से निर्णय‑प्रक्रिया में शामिल नहीं कर रहे थे। शेषन पर भी आयुक्तों को मीटिंग में नहीं बुलाने, कागजात नहीं दिखाने और अकेले फैसले लेने का आरोप लगा। दोनों पक्षों ने पत्र‑विनिमय, सार्वजनिक बयान और मीडिया में चर्चा के माध्यम से असहमति को बढ़ा‑चढ़ा कर पेश किया।
2009 में मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने अपने सहयोगी नवीन चावला को हटाने की सिफारिश की, जिससे आयोग के भीतर गहरा विभाजन पैदा हुआ। राष्ट्रपति ने इस सिफारिश को खारिज कर दिया और चावला अप्रैल 2009 में मुख्य चुनाव आयुक्त बने। यह मामला दर्शाता है कि एक CEC भी अपने ही साथी आयुक्त को हटाने की सिफारिश कर सकता है।
2019 के लोकसभा चुनाव में आयुक्त अशोक लवासा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से जुड़े आचार संहिता मामलों में बहुमत के फैसलों से अलग राय रखी। उन्होंने अपनी असहमति को रिकॉर्ड में दर्ज करने की मांग की, लेकिन जब यह मांग पूरी नहीं हुई तो लवासा ने स्वयं बैठकों से अलग हो जाने का फैसला किया।
इस कदम ने ‘minority view’ को सार्वजनिक रिकॉर्ड में शामिल करने पर व्यापक बहस छेड़ दी। 21 मई 2019 को आयोग ने 2‑1 बहुमत से तय किया कि अलग‑अलग राय फाइल में दर्ज होगी, पर अंतिम आदेश में प्रकाशित नहीं की जाएगी। यह पहली बार था जब एक आयुक्त की असहमति इतनी स्पष्ट रूप से सार्वजनिक चर्चा का विषय बनी।
इन सभी उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि चुनाव आयोग में मतभेद असामान्य नहीं, बल्कि संरचनात्मक रूप से संभव है। हालांकि जब ये असहमति पारदर्शिता, निर्णयों की वैधता या सदस्यों के अधिकारों के संतुलन को लेकर सार्वजनिक विवाद में बदलती है, तो आयोग की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं।
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