बिहार में छठ पूजा के आगमन के साथ ही पीतल के बर्तनों की मांग में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। स्थानीय व्यापारी और कारीगरों के अनुसार, इस वर्ष की मांग पिछले साल की तुलना में लगभग 30 % अधिक है, जबकि कीमतें 10‑15 % तक बढ़ी हैं। यह उछाल मुख्यतः धार्मिक अनुष्ठानों में पीतल के बर्तनों के उपयोग, साथ ही घर-घर में परम्परागत भोजन तैयार करने की इच्छा के कारण है।
पराव, जिसे अक्सर ‘पीतल नगरी’ कहा जाता है, बिहार के प्रमुख पीतल उत्पादन केंद्रों में से एक है। यहाँ के कारीगर पारम्परिक विधियों को आधुनिक तकनीक के साथ मिलाकर बर्तनों का निर्माण करते हैं। प्रक्रिया की शुरुआत कच्चे माल—मुख्यतः तांबा और जस्ता—के मिश्रण से होती है, जिसे उच्च तापमान पर पिघलाकर लिक्विड धातु तैयार की जाती है।
पिघली हुई धातु को विशेष सैंड मोल्ड में डालकर ठंडा किया जाता है। ठोस रूप में बदलने के बाद, बर्तनों को हाइड्रॉलिक प्रेस या हेमिंग मशीन से आकार दिया जाता है। इस चरण में बर्तनों की मोटाई, आकार और किनारों की सटीकता सुनिश्चित की जाती है।
आकार देने के बाद बर्तनों को बारीकी से ग्राइंडिंग और पॉलिशिंग की प्रक्रिया से गुजारा जाता है। इस दौरान कारीगर हाथ से या मशीन द्वारा सतह को स्मूद और चमकदार बनाते हैं, जिससे अंतिम उत्पाद में पारदर्शी लुक आता है। कुछ विशेष ऑर्डर में, बर्तनों पर पारम्परिक भारतीय मोटिफ़ या धार्मिक प्रतीक भी उकेरे जाते हैं।
पराव के प्रमुख कारीगर रामेश्वर सिंह ने कहा, “छठ के दिन लोग शुद्धता और पवित्रता के प्रतीक के रूप में पीतल के बर्तनों को प्राथमिकता देते हैं। इसलिए इस मौसम में हमें उत्पादन बढ़ाना पड़ता है, लेकिन गुणवत्ता में कोई समझौता नहीं होता।” उन्होंने यह भी बताया कि इस वर्ष कच्चे माल की कीमत में वृद्धि के बावजूद, कारीगरों ने लागत कम करने के लिए स्थानीय स्रोतों से सामग्री प्राप्त करने की कोशिश की है।
स्थानीय व्यापार संघ के अध्यक्ष अजीत वर्मा ने बताया कि इस साल के पहले महीने में ही बर्तनों की ऑर्डर बुकिंग लगभग दो महीनों पहले ही पूरी हो गई है। उन्होंने कहा, “ग्राहकों की बढ़ती मांग को देखते हुए हम अतिरिक्त कार्यशालाओं की व्यवस्था कर रहे हैं, ताकि बाजार की जरूरतों को पूरा किया जा सके।”
विशेषज्ञों का मानना है कि पारम्परिक पीतल बर्तनों की लोकप्रियता केवल धार्मिक कारणों से ही नहीं, बल्कि उनकी टिकाऊपन और स्वास्थ्य संबंधी लाभों के कारण भी बढ़ रही है। पीतल में मौजूद एंटी‑बैक्टीरियल गुण खाने को स्वच्छ रखने में मददगार माने जाते हैं, जिससे आधुनिक उपभोक्ता भी इन्हें पसंद कर रहे हैं।
छठ पूजा के करीब आते ही पीतल बर्तनों की कीमतों और उपलब्धता पर नज़र रखी जाएगी, क्योंकि यह उद्योग न केवल स्थानीय कारीगरों की आय का मुख्य स्रोत है, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक विरासत का भी अहम हिस्सा है।
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