जाली भारतीय मुद्रा (एफआईसीएन) से जुड़े मामले में जम्मू-कश्मीर निवासी सरफराज उर्फ मुजफ्फर अहमद वानी को पटना हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति सुनील दत्ता मिश्रा की खंडपीठ ने उसकी नियमित जमानत याचिका मंजूर करते हुए तत्काल जेल से रिहा करने का निर्देश दिया है। मामले में अधिवक्ता कुंदन कुमार ओझा और एडवोकेट ताहिर ने अपीलकर्ता का पक्ष रखा।
यह मामला पूर्वी चंपारण के बंजरिया थाना क्षेत्र में सितंबर 2024 में पकड़ी गई जाली भारतीय मुद्रा से जुड़ा है। पुलिस ने पांच सितंबर 2024 को वाहन जांच के दौरान तीन लोगों को गिरफ्तार किया था। उनके पास से 500-500 रुपये के 390 जाली नोट बरामद किए गए थे, जो 1.95 लाख रुपये थे। बरामद नोटों में से एक लाख रुपये नाजर सद्दाम, 50 हजार रुपये वारिस और 45 हजार रुपये जाकिर हुसैन के पास से मिले थे।
पाकिस्तान-नेपाल के रास्ते जाली नोट पहुंचाने का आरोप अभियोजन के अनुसार, गिरफ्तार आरोपियों ने पूछताछ में जाली भारतीय मुद्रा पाकिस्तान से नेपाल के रास्ते आने और राजेश साहनी के माध्यम से दिल्ली होते हुए सरफराज उर्फ मुजफ्फर अहमद वानी तक पहुंचने की बात बताई थी। पुलिस ने इस मामले में चार आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया था। .ads-row{display:flex;gap:10px;flex-wrap:wrap;}
गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप से देने पर उठा सवाल सरफराज की ओर से अधिवक्ता कुंदन कुमार ओझा ने गिरफ्तारी और हिरासत की वैधानिकता पर भी सवाल उठाया। बचाव पक्ष का मुख्य तर्क था कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध नहीं कराए गए थे। उल्लेखनीय है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहले हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए इसी बिंदु पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया था। इसके बाद हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई की। इस दौरान एनआईए की ओर से गिरफ्तारी मेमो प्रस्तुत किया गया। उसमें आरोपी को गिरफ्तारी के आधार और कानूनी अधिकारों की जानकारी दिए जाने की बात दर्ज थी, लेकिन यह स्पष्ट नहीं हो सका कि गिरफ्तारी के आधार से संबंधित कोई अलग लिखित दस्तावेज आरोपी को उपलब्ध कराया गया था या नहीं।
हाईकोर्ट ने कहा- केवल गिरफ्तारी मेमो पर्याप्त नहीं हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के आधार की जानकारी देना जरूरी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल गिरफ्तारी मेमो में यह लिख देना कि आरोपी को गिरफ्तारी के आधार बता दिए गए, पर्याप्त नहीं है। गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध कराना संवैधानिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इधर, अदालत ने यह भी कहा कि लिखित रूप में गिरफ्तारी के आधार मिलने से आरोपी अपने अधिवक्ता से प्रभावी कानूनी सलाह ले सकता है और रिमांड के समय अपनी गिरफ्तारी का विरोध तथा जमानत के लिए उचित कदम उठा सकता है।
एनआईए लिखित आधार उपलब्ध कराने का प्रमाण नहीं दे सकी हाईकोर्ट ने पाया कि सुनवाई के दौरान पर्याप्त अवसर दिए जाने के बावजूद एनआईए ऐसा कोई दस्तावेज पेश नहीं कर सकी, जिससे यह साबित हो कि आरोपी को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध कराए गए थे। अदालत ने माना कि इस स्थिति में आरोपी के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ। ये भी पढ़ें- बिहार क्राइम: प्रेम प्रसंग के शक में नाबालिग की हत्या, पोखर में जलकुंभी के बीच मिला शव
तत्काल रिहाई का आदेश इन परिस्थितियों को देखते हुए पटना हाईकोर्ट ने निचली अदालत के 15 जुलाई 2025 के जमानत आवेदन खारिज करने वाले आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने सरफराज उर्फ मुजफ्फर अहमद वानी को तत्काल जमानत पर जेल से रिहा करने का निर्देश दिया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत की शर्तें निचली अदालत तय करेगी और आरोपी की अदालत में उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक शर्तें लगाई जा सकती हैं। जरूरत पड़ने पर उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए कानूनी कार्रवाई भी की जा सकेगी।
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