अमेरिका में भारतीय मूल के अमेरिकियों को पारंपरिक रूप से डेमोक्रेटिक पार्टी का वोटर माना जाता रहा है। 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप के नेतृत्व में यह परिदृश्य बदलने लगा, जब ट्रंप ने भारत के प्रति अपनी दोस्ताना नीति और पीएम नरेंद्र मोदी के साथ घनिष्ठ संबंधों को उजागर किया। इस कारण भारतीय-अमेरिकी मतदाता रिपब्लिकन पार्टी की ओर झुकाव दिखाने लगे।
2024 की राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप को भारतीय मूल के अमेरिकियों से फंडिंग और वोटिंग दोनों में समर्थन मिला। कमला हैरिस जैसे भारतीय मूल के उम्मीदवारों के मुकाबले कई राज्यों में भारतीय-अमेरिकी मतदाता ट्रंप के पक्ष में मतदान किया।
लेकिन ट्रंप के व्हाइट हाउस लौटने के कुछ ही दिनों में भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे ऑपरेशन सिंदूर में सुलह का दावा करने से लेकर भारत पर टैरिफ की तलवार चलाने तक के फैसलों ने इस विश्वास को कमजोर कर दिया। इससे भारतीय-अमेरिकी समुदाय में ट्रंप के प्रति मोहभंग की लहर दौड़ गई।
विस्कॉन्सिन के कांग्रेस चुनाव में उम्मीदवारों और सोशल मीडिया पर ट्रंप की लंबे समय तक वकालत करने वाले पूर्णिमा नाथ जैसे चेहरे भी अपना रवैया बदल चुके हैं, और उन्होंने खुलकर कहा कि ट्रंप की बेतरतीब और बेतुकी नीतियों ने उन्हें निराश किया है।
इस मोहभंग की तस्वीर चुनावी परिणामों में स्पष्ट है। रोखन्ना, प्रमिला जयपाल, सुहास सुब्रमण्यम जैसे भारतीय मूल के उम्मीदवार अपनी सीटें फिर से जीत रहे हैं, जबकि पिया डांडिया और अमीष शाह जैसे प्रत्याशी भी सफल हुए। वहीं, भारतीय मूल के गवर्नर पद के उम्मीदवार विवेक रामास्वामी ओहायो में एमी एक्टन से हार गए।
मिडटर्म चुनाव में ट्रंप के लिए टेक्सास के परिणाम को भी भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं के मूड से जोड़ना आवश्यक है। भारतवंशी अमेरिकियों की संख्या 60 लाख से कम है, जो कुल आबादी का लगभग 1.5% है।
टेक्सास में एक रिपब्लिकन उम्मीदवार, बो फ्रेंच, ने यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास की निष्ठाओं पर सवाल उठाया और दक्षिण एशियाई मूल के छात्रों की तस्वीर पर तंज़ भरी टिप्पणी की। इससे सवाल उठे कि क्यों अमेरिका की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देने वाले भारतीय-अमेरिकियों पर सवाल खड़े होते हैं।
हालिया कार्नेगी एंडोवमेंट और इंडियन अमेरिकन एटिट्यूड सर्वे में पाया गया कि डेमोक्रेट्स को वोट देने वाले 35% भारतीय-अमेरिकियों ने मुख्य रूप से रिपब्लिकन पार्टी के विरोध में वोट किया, जबकि रिपब्लिकन मतदाताओं में यह आंकड़ा सिर्फ 17% है। इस घटना को ‘नेगेटिव पार्टिज़नशिप’ कहा जाता है।
एच1बी वीज़ा, बढ़ती महंगाई, वीज़ा शुल्क में वृद्धि और ग्रीन कार्ड से नागरिकता के रास्ते में बढ़ी बाधाएँ भी भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं के मूड परिवर्तन में प्रमुख कारक हैं। ये वही मुद्दे हैं जिन्होंने लैटिनो, हिस्पैनिक और अफ्रो-एशियाई मतदाताओं को भी ट्रंप सरकार के खिलाफ वोट देने पर मजबूर किया।
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