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'सीबीआई को जांच का अधिकार छीन लिया गया'
सुधाकर सिंह ने बिहार में सीबीआई को जांच के लिए सामान्य सहमति नहीं दिए जाने के मुद्दे पर भी सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि केंद्र और बिहार में भाजपा की सरकार होने के बावजूद बिहार में सीबीआई को जांच का अधिकार नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकार है तो सीबीआई पर अविश्वास क्यों है। उन्होंने आरोप लगाया कि भ्रष्टाचार की जांच के रास्ते बंद करने के लिए ऐसा किया गया है। राजद सांसद ने कहा कि कई राजनीतिक दल इस मुद्दे पर मौन हैं। उन्होंने महालेखाकार (CAG) की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि BMSICL में हुई कथित गड़बड़ियों पर भी प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
'भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप देने के लिए बनाए गए कॉरपोरेशन'
सुधाकर सिंह ने नीतीश कुमार के शासनकाल में विभागों के भीतर अलग-अलग कॉरपोरेशन बनाए जाने पर सवाल उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि कृषि, सड़क, भवन और स्वास्थ्य समेत कई विभागों के विकास कार्यों और बजट को कॉरपोरेशन के जरिए संचालित करने की व्यवस्था की गई। उनका कहना था कि पहले विभाग खुद टेंडर जारी करते, निगरानी करते और काम पूरा कराते थे, लेकिन कॉरपोरेशन बनने के बाद विभागों के अधिकार कम हो गए। उन्होंने स्वास्थ्य विभाग के बिहार मेडिकल सर्विसेज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरपोरेशन लिमिटेड (BMSICL) का उदाहरण देते हुए कहा कि स्वास्थ्य विभाग का बड़ा पैसा निर्माण और खरीद के लिए इस कॉरपोरेशन को दिया जाता है। उनके मुताबिक, BMSICL के प्रबंधन और नियंत्रण की व्यवस्था में मुख्यमंत्री की भूमिका महत्वपूर्ण है।
डस्टबिन के बाद मशीन खरीद का मुद्दा उठाया
राजद सांसद ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग में डस्टबिन खरीद का मामला अकेला नहीं है। उन्होंने मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट से संबंधित उपकरणों की खरीद का उदाहरण देते हुए दावा किया कि करीब एक करोड़ रुपये की मशीन टेंडर प्रक्रिया के बाद लगभग 18 लाख रुपये में उपलब्ध हुई। उन्होंने कहा कि शुरुआत में नौ मशीनों की खरीद की बात थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 23 मशीन कर दिया गया। सुधाकर सिंह के मुताबिक, इन मशीनों की कीमत करीब 23 करोड़ रुपये बताई गई थी, लेकिन इन्हें करीब साढ़े चार करोड़ रुपये में खरीदा गया। उन्होंने कहा कि पहली नजर में यह सरकार के लिए बचत दिखाई देती है, लेकिन इसके बाद मशीनों के संचालन और अन्य सेवाओं के नाम पर बड़ा खर्च किया गया।
'सिम की तरह मशीन सस्ती, रिचार्ज के नाम पर खेल'
सुधाकर सिंह ने इस पूरी खरीद प्रक्रिया की तुलना प्राइवेट कंपनियों के सिम से करते हुए आरोप लगाया कि मशीन सस्ती कर दी गई, लेकिन उसके बाद के खर्च के नाम पर बड़ा खेल हुआ। उन्होंने दावा किया कि इसी प्रक्रिया में करीब 300 करोड़ रुपये तक की गड़बड़ी हुई। उन्होंने डस्टबिन का उदाहरण देते हुए कहा कि बाजार में जिस सामान की कीमत करीब 1,200 से 1,500 रुपये के बीच है, उसकी सरकारी खरीद में कई गुना अधिक कीमत दिखाई गई। उन्होंने आरोप लगाया कि स्वास्थ्य विभाग में सामान की वास्तविक बाजार कीमत और सरकारी बिल में दर्ज कीमत के बीच बड़ा अंतर रहा। राजद सांसद ने टेंडर प्रक्रिया में OEM यानी Original Equipment Manufacturer से जुड़ी शर्तों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि टेंडर की शर्तों को इस तरह तैयार किया गया कि किसी कंपनी के माध्यम से टेंडर हासिल करने का रास्ता खुला रहे। उन्होंने कहा कि खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता और बाजार कीमत की जांच जरूरी है।
'BMSICL का MD मुख्यमंत्री नियुक्त करते हैं'
सुधाकर सिंह ने BMSICL के नियंत्रण को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कॉरपोरेशन के प्रबंधन में मुख्यमंत्री की भूमिका होती है और इसके MD की नियुक्ति मुख्यमंत्री करते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इसी तरह राज्य के कई डेवलपमेंट कॉरपोरेशन विभागों से अलग रखे गए हैं और उनका नियंत्रण शीर्ष स्तर पर है। उन्होंने कहा कि यदि ऐसे किसी कॉरपोरेशन में भ्रष्टाचार होता है तो इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। उन्होंने स्वास्थ्य विभाग में दवाओं की खरीद को लेकर भी सवाल उठाए और दावा किया कि कई दवाओं की खरीद में जांच के दौरान गड़बड़ियां सामने आई हैं।
राजद सांसद उच्च स्तरीय जांच की मांग की
सुधाकर सिंह ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग से जुड़े इन मामलों की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि खरीद प्रक्रिया में नियमों का पालन हुआ या नहीं और सरकारी धन का कहीं दुरुपयोग तो नहीं हुआ।
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