उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्हें सनातन धर्म और संत समाज की चिंता करने की जरूरत नहीं है। पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री सनातनी परिवार के संत हैं। उन्होंने अपनी भावनाओं में जो बात कही, उसका संत समाज ने भी समर्थन किया है। ब्रज क्षेत्र में भी उनके वक्तव्य को लेकर कोई परेशानी नहीं है। दिक्कत केवल अखिलेश यादव को है। इससे स्पष्ट है कि सनातन के बढ़ते प्रभाव से विपक्ष बेचैन है।
सपा अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि भाजपा सरकार की गलत नीतियों और मुनाफाखोरी के कारण महंगाई ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। महंगाई चरम पर पहुंच गई है। खाद्य पदार्थों की कीमतें लगातार बढ़ती जा रही हैं। भाजपा सरकार महंगाई रोकने में पूरी तरह से विफल है। महंगाई की मार से जनता कराह रही है। डीजल, पेट्रोल और रसोई गैस की कीमत पहले से ही आसमान पर हैं। अखिलेश यादव ने जारी बयान में कहा कि सरकार के विभिन्न विभाग के आंकड़े बता रहे हैं कि महंगाई के सारे रिकॉर्ड टूट गए हैं। महंगाई बढ़ाकर हो रही लूट में भाजपा को चंदे के रूप में हिस्सा मिलता है। जब-जब त्योहार आता है, तब-तब जनता से यह लूट और बढ़ जाती है। महंगाई ने त्योहारों को फीका कर दिया है। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार जब तक रहेगी, महंगाई बढ़ती रहेगी। जनता की लूट होती रहेगी। महंगाई और बेरोजगारी से त्रस्त जनता ने भाजपा सरकार को सत्ता से हटाने का का फैसला कर लिया है।
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि आयोजक और प्रायोजक ऐसे कथाकारों को न बुलाएं जो कि अपने बयानों से समाज में वैमनस्यता पैदा करते हैं। इनके लिए धन ही इनका धर्म है। इन लोगों को बुलाने से आयोजकों को जनता के कोप का भाजन बनना पड़ जाएगा। ऐसे में राजनीतिक लाभ की जगह उन्हें नुकसान ही होगा। उन्होंने बयान जारी कर कहा कि दुष्मुखी लोगों के संबंध में ‘शासन-प्रशासन’ के साथ ही उनके कार्यक्रम करवाने वाले सभी आयोजकों और प्रायोजकों से विनम्र आग्रह है कि वो ऐसे तथाकथित कथाकारों से दूर ही रहें। ये ही नहीं, ऐसे एक-दो और भी तथाकथित कथावाचक हैं जो बोलने और पहनने से कथावाचक तो दिखते हैं पर कथा और प्रवचन उनका व्यवसाय है। वो समय-समय पर अपनी भौतिक उपलब्धि का भोंडा प्रदर्शन करते-करवाते रहते हैं। ऐसे लोग सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए सदैव अनर्गल बातें करते हैं। धन ही इनका धर्म होता है। इसीलिए आयोजकों और प्रायोजकों को ये सोचना चाहिए कि ये कुछ भी कहकर राजनीतिक प्रश्रय पाकर बच निकलेंगे लेकिन उन आयोजकों और प्रायोजकों को तो उसी शहर में जनता के बीच रहना है। इनके कुवचनों से जन्मे सामाजिक वैमनस्य का शिकार उन्हें ही होना पड़ेगा। जब जनता को ये नहीं मिलेंगे तो जनता इन जैसे नकारात्मक लोगों को आमंत्रित करनेवालों को ही अपने कोप-आक्रोश का शिकार बनाएगी क्योंकि आस्थावान तो यही मानेंगे कि ये दुर्वचनी भगवानों के बारे में जो अपशब्द या कुविचार प्रकट कर रहे हैं उनमें आयोजकों-प्रायोजकों की भी सहमति है। इससे स्थानीय स्तर पर हर आस्थावान-श्रद्धालु इन आयोजकों-प्रायोजकों का विरोधी हो जाएगा।
Comments ()
Be the first to share your perspective on this story!