हर साल देश के कोने‑कोने से हजारों लड़कियां अपने सपनों की गठरी बाँधकर दिल्ली‑नोएडा की ओर रुख करती हैं। उनका लक्ष्य अक्सर सरकारी नौकरी, डिजाइनिंग या मॉडलिंग जैसा होता है, और उनका ठिकाना बन जाता है नोएडा के कोई पीजी रूम। हाल ही में सत्यनिकेतन की घटना ने इस सेक्टर की कई समस्याओं को उजागर किया।
हमने दिल्ली एनसीआर के विभिन्न पीजी में रह रही चार लड़कियों के अनुभवों को संकलित किया। जो कहानी सामने आई, वह केवल इन लड़कियों की नहीं, बल्कि मेट्रो शहरों में संघर्ष कर रही हर बेटी की दास्तान है।
श्रेया, 17, बिहार – वह अपने परिवार की इकलौती बेटी है। जब वह 17 साल की उम्र में नोएडा के एक फ्लैट में आई, तो उसकी रूममेट ने अचानक आत्महत्या कर ली। इस हादसे का मानसिक असर इतना गहरा था कि वह कई हफ्तों तक अपने कमरे में रूममेट की लटकी हुई लाश की छाया देखती रही। बाद में वह एक अन्य पीजी में शिफ्ट हुई, जहाँ चोरी हुई और मकान मालिक ने मदद से इनकार कर दिया। कॉलेज से लौटते समय रास्ते में लोगों की ताना‑बाना और भाषा‑भेद ने उसे तोड़ दिया, लेकिन इस कठिन दौर ने उसे मानसिक रूप से लोहे जैसा मजबूत बना दिया। उसने सीखा कि बड़े शहर में सर्वाइवल के लिए आँसू को कमजोरी नहीं, बल्कि ढाल बनाना चाहिए।
दिव्या, इंदौर – वह मॉडलिंग का शौक रखती थी, लेकिन दिल्ली‑एनसीआर में पढ़ाई और करियर के बीच संतुलन बनाने के लिए उसे अपना मॉडलिंग जुनून त्यागना पड़ा। नोएडा के माहौल में लोगों की कपड़ों और काम के आधार पर तेज़ी से जज करने की प्रवृत्ति ने उसे हर पल सतर्क रहने पर मजबूर किया। इस अनुभव ने उसे अपने लुक और एटीट्यूड को एक सुरक्षा परत में बदलना सिखाया, जिससे वह आसानी से भेद नहीं पाती।
शताक्षी, इंदौर – वह फैशन डिजाइनर बनना चाहती थी, लेकिन नोएडा में रहने के दौरान उसकी पूरी पर्सनैलिटी बदल गई। पीजी में गंभीर बीमारी के दौरान जब कोई मदद के लिए नहीं था, तो उसे एहसास हुआ कि घर पर मां‑बाप की “रोक‑टोक” असल में उनका कवच थी। इस अकेलेपन ने उसे आत्मनिर्भर बनाया और सिखाया कि जब कोई साथ नहीं देता, तो खुद को टिकाना पड़ता है।
अनन्या, झारखंड – वह जमशेदपुर के एक बड़े संयुक्त परिवार की लाडली थी। नोएडा में पहली बार तेज़ गाड़ियां, ऊँची इमारतें और अपनों की कमी ने उसे सांस्कृतिक शॉक दिया। पहले वह सिगरेट या शराब पीते हुए देखी गई लड़कियों को जज करती थी, पर अब उसने दूसरों को जज करना बंद कर दिया है। वह अपने मूल्यों को बनाए रखते हुए नई सोच और उदारता अपनाई है।
इन चारों कहानियों से स्पष्ट है कि नोएडा जैसे महानगर में देश भर से आने वाली लड़कियां सिर्फ डिग्री या नौकरी नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, सहनशीलता और सशक्त पहचान हासिल कर रही हैं। हर सुबह वे अपने छोटे‑छोटे पीजी कमरों से बाहर निकलती हैं, डर का सामना करती हैं और नए अनुभवों से खुद को गढ़ती हैं। यह सफर आसान नहीं, पर यही कड़वे अनुभव उन्हें निडर, आत्मनिर्भर और सशक्त महिलाओं में बदलते हैं।
Comments ()
Be the first to share your perspective on this story!