शहरी भारत में जमीन की किमत और 20‑30 साल के होम‑लोन की EMI ने कई लोगों को घर‑मालिक बनना असंभव कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, एक अरब से अधिक लोग झुग्गियों या असुरक्षित बस्तियों में रह रहे हैं, जबकि शहरों में कंक्रीट के टावर लगातार बढ़ते जा रहे हैं।
ऐसी ही स्थिति में अमेरिका के ओरेगन राज्य के पोर्टलैंड ने एक नया समाधान पेश किया – ‘टायनी हाउस ऑन व्हील्स’। 2021 में शहर की सिटी काउंसिल ने अपने जोनिंग बाय‑लॉ में बदलाव कर छोटे, पहियों वाले घरों को बैकयार्ड या खाली प्लॉट पर रिहायशी तौर पर रखने की अनुमति दे दी। इस कदम से मकान मालिकों को अपने खाली आँगन में टायनी हाउस किराए पर देने की पूरी आज़ादी मिली।
शोध से पता चलता है कि 2020 में पोर्टलैंड में मौजूद मोबाइल टायनी घरों की संख्या 2026 तक लगभग दोगुनी हो गई है। जबकि पारंपरिक पक्के घर की औसत लागत 2 लाख डॉलर से अधिक है, एक टायनी हाउस सिर्फ 50 हज़ार‑1 लाख डॉलर में तैयार हो जाता है, यानी लगभग 70 % तक की लागत बचत।
इन छोटे घरों को ‘स्मार्ट आर्किटेक्चर’ से सजाया गया है। फोल्डेबल बेड, मॉड्यूलर किचन, ग्लास‑शावर और प्लग‑एंड‑प्ले पानी‑सैवर सिस्टम सभी एक ही कमरे में समा जाते हैं। छत पर सोलर पैनल लगे होते हैं, जिससे बिजली के बिल में भी कमी आती है। परिणामस्वरूप, कम आय वाले लोग अब सड़क किनारे रहने की बजाय सुरक्षित, आधुनिक घर में रह रहे हैं।
पोर्टलैंड की इस पहल ने दुनिया भर के शहरों को प्रेरित किया है। टेक्सास के ऑस्टिन में 51 एकड़ में टायनी हाउस कम्युनिटी बनायी गई है, स्पर्ग ने टायनी हाउस पर पाबंदी हटाई है, टोक्यो माइक्रो‑होम्स से जगह का अधिकतम उपयोग कर रहा है, और वैंकूवर ‘लेनवे हाउसिंग’ मॉडल से शहरी भीड़ को कम कर रहा है।
भारत में भी यह मॉडल बड़े पैमाने पर काम कर सकता है। मुंबई, दिल्ली, कोलकाता जैसी महानगरों में झुग्गी‑पुनर्विकास अक्सर बजट और लालफीताशाही की वजह से देर से पूरा होता है। अगर सरकार खाली पड़े बैकयार्ड या सरकारी जमीन पर ‘प्लग‑एंड‑प्ले’ सुविधाओं वाले टायनी विलेज बनाती है, तो कम लागत में जल्दी से पक्की छत उपलब्ध कराई जा सकती है और युवा वर्ग को जीवन‑भर के भारी लोन से राहत मिल सकती है।
भविष्य के शहरी ब्लूप्रिंट में चार मुख्य कदम शामिल हैं: (1) ज़ोनिंग को आसान बनाकर टायनी हाउस को कानूनी मंजूरी देना, (2) खाली जगहों का तुरंत ‘रेडी‑मेड घर’ के रूप में उपयोग, (3) लोन‑EMI के बोझ को घटाना, और (4) सोलर‑पैनल जैसी हरित तकनीकों से पर्यावरणीय प्रभाव कम करना।
संयुक्त राष्ट्र के ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स’ का लक्ष्य भी शहरों को समावेशी, सुरक्षित और टिकाऊ बनाना है। पोर्टलैंड का टायनी हाउस मॉडल यह साबित करता है कि बड़े‑बड़े बहुमंजिला इमारतों के अलावा, सही नीति, थोड़ी सी खाली जगह और पहियों पर खड़े छोटे‑छोटे घर भी शहरी आवास संकट का प्रभावी समाधान बन सकते हैं।
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