भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की जिद अब सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं रही। जब देश में गाड़ियां, मोबाइल और कपड़े जैसी वस्तुएं बनना शुरू होती हैं, तो आयात पर खर्च कम होता है, लाखों युवाओं को रोजगार मिलता है और विदेशी मुद्रा की आय बढ़ती है। यही कारण है कि औद्योगिक विकास को आर्थिक आत्मनिर्भरता की कुंजी माना जाता है।
देश ने "मेक इन इंडिया", "आत्मनिर्भर भारत" और "PLI स्कीम" जैसे नारे लगाकर उत्पादन को तेज किया है, लेकिन सवाल अभी बाकी है – भारत कब और कैसे विश्व का अगला मैन्युफैक्चरिंग हब बन पाएगा? इस संदर्भ में चीन से अंतर, मौजूदा चुनौतियां और संभावित अवसरों को देखना जरूरी है।
वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट में भारत का हिस्सा केवल 2 % के आसपास है, जबकि चीन का 30 % से अधिक है। भारत विश्व का पाँचवाँ सबसे बड़ा मैन्युफैक्चरिंग देश है, पर इसका उत्पादन चीन के 9 गुना से बहुत पीछे है – चीन का औद्योगिक उत्पादन 4.5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है, जबकि भारत का लगभग 500 बिलियन डॉलर।
रातोंरात चीन को पीछे छोड़ना असंभव है, पर "चीन + 1" नीति ने भारत के लिए नई संभावनाएं पैदा कर दी हैं। अमेरिकी कंपनियां, जो चीन में अपनी फैक्ट्री को कम करना चाहती हैं, अब भारत को एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में देख रही हैं। हालांकि, अमेरिकी सैंक्शन एक्ट जैसी नीतियां ऊर्जा आयात पर दबाव डालती हैं, क्योंकि भारत 85 % से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। तेल की कीमतें बढ़ने से उत्पादन लागत, लॉजिस्टिक्स और बिजली की दरें बढ़ती हैं, जिससे भारतीय उत्पाद चीन, वियतनाम या बांग्लादेश के सामान से महंगे हो जाते हैं।
ऊर्जा की महंगाई के कारण विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता है, जिससे इन्फ्रास्ट्रक्चर, नई टेक्नोलॉजी और R&D में निवेश कम हो जाता है। इस बाधा को पार करने के लिए भारत ने पिछले दशक में कई नीति सुधार किए हैं। मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत के तहत व्यापार करने की प्रक्रिया को सरल बनाया गया, और "Ease of Doing Business" पर विशेष ध्यान दिया गया।
PLI स्कीम के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, ऑटोमोबाइल, फार्मा और सोलर पैनल जैसे 14 से अधिक सेक्टरों को अरबों डॉलर के प्रोत्साहन मिले हैं। परिणामस्वरूप भारत अब मोबाइल फोन का दूसरा सबसे बड़ा निर्माता बन चुका है और कई आईफोन मॉडलों की असेंबली यहाँ होती है।
मैन्युफैक्चरिंग की गति को बढ़ाने के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना अनिवार्य है। पिछले दस साल में एक्सप्रेस‑वे, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, पीएम गतिशक्ति और नए पोर्ट्स की सुविधा ने लॉजिस्टिक्स लागत और समय दोनों को घटाया है। साथ ही चिप मैन्युफैक्चरिंग में भी भारी निवेश आया है, जो भविष्य की तकनीकी रीढ़ बनेगा।
इन सभी प्रयासों के बावजूद, भारत की जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग का योगदान 16‑17 % पर ही अटका है। इसके पीछे चार प्रमुख रुकावटें हैं:
- महंगी लॉजिस्टिक्स: उत्पाद को फैक्ट्री से पोर्ट तक ले जाने की लागत जीडीपी का 13‑14 % है, जबकि चीन या वियतनाम में यह 8‑9 % है।
- जटिल नियम एवं नौकरशाही: भूमि अधिग्रहण, श्रम कानून और पर्यावरण मंजूरी में कई महीने लगते हैं, जिससे प्रोजेक्ट की गति धीमी पड़ती है।
- स्किल गैप: युवा जनसंख्या बड़ी है, पर ऑटोमेशन और हाई‑टेक फैक्ट्री के लिए आवश्यक कुशल कार्यबल की कमी है।
- MSME की कमजोरी: छोटे और मध्यम उद्योग (MSME) को सस्ता लोन और हाई‑टेक टेक्नोलॉजी अपनाने में कठिनाई होती है, जबकि चीन में MSME ने औद्योगिक विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सरकार ने मैन्युफैक्चरिंग के जीडीपी शेयर को 25 % तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि भारत अगले पाँच साल में इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, डिफेंस और फार्मा में विश्व का प्रमुख सप्लाई हब बनता है और 10 % की सालाना औद्योगिक वृद्धि दर बनाए रखता है, तो 2035‑2040 के बीच यह लक्ष्य हासिल हो सकता है।
सपना तभी साकार होगा जब नीति‑निर्माताओं और उद्योग दोनों में 100 % प्रदर्शन हो। भारत को सिर्फ घरेलू बाजार के लिए नहीं, बल्कि निर्यात‑उन्मुख उत्पादन पर ध्यान देना होगा। कपड़े, जूते जैसे रोजगार‑सृजन वाले सेक्टरों के साथ-साथ सेमीकंडक्टर जैसे हाई‑टेक उद्योगों में भी ठोस कदम उठाने होंगे।
यदि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर श्रम और भूमि सुधार को तेज़ी से लागू करती हैं और MSME को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करती हैं, तो भारत निश्चित रूप से विश्व का अगला बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब बन जाएगा। यह प्रक्रिया समय लेगी, पर दिशा सही है।
Comments ()
Be the first to share your perspective on this story!