भारत को वैश्विक व्यापारियों के लिए उभरते हुए विशाल बाजार के रूप में देखा जाता है। इसी कारण एलॉन मस्क और उनकी कंपनी स्टारलिंक भी भारतीय बाजार पर नजर गड़ाए हुए हैं।
मस्क का लक्ष्य है कि वह जल्द से जल्द भारत में अपनी उपस्थिति स्थापित करें, परंतु कानूनी अड़चनों और नियामक जाँच के कारण स्टारलिंक का प्रवेश अभी भी लंबित है।
स्टारलिंक की भारत में एंट्री के मामले में राजनीति भी शामिल हो गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने मस्क का समर्थन किया, जबकि मस्क ने सरकार पर पक्षपात का आरोप लगाया।
मस्क ने X पर लिखा कि कुछ पूंजीपतियों ने स्टारलिंक को ब्लॉक कर रखा है ताकि वे अपना एकाधिकार बनाए रखें। उन्होंने 165 से अधिक देशों में स्वीकृत सेवा के बावजूद भारत में मंजूरी न मिलने के कारण पर सवाल उठाया।
सरकार ने मस्क के आरोपों को बेबुनियाद बताया और कहा कि भारतीय नियामक व्यवस्था पूरी तरह से निष्पक्ष और गैर‑भेदभावपूर्ण है। सुरक्षा मूल्यांकन पूरा होने के बाद सभी कंपनियों को समान रूप से स्पेक्ट्रम आवंटित किया जाएगा।
मस्क के लिए वास्तविक समस्या स्टारलिंक, टेस्ला और X के बीच के विवादों में है। टेस्ला के CEO के रूप में मस्क ने भारत में EV पर 70% से 100% तक की भारी आयात ड्यूटी घटाने की मांग की है, जबकि सरकार शर्त रखती है कि टेस्ला भारत में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट स्थापित करे।
X प्लेटफॉर्म पर भी टकराव हुआ है; मस्क खुद को फ्री स्पीच एब्सोल्यूटिस्ट कहते हैं, जबकि भारत सरकार का तर्क है कि देश की संप्रभुता और कानून‑व्यवस्था के लिए IT नियमों का पालन अनिवार्य है।
केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने स्पष्ट किया कि लाइसेंसिंग प्रक्रिया सभी कंपनियों – जियो, एयरटेल और स्टारलिंक – के लिए समान और गैर‑भेदभावपूर्ण है।
स्टारलिंक की भारत में एंट्री और सैटेलाइट इंटरनेट के लिए स्पेक्ट्रम आवंटन का मुद्दा भारतीय दूरसंचार क्षेत्र में सबसे बड़े व्यावसायिक और नीतिगत विवादों में से एक रहा है।
मस्क का तर्क था कि सैटेलाइट स्पेक्ट्रम एक प्राकृतिक और साझा संसाधन है जिसे नीलाम नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने ITU नियमों का हवाला देते हुए मांग की कि सरकार कंपनियों को बिना नीलामी के निश्चित शुल्क पर सीधे स्पेक्ट्रम आवंटित करे।
वहीं जियो और एयरटेल ने प्रारम्भ में 4G/5G की तरह नीलामी की मांग की थी, ताकि विदेशी कंपनियों को बिना नीलामी के सस्ता स्पेक्ट्रम मिलने से भारतीय कंपनियों को अनुचित प्रतिस्पर्धा न मिले।
भारत सरकार ने दूरसंचार अधिनियम 2023 के तहत प्रशासकीय आवंटन का रास्ता चुना, जिससे स्पेक्ट्रम की नीलामी नहीं होगी।
मस्क ने X पर अंबानी का नाम लिखा, जिससे सवाल उठता है कि क्या अंबानी स्टारलिंक को आने से रोक रहे हैं। वास्तव में यह लड़ाई सिर्फ टेक्नोलॉजी की नहीं, बल्कि भारत के विशाल डेटा और ब्रॉडबैंड मार्केट में हिस्सेदारी की है।
सुरक्षा और डेटा लोकलाइजेशन नियमों के तहत भारतीय उपयोगकर्ताओं का डेटा भारत के भीतर ही प्रोसेस और स्टोर होना चाहिए। स्टारलिंक के इंटर‑सैटेलाइट लेजर लिंक के कारण सुरक्षा समीक्षा सख्त हो गई है, और सरकार ने 20 स्थानीय गेटवे स्टेशन स्थापित करने का आदेश दिया है।
फिर भी, स्टारलिंक पहाड़ी इलाकों, उत्तर‑पूर्व के राज्यों, अंडमान‑लक्षद्वीप जैसे द्वीपों में जहां फाइबर या मोबाइल टॉवर नहीं पहुंचते, हाई‑स्पीड सैटेलाइट ब्रॉडबैंड प्रदान कर सकता है।
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