इंडियन एक्सप्रेस के हालिया खुलासे के बाद चुनाव आयोग ने एक प्रेसनोट जारी किया, जिसमें कहा गया कि आयुक्तों के बीच मतभेद होना प्रक्रिया का हिस्सा है और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। यह बयान नई सवालों की श्रृंखला खोलता है, जिनका जवाब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और पूरी आयोग के लिए जरूरी है।
प्रेसनोट के पाँचवें बिंदु में बताया गया कि पिछले दस महीनों में आयोग ने 40 से अधिक पहलें शुरू कीं और कई इलेक्टोरल रिफॉर्म लागू किए। साथ ही यह कहा गया कि पिछले साल के सभी फैसले ‘unanimous’ (सर्वसम्मति) से लिए गए, सभी चुनाव आयुक्तों की भागीदारी के साथ। लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि इस प्रेसनोट पर वास्तव में तीनों आयुक्तों ने हस्ताक्षर किए हैं या नहीं।
अब सवाल यह उठता है कि क्या आयोग उन सभी निर्णयों की कॉपी सार्वजनिक करेगा जिनमें आयुक्तों की कड़ी आपत्तियों के बावजूद सर्वसम्मति बनी। यदि दस्तावेज़ उपलब्ध हों तो जनता को स्पष्ट हो जाएगा कि आपत्तियां कहाँ तक थीं और सहमति कैसे बनी।
एक और बड़ा प्रश्न यह है कि आयुक्तों ने इतनी सख्त आपत्तियों को अंतिम फैसले में कैसे दरकिनार किया। मीडिया रिपोर्टों में कुछ आपत्तियों को ‘अवैध’ और ‘अनधिकृत’ बताया गया है, फिर भी निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया। संभावित कारणों में ड्राफ्ट स्तर पर उठी आपत्तियों का बाद में विस्तृत चर्चा के बाद समाधान, संस्थागत एकता को प्राथमिकता देना, या तकनीकी‑कानूनी स्पष्टीकरण मिल जाना शामिल हो सकते हैं।
कुछ मामलों में आयुक्तों ने अपनी आपत्तियों को केवल इंटरनल नोट के रूप में दर्ज किया हो सकता है, जबकि औपचारिक असहमति नहीं दर्ज की। कानून में प्रावधान है कि यदि कोई आयुक्त पूरी तरह असहमत हो तो वह अपनी असहमति दर्ज करा सकता है, और आवश्यक होने पर राष्ट्रपति तक शिकायत का रास्ता खुला रहता है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओ.पी. रावत ने भी इस प्रक्रिया का उल्लेख किया है।
संभव है कि आयुक्तों ने अंत में अपनी बात मान ली हो क्योंकि अंतिम जिम्मेदारी पूरे आयोग की होती है। तीनों सदस्य मिलकर निर्णय लेते हैं; यदि बहुमत या सहमति बन जाती है तो निर्णय आगे बढ़ जाता है। लेकिन ये सभी अनुमान हैं; वास्तविक जवाब आयोग के पास है।
यदि आयोग उन निर्णयों की कॉपी जारी कर दे जिनमें आपत्तियों के बावजूद सर्वसम्मति बनी, तो कई सवाल अपने आप सुलझ जाएंगे। जनता देख सकेगी कि आपत्तियों का स्तर क्या था और सहमति कैसे स्थापित हुई।
वर्तमान में आयोग की सफाई ने एक ओर कुछ धुंध को कम किया है, लेकिन दूसरी ओर नए प्रश्न खड़े किए हैं। ये प्रश्न केवल आयुक्तों के व्यवहार तक सीमित नहीं, बल्कि संस्था की पारदर्शिता से जुड़े हैं। चुनाव आयोग देश की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है; जितनी साफ और पारदर्शी उसकी प्रक्रियाएँ होंगी, उतना ही जनता का भरोसा बढ़ेगा।
आयोग इस दिशा में कदम उठा सकता है—फ़ैसलों की कॉपी जारी करके, या कम से कम यह बताकर कि आयुक्तों की आपत्तियों का समाधान कैसे हुआ। बिना इस जानकारी के सवाल हवा में ही रहेंगे, और हर नई सफाई इन्हें और बड़ा बनाती रहेगी। मतभेद होना बुरी बात नहीं, पर मतभेद के बाद सहमति कैसे बनी, यह स्पष्ट करना आवश्यक है, नहीं तो लोग अपनी-अपनी कहानियां गढ़ते रहेंगे और संस्था की साख पर सवाल उठते रहेंगे।
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