रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने इस वर्ष रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार हैंरी बी कागान और केन्सो सोआई को दिया है। दोनों ने असममित ऑर्गेनिक संश्लेषण में नॉन‑लीनियर इफेक्ट्स और ऑटोकैटेलिसिस पर काम किया, जिससे काइरल मॉलिक्यूल्स के व्यवहार की नई समझ मिली।
काइरल मॉलिक्यूल्स ऐसे अणु होते हैं जिनके दो मिरर‑इमेज रूप – एनैंटियोमर्स – एक-दूसरे के परावर्तित प्रतिबिंब जैसे होते हैं। भले ही उनका आकार समान हो, उनकी आणविक व्यवस्था अलग होती है, और शरीर इन दोनों रूपों को अलग-अलग पहचान सकता है।
कई दवाओं में एक ही अणु के दोनों एनैंटियोमर्स मौजूद होते हैं, जहाँ एक रूप चिकित्सीय प्रभाव देता है जबकि दूसरा कम सक्रिय या हानिकारक हो सकता है। इसलिए दवा विकास में सही एनैंटियोमर को प्रमुखता देना अत्यंत आवश्यक है।
1980 के दशक में थैलिडोमाइड के मामले ने इस बात को और भी गंभीर बना दिया। इस दवा के सेवन से हजारों बच्चों में जन्मजात विकृतियाँ हुईं, जिससे वैज्ञानिकों ने मिरर‑इमेज रूपों के शरीर पर अलग प्रभावों पर गहरा ध्यान दिया।
जीवित दुनिया में केवल एक ही एनैंटियोमर का उपयोग होता है, जिसे होमोचिरैलिटी कहते हैं। उदाहरण के लिए, प्रोटीन बनाने वाले अमीनो एसिड्स में केवल L‑रूप का ही उपयोग होता है। यह प्रश्न कि जीवन ने केवल एक रूप क्यों चुना, रसायन विज्ञान के एक लंबे समय से चल रहे रहस्य का हिस्सा है।
लुई पाश्चर ने 1857 में टार्टरिक एसिड के दो मिरर‑इमेज रूपों की खोज की और दिखाया कि जीवित जीव केवल एक रूप को ही उपयोग करते हैं। इसने यह सिद्ध किया कि जैविक प्रणालियाँ एनैंटियोमर्स के बीच अंतर कर सकती हैं।
20वीं सदी के प्रारम्भ में विली मार्कवाल्ड ने काइरल कैटेलिस्ट के प्रयोग से यह दिखाया कि किसी रासायनिक प्रतिक्रिया में दोनों एनैंटियोमर्स बराबर मात्रा में नहीं बन सकते; एक रूप अधिक प्रबल हो सकता है।
इस घटना को नॉन‑लीनियर इफेक्ट कहा जाता है, जहाँ प्रतिक्रिया की शुरुआत में थोड़ा सा अंतर समय के साथ बढ़कर अंतिम उत्पाद में बड़ा अंतर पैदा कर देता है। कागान ने 1986 में इस प्रभाव को स्पष्ट करने वाले तीन रासायनिक प्रक्रियाओं का वर्णन किया।
सोई ने 1995 में ऑटोकैटेलिसिस पर काम किया, जहाँ प्रतिक्रिया के दौरान उत्पन्न होने वाला उत्पाद स्वयं उसी प्रतिक्रिया को तेज करता है। उन्होंने दिखाया कि सिर्फ 2% की प्रारंभिक बढ़त वाले एनैंटियोमर का अनुपात 87% तक पहुँच सकता है, और आगे के प्रयोगों में यह 99.99% तक जा सकता है।
इस खोज से दवा निर्माण, फ्लेवर, खुशबू और कृषि रसायनों के उत्पादन में एनैंटियोमर्स को नियंत्रित करने के नए रास्ते खुलते हैं। यह न केवल दवाओं की प्रभावशीलता बढ़ाता है, बल्कि अनचाहे दुष्प्रभावों को भी कम कर सकता है।
2025 में रसायन विज्ञान के नोबेल पुरस्कार सुसुमु कितागावा, रिचर्ड रॉबसन और ओमर एम. यागी को मेटल‑ऑर्गेनिक फ्रेमवर्क्स (MOFs) के लिए मिला, जो गैसों को पकड़ने और पर्यावरणीय अनुप्रयोगों में उपयोगी हैं। 2026 में फिजियोलॉजी या मेडिसिन के नोबेल पुरस्कार ऑप्टोजेनेटिक्स के शोधकर्ताओं को मिले, जबकि भौतिकी में फ्रांसिस हाल्जेन को उच्च‑ऊर्जा न्यूट्रिनो के अध्ययन के लिए सम्मानित किया गया।
इस वर्ष नोबेल पुरस्कार की कुल राशि 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोनर (लगभग 12 लाख अमेरिकी डॉलर) है, और 8 अक्टूबर को साहित्य, 9 अक्टूबर को शांति और 12 अक्टूबर को अर्थशास्त्र के नोबेल की घोषणा होगी।
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