राजस्थान के निकाय चुनाव के परिणाम घोषित होते ही स्थानीय राजनीति में नई दौड़ शुरू हो गई है। जीत हासिल करने वाले पार्षदों को अपने पाले में बनाए रखने के लिए कांग्रेस और भाजपा दोनों ने महंगे होटल व रिज़ॉर्ट में ठहराने की रणनीति अपनाई है, जिससे ‘रिज़ॉर्ट पॉलिटिक्स’ शब्द सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है।
अलवर, खैरथल, कोटपूतली, भिवाड़ी, बहरोड़ और उनके आसपास के क्षेत्रों में बोर्ड गठन के लिये आवश्यक बहुमत हासिल करने की जद्दोजहद तेज़ है। कई वार्डों में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, इसलिए निर्दलीय पार्षदों की भूमिका निर्णायक बन गई है। अलवर में बीजेपी ने 28, कांग्रेस ने 23 वार्ड जीते, जबकि बाकी सीटें स्वतंत्र और छोटे दलों के पास गईं। इसी कारण दोनों पार्टियों ने अपने विजयी पार्षदों को अलग‑अलग रिसॉर्ट में रखकर उनकी राय को स्थिर करने की कोशिश की है।
रिज़ॉर्ट में ठहराए गए पार्षदों को अक्सर बोर्ड गठन के दौरान पाला बदलने से रोकने के लिये इस्तेमाल किया जाता है। जयपुर, अलवर और कई छोटे नगरों में रिपोर्टें आईं कि दोनों दलों ने अपने‑अपने पार्षदों को लक्ज़री होटल या रिसॉर्ट में इकट्ठा किया, जहाँ रणनीति मीटिंग और गठबंधन चर्चा होती है। कांग्रेस के नेता टीकाराम जूली ने भी अलवर में अपने पार्षदों को होटल में इकट्ठा कर बोर्ड बनाने की योजना बनाई, जबकि भाजपा ने भी इसी तरह की कवायद की।
इन कदमों के कारण ‘पार्षद चोरी’ के आरोपों की बाढ़ आ गई है। विपक्ष का कहना है कि सत्ता पक्ष के लोग दूसरे दलों के विजयी पार्षदों को अपने साथ लाने की कोशिश कर रहे हैं। इस सिलसिले में कई जगहों पर पार्षदों की बाड़ाबंदी (रिज़ॉर्ट में बंदी) का मुद्दा उभरा। जयपुर में फॉरेस्ट विभाग की टीम को रिसॉर्ट में रखे कांग्रेस पार्षदों को निकालने के लिये भेजा गया, जिससे हंगामा हुआ। इसी तरह राजगढ़, बहरोड़ और नीमराणा में भी पार्षदों को जबरन ले जाने या हिरासत में रखने की घटनाएँ सामने आईं।
बहरोड़ में वार्ड‑7 के निर्दलीय प्रत्याशी रेखा अग्रवाल के पति संजय अग्रवाल को पुलिस ने गिरफ्तार किया, जिससे दो दिन तक हंगामा रहा। नीमराणा में सुमन देवी के प्रतिनिधि चंदन सैनी को होटल से लेकर थाने तक ले जाने पर स्थानीय लोगों ने विरोध किया, थाने का घेराव कर दिया और सैनी को छोड़ने की माँग की।
इन सभी घटनाओं के बीच कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने पुलिस अधीक्षक कार्यालय का रुख किया, जहाँ उन्होंने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि पुलिस का उपयोग पार्षदों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए किया जा रहा है। निर्दलीय पार्षदों ने भी इसी बात को दोहराया और आरोप लगाए।
राजस्थान में निकाय चुनाव के बाद चल रही इस ‘रिज़ॉर्ट पॉलिटिक्स’ की लहर ने स्थानीय राजनीति को नई दांव पर लगा दिया है। करोड़ों की बोली, बाड़ाबंदी और ‘पार्षद चोरी’ के आरोपों के बीच बोर्ड गठन का खेल अब और अधिक जटिल और तीव्र हो गया है।
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