अमेरिकी सैन्य बल अब लेज़र सिस्टम को वास्तविक युद्ध परिदृश्य में इस्तेमाल कर रहा है। पेंटागन ने पुष्टि की कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ईरानी ड्रोन और संभावित क्रूज़ मिसाइलों को उच्च‑ऊर्जा लेज़र से मार गिराया गया है। पारंपरिक इंटरसेप्टर मिसाइलों की तुलना में इस तकनीक की लागत कई गुना कम है।
जहाँ एक पारंपरिक मिसाइल लाखों डॉलर की कीमत रखती है, वहीं लेज़र शॉट की कीमत सिर्फ बिजली के खर्च के बराबर है। यही कारण है कि यह तकनीक जल्दी ही आकर्षक विकल्प बन गई है। इसी समय, अमेरिकी दक्षिणी सीमा पर कार्टेल द्वारा तस्करी के लिए इस्तेमाल की जा रही छोटे ड्रोन के खिलाफ भी लेज़र का परीक्षण चल रहा है।
ड्रग तस्करी और निगरानी के लिए उपयोग होने वाली छोटी ड्रोनें अब महंगे इंटरसेप्टर या रॉकेट से नहीं, बल्कि सस्ते लेज़र बीम से नष्ट की जा रही हैं। दशकों के शोध‑विकास के बाद लेज़र हथियार प्रयोगशाला से बाहर निकल कर युद्ध के मैदान में तैनात हो गया है।
लेज़र सिस्टम कैसे काम करता है? उच्च‑ऊर्जा लेज़र एक तीव्र किरण उत्पन्न करता है, जिसे लक्ष्य पर केंद्रित किया जाता है। यह किरण सेंसर, पंख और संरचनात्मक हिस्सों को जलाकर नुकसान पहुंचाती है। ड्रोन या तेज‑गति वाले मिसाइल जैसे छोटे लक्ष्य इस विधि से प्रभावी रूप से नष्ट हो जाते हैं। पारंपरिक गोला‑बारूद की तुलना में लेज़र को केवल बिजली की जरूरत होती है, जिसे जहाज या जमीनी वाहन पर लगे जनरेटर से लगातार प्रदान किया जा सकता है।
अमेरिकी आर्मी ने हाई‑एनर्जी लेज़र सिस्टम के लिए 50 करोड़ डॉलर का ठेका दिया है, जो दर्शाता है कि यह तकनीक अब प्रयोगात्मक चरण से निकल कर वास्तविक तैनाती के स्तर पर पहुँच गई है। ऑपरेटर इन सिस्टम को निशाना बनाने के लिए री‑कन्फ़िगर्ड एक्सबॉक्स कंट्रोलर का इस्तेमाल कर रहे हैं—एक सस्ता, आसानी से उपलब्ध और सैनिकों के लिए परिचित गेमिंग कंट्रोलर, जिससे प्रशिक्षण समय भी कम हो रहा है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज विश्व के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है, जहाँ लगातार ईरानी ड्रोन और मिसाइलों का खतरा बना रहता है। पारंपरिक रक्षा प्रणालियों की लागत अधिक और स्टॉक सीमित होने के कारण लेज़र सिस्टम एक किफायती समाधान पेश करता है। यह न केवल ड्रोन बल्कि कम ऊँचाई पर उड़ने वाली क्रूज़ मिसाइलों को भी प्रभावी ढंग से निशाना बना सकता है, जिससे लंबी अवधि तक निरंतर रक्षा संभव हो जाती है।
दक्षिणी सीमा पर स्थिति अलग है। यहाँ मुख्य चुनौती छोटी, कम ऊँचाई वाली ड्रोनें हैं, जो तस्करी के लिए इस्तेमाल होती हैं। पारंपरिक हथियार इनके खिलाफ अक्सर बेकार साबित होते हैं, जबकि लेज़र सटीक और कम कोलेटरल डैमेज वाला विकल्प प्रदान करता है। दोनों क्षेत्रों में चल रहे परीक्षणों से सेना को यह समझ में आया है कि विभिन्न परिस्थितियों में लेज़र कितनी कारगर है।
फायदे और चुनौतियाँ
सबसे बड़ा फायदा लागत में है—एक लेज़र शॉट की कीमत कुछ ही डॉलर में सिमट जाती है, जबकि एक इंटरसेप्टर मिसाइल कई लाख डॉलर की हो सकती है। दूसरा फायदा गति का है; प्रकाश की गति से चलने वाला लेज़र लक्ष्य को चकमा देना लगभग असंभव बना देता है। तीसरा, गोला‑बारूद खत्म होने की चिंता नहीं रहती।
हालांकि, कुछ चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं। खराब मौसम, धूल, धुंध या बारिश लेज़र की प्रभावशीलता घटा सकते हैं। उच्च‑ऊर्जा सिस्टम को ठंडा रखने के लिए उन्नत कूलिंग की जरूरत होती है, और निरंतर बिजली सप्लाई भी अनिवार्य है। इन सीमाओं के बावजूद तकनीक तेज़ी से आगे बढ़ रही है और सेना इसे व्यावहारिक बना रही है।
निर्देशित ऊर्जा हथियार भविष्य के युद्ध की तस्वीर बदल सकते हैं। ड्रोन स्वार्म—एक साथ कई ड्रोन के झुंड—के खिलाफ पारंपरिक हथियार अक्सर अपर्याप्त साबित होते हैं, जबकि लेज़र एक‑के‑बाद‑एक लक्ष्य को तेज़ी से निपटा सकता है। समुद्री जहाजों, जमीनी ठिकानों और यहाँ तक कि विमानों पर भी इनकी तैनाती बढ़ने की उम्मीद है।
एक्सबॉक्स कंट्रोलर जैसी आम वस्तु का इस्तेमाल यह दर्शाता है कि सेना व्यावहारिक और किफायती समाधान अपनाने पर ज़ोर दे रही है। इससे न केवल लागत घटती है, बल्कि सैनिकों के लिए सिस्टम चलाना भी आसान हो जाता है। पेंटागन का मानना है कि दशकों की रिसर्च अब ठोस नतीजे दे रही है।
कुल मिलाकर, अमेरिकी सेना द्वारा लेज़र सिस्टम का उपयोग सैन्य तकनीक में बड़ा बदलाव दर्शाता है। होर्मुज से लेकर दक्षिणी सीमा तक इसका सफल प्रयोग साबित करता है कि निर्देशित ऊर्जा हथियार अब कल्पना नहीं, बल्कि वास्तविकता बन चुके हैं। आने वाले वर्षों में इन प्रणालियों की संख्या और क्षमता दोनों में वृद्धि होने की संभावना है, जो न केवल अमेरिका बल्कि विश्व भर की सैन्य रणनीतियों को पुनः आकार दे सकती है।
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