इन दिनों मैं अक्सर सोचता हूं कि अगर विभाजन की पीड़ा को अपनी रचनाओं में दर्ज करने वाले हमारे अनेक महान लेखक और कवि आज हिंदुस्तान की जमीन पर लौट आएं, तो उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी? मेरे मन में सबसे पहले सआदत हसन मंटो, राजिंदर सिंह बेदी, अमृता प्रीतम और राही मासूम रजा के नाम आते हैं। चारों की भाषा अलग थी, अनुभव अलग थे, संवेदना के रास्ते अलग थे, लेकिन उनके साहित्य के केंद्र में एक ही चीज थी- मनुष्य। उन्होंने विभाजन को नक्शे पर खिंची एक रेखा की तरह नहीं देखा था। उनके समय विभाजन घरों के भीतर घुस आया था। रिश्तों को तोड़ रहा था। प्रेम को संदेह में बदल रहा था और सबसे बढ़कर मनुष्य के भीतर से मनुष्यता को निकाल देने की कोशिश कर रहा था।
मुझे लगता है, मंटो आज लौटते, तो सबसे पहले किसी राजनीतिक मंच पर नहीं जाते। वह सड़क पर निकलते, लोगों को देखते, बातचीत सुनते। शायद चुपचाप मुस्कुराते। मुस्कान, जिसमें करुणा होती और व्यंग्य भी। कोई उनसे पूछता, ‘मंटो साहब, क्या आपको लगता है कि आज के हालात विभाजन के दौर से बदतर हैं?’ शायद वह जवाब देते, ‘विभाजन में कम-से-कम लोगों को मालूम था कि मुल्क बांटा जा रहा है। अब कई लोग अपने पड़ोसी को बांट रहे हैं और इसे राष्ट्रभक्ति कह रहे हैं।’
फिर शायद वह ‘टोबा टेक सिंह’ को याद करते। बिशन सिंह को, जो हिंदुस्तान और पाकिस्तान की सरहद के बीच खड़ा होकर पूछता है कि उसका देश आखिर है कहां? मंटो शायद आज बिशन सिंह को पागलखाने में नहीं, बल्कि हमारे बीच देखते। कभी किसी टीवी स्टूडियो में, कभी किसी सोशल मीडिया की बहस में, कभी किसी भीड़ में और कभी उस नागरिक की आंखों में, जो अपने ही देश में अपनी निष्ठा का प्रमाण देने के लिए मजबूर है। मंटो शायद कागज निकालकर फिर लिखना शुरू करते। इस बार कहानी किसी पागलखाने की नहीं होती। शायद पूरी बस्ती ही उनका पागलखाना होती। आखिरी पंक्ति में वह शायद पूछते, ‘पागल कौन है, यह तय करना अब पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल क्यों हो गया है?’
लेखक राजिंदर सिंह बेदी शायद इस दृश्य को किसी दूसरे ढंग से देखते। वह किसी घर के भीतर चले जाते। किसी पुराने संदूक में रखे खत देखते, दीवार पर टंगी तस्वीर देखते, रसोई में रखे बर्तन देखते। वह जानते थे कि इतिहास सबसे गहरी चोट अक्सर घरों के भीतर करता है। वो शायद पूछते, ‘यह तस्वीर किसकी है?’ जवाब मिलता, ‘पड़ोसी की।’ ‘अब कहां है?’ ‘दूसरे शहर चला गया।’ ‘क्यों?’ इस सवाल का कोई एक उत्तर नहीं होता। बेदी समझ जाते।
वह उन छोटी-छोटी दरारों को देखते, जिन्हें हम सामान्य जीवन का हिस्सा समझकर अनदेखा कर देते हैं। एक-दूसरे के घर जाने में झिझक, त्योहारों की शुभकामना में सावधानी, बच्चों को कुछ लोगों से दूर रहने की सलाह, नाम पूछने से पहले उपनाम पूछना। बेदी शायद कहते कि दंगा केवल सड़क पर नहीं होता। वह पहले भाषा में प्रवेश करता है, फिर स्मृति में और अंततः आदमी के भीतर।
यही आज त्रासदी है। हिंसा केवल हिंसा नहीं रह गई है; उसका सामाजिक सामान्यीकरण हो रहा है। नफरत केवल भीड़ में नहीं दिखाई देती, वह शब्दों में उतरती है, मजाक में बदलती है, चुनावी भाषण में जगह पाती है और धीरे-धीरे हमारे रोजमर्रा के व्यवहार का हिस्सा बन जाती है। विभाजन ने हमें बताया था कि मनुष्य को दूसरे मनुष्य से अलग करने की शुरुआत कितनी छोटी हो सकती है और उसका अंत कितना भयानक।
अमृता प्रीतम शायद पंजाब की ओर जातीं। किसी नदी के किनारे बैठतीं और शायद वारिस शाह को फिर पुकारतीं, लेकिन इस बार उनकी पुकार केवल पंजाब के लिए नहीं होती। उनकी निगाहें देश के उन तमाम हिस्सों तक जातीं, जहां पहचान स्त्री के शरीर पर लिखी जा रही है, जहां प्रेम को धर्म और जाति की चौखट पर रोका जा रहा है, जहां स्त्री के कपड़े, भोजन या जीवन के चुनाव को सामुदायिक अस्मिता का प्रश्न बना दिया जाता है। शायद अमृता पूछतीं, ‘वारिस शाह, मैंने तुम्हें उस समय पुकारा था, जब पंजाब की धरती पर औरतें रो रही थीं। आज फिर वैसी ही आवाजें आ रही हैं। क्या तुम सुन पा रहे हो?’ और फिर शायद उन्हें यह एहसास होता कि विभाजन के इतने समय बाद भी औरतों के हिस्से का डर अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। राजनीति बदल गई, सीमाएं बदल गईं, सरकारें बदल गईं, लेकिन स्त्री का शरीर अब भी अक्सर सामुदायिक बदले और प्रतिष्ठा का मैदान बना दिया जाता है।
राही मासूम रजा शायद सबसे ज्यादा बेचैन होते। वह अपने गाजीपुर की ओर लौटते। अपने गांव की गलियों में जाते। उन चेहरों को खोजते, जिनमें कभी धर्म से पहले पड़ोसी होने की पहचान थी। शायद पूछते, ‘किसने तुम्हें बताया कि तुम्हारा पड़ोसी पहले हिंदू या मुसलमान है और बाद में पड़ोसी?’ उन्हें अपना ‘आधा गांव’ याद आता। वह शायद देखते कि गांव कभी विभाजन में आधा हुआ, लेकिन आज हम फिर अपने गांव, शहर और समाज को अलग-अलग खानों में बांटने की कोशिश कर रहे हैं। वह शायद कहते, ‘मुल्क का नक्शा एक बार बनता है, पर मुल्क के भीतर जो नक्शे बनते हैं, वे रोज बनते हैं।’ और यहीं आकर मंटो, बेदी, अमृता और राही की काल्पनिक आवाजें एक-दूसरे में घुलने-मिलने लगती। चारों शायद अलग-अलग रास्तों से चलते हुए एक ही प्रश्न तक पहुंचते हैं- क्या हमने विभाजन से कुछ सीखा?
यही वह बिंदु है, जहां विभाजन हमारे लिए इतिहास की एक तारीख भर नहीं रह जाता। एक चेतावनी बन जाता है। वह हमें याद दिलाता है कि किसी समाज का विघटन अचानक नहीं होता। वह भाषा से शुरू होता है। फिर स्मृतियों को बदला जाता है। फिर पड़ोसी संदेह का पात्र बनता है और नागरिकों के बीच बराबरी की जगह निष्ठा के प्रमाण मांगे जाने लगते हैं। और अंततः एक ऐसा समाज तैयार हो जाता है, जहां मनुष्य को पहले उसकी पहचान से देखा जाता है और बाद में मनुष्य के रूप में।
वापिस आने पर ये भी पूछते कि क्या एक लोकतंत्र में किसी नागरिक को बार-बार यह साबित करने की जरूरत होनी चाहिए कि वह इस देश का उतना ही नागरिक है, जितना कोई दूसरा? क्या किसी समुदाय की संबद्धता कुछ वर्षों में फिर से प्रमाणित की जानी चाहिए? क्या बहुसंख्यक की उदारता को अल्पसंख्यक की सुरक्षा का आधार बनाया जा सकता है? बराबरी का अधिकार किसी कृपा का परिणाम नहीं, संविधान का वादा है? मंटो शायद इस पूरे विमर्श को देखकर फिर मुस्कुराते। उन्हें शायद आश्चर्य होता कि आज भी हम यह तय करने में लगे हैं कि कौन कितना देशभक्त है? शायद कहते, ‘जिस मुल्क को अपने नागरिकों से बार-बार उनकी देशभक्ति का प्रमाण मांगना पड़े, उसे अपने नागरिकों से ज्यादा खुद पर भरोसा करने की जरूरत है।’
शायद मंटो, बेदी, अमृता और राही आज लौटकर बस यही कहते कि धर्म, जाति, भाषा और समुदाय हमारी पहचानें हो सकती हैं, पर मनुष्य की अंतिम पहचान नहीं।
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