केके गौरव, संवाददाता, भागलपुर, हिन्दुस्तान। बिहार की जेलों में लंबे समय से बंद कैदियों के बीच मानसिक विकृति (साइकोसिस) के लक्षण दिखने लगे हैं। मानसिक संतुलन खो चुके कई बंदी अजीबोगरीब हिंसक व्यवहार कर रहे हैं। कोई तनाव और अवसाद में अपनी ही अंगुली चबा रहा है, तो कोई बैरक में साथ रह रहे दूसरे बंदियों को दांत काट रहा है। राज्य की 39 जेलों में चलाए गए विशेष जांच अभियान के बाद विभाग को सौंपी गई रिपोर्ट में 113 बंदी आंशिक रूप से मानसिक बीमारी से ग्रसित पाए गए हैं।
450 की संख्या में प्रारंभिक अवसाद तनाव के शिकार पाए गए हैं। बंदियों के लिए विशेष मानसिक जांच, इलाज और काउंसिलिंग की व्यवस्था शुरू की जा रही है। सहरसा मंडल कारा की क्षमता वर्तमान में बढ़कर 805 हो गई है। अभी 897 बंदी है। बेउर जेल अधीक्षक राजीव कुमार ने बताया कि जेल में क्षमता से अधिक बंदी है। मुंगेर में बंदियों के रखने की क्षमता 1142 है। लेकिन अभी बंदियों की संख्या मात्र 600 है।
सीमांचल के प्रमुख जेलों में शुमार सेंट्रल जेल पूर्णिया में सबसे अधिक मानसिक रोग से पीड़ित बंदी हैं। पहले इस जेल में मानसिक रोग से पीड़ित बंदियों की संख्या 30-35 थी। सेंट्रल जेल के अधीक्षक मनोज कुमार ने बताया कि इन दिनों जेल में 14-15 मानसिक रोग से पीड़ित बंदी है। इनकी विशेष देखभाल की जा रही है। इस जेल में बंदियों की रहने की क्षमता 1308 है। लेकिन अभी 2108 बंदी हैं।
विशेष केंद्रीय कारा भागलपुर में क्षमता से कम बंदी है। यहां 3288 की जगह मात्र 1208 बंदी ही हैं। मानसिक रूप से बीमार बंदियों को इलाज के लिए आरा, अलवर भेजा जाता है। बेंगलुरु के मीमांसा में राज्य के सभी जेल स्टाफ को प्रशिक्षित करवाया जा रहा है। कुछ जेलों में क्षमता से अधिक तो कहीं क्षमता से कम बंदी हैं। - जितेंद्र कुमार, निदेशक, बीका हाजीपुर, पटना।
मानसिक बीमारियों के शिकार होने वाले बंदियों में सबसे अधिक हत्या के मामलों में सजा काट रहे या विचाराधीन बंदियों की संख्या है। उम्रकैद या फांसी के खौफ, अपराधबोध, सामाजिक अलगाव और जेल के अंदरूनी दबाव के कारण इन कैदियों का मानसिक संतुलन सबसे जल्दी डगमगा रहा है।
मनोरोग विशेषज्ञ साझी झा कहती हैं कि जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों का होना, मामलों के निष्पादन में देरी, लंबे समय तक परिजनों से दूरी और एकाकीपन इसकी मुख्य वजहे हैं। नियमित काउंसिलिंग, गतिविधियों में व्यस्तता आदि से इसे ठीक किया जा सकता है।
जवानी में हत्या के मामले में जेल में आया बंदी फिट था। लेकिन लंबे समय तक जेल के सलाखों के पीछे रहने के कारण कई तरह के गंभीर रोग के शिकार हो रहे हैं। इनमें मानसिक रोग से पीड़ित की संख्या काफी अधिक है। दरअसल, अकेलापन, काम या सामाजिक भूमिका का खत्म होना और प्रियजनों से नहीं मिलने का दुख बंदियों को डिप्रेशन की ओर धकेल रहा है। लंबे समय से जेल में रहने वाले बंदियों में डिप्रेशन केवल उदासी नहीं, बल्कि याददाश्त में कमी और भटकाव के रूप में भी सामने आ रहा है।
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