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चार साल का इंतजार। ‘KGF: Chapter 2’ के बाद यश की वापसी.. नाम ‘टॉक्सिक’। ट्रेलर में बंदूकें, ग्लैमर, सर्कस, खून-खराबा और रॉकिंग स्टार यश। लगा था इस बार थिएटर में कुछ बड़ा होने वाला है।फिर फिल्म देखी...अब लगता है कि चार साल इंतजार करवाना भी शायद फिल्म का हिस्सा था। तीन घंटे से ज्यादा की इस फिल्म से बाहर निकलते हुए पहला सवाल यही आता है- आखिर कहना क्या चाहते थे? फिल्म खूबसूरत दिखती है, बड़े सेट हैं...विजुअल्स हैं, VFX है, एक्शन है। बस एक छोटी-सी चीज गायब है- वह चीज जिसके लिए ज्यादातर लोग फिल्म देखने जाते हैं - कहानी।
कहानी 1940 से 1970 के दशक के गोवा में सेट है। अपराध, स्मगलिंग और सत्ता की दुनिया के बीच राया (यश) अपना साम्राज्य खड़ा करता है। कहानी उसके माता- पिता और बहन गंगा (नयनतारा) के साथ उसके रिश्ते को भी दिखाती है।
राया की जिंदगी में नादिया (कियारा आडवाणी) आती है। वहीं एलिजाबेथ (हुमा कुरैशी), टोनी (अक्षय ओबेरॉय), रेबेका (तारा सुतारिया) और मेलिसा (रुक्मिणी वसंत) जैसे किरदार उसकी दुनिया का हिस्सा बनते हैं।
कागज पर पिता-पुत्र, भाई-बहन, प्यार, धोखा, अपराध और सत्ता- मसाला पूरा है। लेकिन पर्दे पर आते-आते गोलियां, ग्लैमर, आपत्तिजनक दृश्य और एक्शन इतना बढ़ जाता है कि कहानी को अपनी जगह ही नहीं मिलती।
फिल्म खुद को ‘A Fairytale for Grown-Ups’ कहती है। यहां राजकुमार के हाथ में तलवार नहीं, सिर्फ बंदूक है।
यश राया और उसके बेटे रूमी, दोनों का डबल रोल निभाते हैं। उनका स्वैग है, चाल है, लुक है, एक्शन है। फैंस को सीटी बजाने के लिए पूरा सामान दिया गया है। लेकिन उनके किरदार बिल्कुल समझ नहीं आते...
यश कभी गुस्से में हैं, कभी आशिक हैं, कभी भाई हैं, कभी बाप हैं और फिर अगले ही सीन में किसी की धुनाई कर रहे हैं। इमोशंस आने ही वाली होती है कि कैमरा घूमता है और साहब फिर से स्टाइल में खड़े हैं।
नयनतारा जैसी अभिनेत्री से उम्मीद थी कि वह कहानी को भावनात्मक वजन देंगी, लेकिन उनका किरदार देखकर लगता है कि इतनी बड़ी अभिनेत्री को भी फिल्म ने कह दिया.... आप बस भाई को संभालिए, भारी-भरकम डायलॉग बोलिए... बाकी हम देखते हैं।
कियारा आडवाणी की बात करें तो कैमरे ने उन्हें बहुत प्यार दिया है। इतना प्यार कि कई बार लगता है कि नादिया किरदार नहीं, फिल्म की ग्लैमर एम्बेसडर हैं।
सर्कस, ग्लैमरस कपड़े, मर्मेड एक्ट, एरियल एक्ट, खूबसूरत शॉट्स- सबकुछ है। बस किरदार को हल्का और विस्तार से लिख दिया जाता तो शायद ऑडियंस और भी खुश होतीं।
हुमा कुरैशी, तारा सुतारिया, अक्षय ओबेरॉय, संजीदा शेख और रुक्मिणी वसंत जैसे कलाकारों को देखकर लगता है कि कास्टिंग डायरेक्टर ने बहुत मेहनत की थी। फिर स्क्रीनप्ले ने आकर सबकी मेहनत से कहा- थैंक यू, अब आप पीछे बैठिए।
गीतू मोहनदास ने फिल्म को छोटा सोचकर नहीं बनाया। सर्कस, गोवा, बड़े सेट, एक्शन और विजुअल्स.. हर चीज को बड़े स्तर पर दिखाने की कोशिश की गई है। लेकिन निर्देशन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सिर्फ फिल्म को भव्य दिखाना नहीं...कहानी को दर्शक तक पहुंचाना भी होती है। और यहीं फिल्म सबसे ज्यादा कमजोर पड़ती है।
फिल्म में इतने स्टाइलिश शॉट हैं कि कई बार लगता है आप फिल्म नहीं, किसी महंगे फैशन शूट का एक्सटेंडेड वर्जन देख रहे हैं।
एक शॉट देखकर मन में आता है- वाह..दूसरा शॉट- वाह..तीसरा- अच्छा..चौथा- अब होगा क्या? और फिर कोई गोली चल जाती है। सवाल पूछो तो गोली... कहानी ढूंढो तो एक्शन..इमोशंस खोजो तो ग्लैमर। यही ‘टॉक्सिक’ है।
फिल्म की असली दुश्मन कोई विलेन नहीं, इसकी राइटिंग है।
पिता-पुत्र का रिश्ता है...भाई-बहन का इमोशनल एंगल है। प्यार है..धोखा है..अपराध है..सत्ता है। इतना सामान है कि एक अच्छी फिल्म आराम से बन सकती थी।
एक सीन खत्म होता है तो अगला सीन शुरू। अगला खत्म होता है तो तीसरा। किरदार क्या कर रहा है, क्यों कर रहा है, उसके पीछे भावना क्या है- इन सबके बारे में सोचने का मौका फिल्म देती ही नहीं।
तीन घंटे से ज्यादा की फिल्म में समय बहुत है...लेकिन स्क्रीनप्ले के पास उसे इस्तेमाल करने का तरीका नहीं है।
रणबीर कपूर की एनिमल में हिंसा पर खूब बहस हुई, लेकिन वहां वह किरदार की मानसिकता से जुड़ी थी। इस फिल्म में कई जगह हिंसा बस तमाशा लगती है।
यश को मारने सात-आठ लोग आते हैं और सबकी निशानेबाजी ऐसी कि लगता है हीरो को गोली मारने से पहले अनुमति लेनी पड़ रही है। भाई, कभी तो गोली सही जगह चला दो..
रवि बसरूर केा म्यूजिक इतना तेज है कि कई जगह लगता है फिल्म आपसे बात नहीं कर रही, आप पर चिल्ला रही है।
अब फिल्म की तारीफ कर देते हैं, क्योंकि आखिर कुछ तो है।
राजीव रवि की सिनेमैटोग्राफी शानदार है। फिल्म देखने में महंगी लगती है और कई फ्रेम सच में कमाल के हैं।
सर्कस का सेटअप, गोवा की दुनिया, एक्शन और यश के क्लोजअप अच्छे लगते हैं। VFX और प्रोडक्शन डिजाइन भी फिल्म को बड़ा स्केल देते हैं।
यश के फैन हैं? जाइए। यश की एंट्री मिलेगी, स्वैग मिलेगा, बंदूकें, लड़ाई, ग्लैमर और स्लो मोशन भी मिलेगा। बस कहानी मत ढूंढिएगा।
लेकिन चार साल से यह सोचकर बैठे थे कि यश इस बार कोई दमदार, याद रहने वाली फिल्म लेकर आएंगे, तो निराशा होगी...बहुत निराशा। तकनीकी तौर पर फिल्म मजबूत है, लेकिन बिखरी राइटिंग, कमजोर डायलॉग, खराब एडिटिंग और उलझा स्क्रीनप्ले सब पर भारी पड़ जाता है। यश की स्क्रीन प्रेजेंस और कुछ अच्छे सीन ही गिनी-चुनी अच्छी बातें हैं।
यश ने मेहनत पूरी की है, लेकिन फिल्म उनकी मेहनत के साथ न्याय नहीं कर पाती। तीन घंटे से ज्यादा तक बैठकर इसे झेलने के बाद कहानी याद रहे न रहे, टॉर्चर जरूर याद रहता है।
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