दलित समाज को मिल रहे आरक्षण पर केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी और चिराग पासवान के बीच टकराव अब इस्तीफे की मांग तक पहुंच गई है। चिराग पासवान ने आरक्षण की समीक्षा से साफ इनकार किया है तो जीतन राम मांझी के बेटे संतोष सुमन ने दलित आरक्षण की समीक्षा करते हुए इसकी व्यवस्था में सब कोटा तय करने की मांग की है। इस पर लोजपा आरवी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान ने हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के जीतन राम मांझी और उनके बेटे संतोष सुमन को इस्तीफा देने की चुनौती दी है। इस विवाद में राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्या ने एंट्री ले ली है। सोशल मीडिया पोस्ट उन्होंने दोनों नेताओं को लंबी चौड़ी नसीहत दी है।
सोशल मीडिया हैंडल एक्स पर रोहिणी आचार्य ने बड़ा सा लेख लिखकर कहा है कि समाज में गैर बराबरी रहने तक आरक्षण जरूरी है। उन्होंने कहा है कि जब तक सामाजिक और आर्थिक गैर बराबरी कायम है, तब तक आरक्षण की व्यवस्था की किसी प्रकार की समीक्षा उचित नहीं है। आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था केवल एक कल्याणकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत में सदियों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव और असमानता को दूर करने का एक संवैधानिक तथा संरचनात्मक माध्यम है। जब भी 'आरक्षण की समीक्षा' की बात उठती है, तो इसे केवल प्रशासनिक या आर्थिक नजरिए से देखने की बजाय इसके पीछे के सामाजिक न्याय के सिद्धांत को समझना आवश्यक है।
रोहिणी आचार्या ने आगे लिखा है कि आरक्षण का प्राथमिक उद्देश्य सिर्फ गरीबी दूर करना नहीं, बल्कि उन समुदायों की शासन, प्रशासन, शिक्षा और लोकतांत्रिक व्यवस्था की मुख्यधारा में भागीदारी (प्रतिनिधित्व) सुनिश्चित करना है , जिन्हें मुख्यधारा से रूप से दूर रखा गया। जब तक सभी वर्गों का आनुपातिक प्रतिनिधित्व हासिल नहीं होता, सामाजिक व् आर्थिक समरसता कायम नहीं होती, गैर बराबरी की खाई पाटी नहीं जाती , तब तक इसके स्वरूप को बदलना अनुचित होगा।
उन्होंने कहा है कि कागजी प्रगति के बावजूद जमीनी स्तर पर जातिगत भेदभाव और सामाजिक - आर्थिक असमानता देश में आज भी मौजूद है। आरक्षण वंचित वर्गों को सुरक्षात्मक कवच प्रदान करता है , ताकि वे बिना किसी पक्षपात एवं अवरोध के आगे बढ़ सकें। देश का संविधान (विशेष रूप से अनुच्छेद 15 और 16) अवसरों की समता और सामाजिक न्याय की गारंटी देता है। वर्तमान आरक्षण व्यवस्था बाबा साहेब डॉक्टर बी.आर. अंबेडकर जी और संविधान सभा के उस दृष्टिकोण का परिणाम है जो वंचितों के सशक्तिकरण को राष्ट्र निर्माण की पहली शर्त मानता है।
मांझी पिता-पुत्र को उन्होंने संदेश दिया है कि आरक्षण की समीक्षा के किसी भी प्रयास से अक्सर वंचित वर्गों की सामाजिक सुरक्षा और अधिकारों में कटौती किए जाने की संभावना बनी ही रहती है। अतः आरक्षण के वर्तमान प्रावधानों को बिना किसी उप वर्गीकरण और समीक्षा के यथावत बनाए रखना सामाजिक संतुलन,न्याय और लोकतंत्र की समावेशी भावना को सुदृढ़ रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
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