इमेज स्रोत, Getty Images
ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन यानी आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा जुलाई महीने में दिल्ली के जंतर मंतर पर शुरू हुए आंदोलन के बाद उभरीं.
कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके भी इसी आंदोलन के बाद राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आए. दोनों युवा नेता हैं लेकिन दोनों के संगठन अलग-अलग हैं. दोनों कई बार विरोध प्रदर्शन भी अलग-अलग कर चुके हैं.
ऐसे में सोशल मीडिया पर कई लोग उनकी तुलना भी करने लगते हैं कि कौन ज़्यादा परिपक्व है. शनिवार को कुछ ऐसी ही पोस्ट सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई और इन पोस्ट पर दीपके के साथ नेहा ने भी जवाब दिया है.
अमोक नाम के एक एक्स यूज़र ने नेहा बोरा की तस्वीर लगाकर लिखा, ''परिपक्वता तब है, जब आपको एहसास हो कि नेहा बोरा, अभिजीत दीपके से ज़्यादा प्रतिभाशाली हैं. वह जेन ज़ी की एकदम आइकॉन हैं और उनका स्वैग ग़ज़ब का है.'' इस पोस्ट को रीपोस्ट करते हुए अभिजीत ने लिखा है- मैं इससे सहमत हूँ.
इस पोस्ट के कुछ देर बाद ही नेहा ने एक्स पर लिखा, ''तुलना नहीं, एकजुटता. हम इसके खिलाफ मिलकर लड़ते हैं.'' इसके जवाब में अभिजीत ने लिखा- इंक़लाब ज़िंदाबाद.''
लेकिन कई लोग ऐसे भी हैं जो दोनों को एक साथ देख रहे हैं. अर्थशास्त्री जयती घोष ने एक्स पर लिखा है, ''भारत के भविष्य की हमारी उम्मीदें नेहा बोरा और अभिजीत दीपके जैसे निडर और प्रतिबद्ध युवाओं पर टिकी हैं.''
इमेज स्रोत, Getty Images
सीजेपी के सह-समन्वयक आशुतोष रांका ने एक पोस्ट में लिखा है कि ख़ुद को उदारवादी कहने वाले लोग अभिजीत को ख़ारिज करने में लगे हैं.
उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा है, ''ख़ुद को उदारवादी कहने वाला इकोसिस्टम अभिजीत दीपके की आलोचना करने के लिए सक्रिय हो गया है और इस बात से भी परेशान है कि लंबे समय बाद वह लाखों भारतीयों की कल्पना और ध्यान को अपनी ओर खींचने में कामयाब रहे हैं. मज़ेदार बात यह है कि यह पूरा इकोसिस्टम सिर्फ़ ट्विटर पर मौजूद है, लेकिन किसी तरह उसे लगता है कि लोकतंत्र की रक्षा करने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उसी की है.''
आशुतोष की इस पोस्ट को रीपोस्ट करते हुए सीजेपी नेता सौरभ दास ने लिखा है, ''यह बहुत बड़ी समस्या है. एक ख़ास वर्ग सिर्फ़ बीजेपी नहीं, बल्कि एक दूसरी पार्टी भी ऐसा मानती है कि "भारत को बचाना और संविधान को बचाना" सिर्फ़ उसी की ज़िम्मेदारी है. वे ख़ुद को उदारवादी और संविधान का स्वयंभू ठेकेदार मानते हैं.''
''यह एक बेहद कड़वाहट भरा इकोसिस्टम है, जो कभी-कभी बीजेपी के इकोसिस्टम से भी ज़्यादा आक्रामक नज़र आता है. उन्हें समझना चाहिए कि ऐसी रणनीतियों के ज़रिए वे लोगों को बाँटकर अपना प्रभाव कायम नहीं रख सकते. पिछले कई वर्षों में उनकी भारी नाकामियों ने हमें इस स्थिति तक पहुँचाया है, जहाँ अब युवाओं को रास्ता दिखाना पड़ रहा है. इसलिए उन्हें हमारे बारे में चुप रहना चाहिए और युवाओं को समर्थन देने के तरीक़े पर ध्यान देना चाहिए. ये पूरी तरह नासमझ लोग हैं.''
इमेज स्रोत, Getty Images
देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां.
अभिजीत दिपके ने इसी साल मई में 'कॉकरोच जनता पार्टी' को शुरू किया था. यह सोशल मीडिया अकाउंट मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की उस टिप्पणी के जवाब में व्यंग्य के तौर पर शुरू किया गया था, जिसमें उन्होंने देश के कुछ बेरोज़गार युवाओं को "कॉकरोच" कहा था. हालांकि बाद में सफ़ाई दी थी और कहा था कि उनकी टिप्पणी को ग़लत तरीक़े से पेश किया गया.
छात्रों के बीच पहचान बनाने से पहले दीपके डिजिटल पॉलिटिकल मैसेज, नैरेटिव तैयार करने और ऑनलाइन कैंपेन की रणनीति पर काम के लिए जाने जाते थे. उन्होंने पुणे से पत्रकारिता में ग्रैजुएशन की डिग्री हासिल की है और बोस्टन यूनिवर्सिटी से पब्लिक रिलेशंस में दो साल की मास्टर डिग्री की है.
कई दिनों तक ऑनलाइन छात्रों के समर्थन में आवाज़ उठाने के बाद दीपके इसी साल जून महीने में भारत लौटे और जंतर-मंतर पर सीजेपी के पहले प्रदर्शन का नेतृत्व किया. इसके बाद दूसरे शहरों में भी इसी तरह के प्रदर्शन हुए. फिर सीजेपी ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर व्यापक प्रदर्शन शुरू किया, जिसमें नीट-यूजी पेपर लीक और अन्य परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर जवाबदेही की मांग की गई. धर्मेंद्र प्रधान के शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफ़े की घोषणा के बाद दीपके ने एक्स पर लिखा था, "अब थोड़ी देर के लिए झपकी लेने जा रहा हूँ. आप सभी से थोड़ी देर में मिलता हूँ."
इमेज स्रोत, Getty Images
जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन अनशन करने वाले सोनम वांगचुक अकेले नहीं थे. ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन के तीन छात्र भी उनके साथ थे. इनमें नेहा बोरा, मनीष कुमार और आमीन अमितोज शामिल थे. इनका अनशन वांगचुक के अनशन से पहले ख़त्म हो गया था.
नेहा बोरा जेएनयू में पीएचडी रिसर्चर हैं. जंतर मंतर पर विरोध प्रदर्शन को लेकर नेहा ने फ़्रंटलाइन से एक इंटरव्यू में कहा था, ''जंतर-मंतर पर भी बड़ी संख्या में जो पोस्टर लगाए गए थे. उनमें कहा गया था, "आप गोडसे में विश्वास करते हैं, हम भगत सिंह में विश्वास करते हैं. यही आपके और मेरे बीच मूल अंतर है और इसी वजह से आपको जाना चाहिए." लोगों ने लगातार यह बात कही कि जो लोग गोडसे में विश्वास करते हैं, वे इस देश पर शासन नहीं करेंगे.
''इसमें आरएसएस की उस विरासत की बात की जा रही थी, जिसमें उस पर लोगों के साथ विश्वासघात करने के आरोप लगाए जाते हैं. इसमें कहा जा रहा था कि वे गोडसे के पक्ष में खड़े हैं और हम भगत सिंह के पक्ष में. इसमें इस बात पर चर्चा हो रही थी कि उनकी विभाजन की राजनीति ने देश को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया है, जहां पेपर लीक कोई बड़ी बात नहीं रह जाती, लेकिन हिंदू-मुसलमान का नैरेटिव अचानक लोगों का पूरा ध्यान खींच लेता है. लोग लगातार इन मुद्दों पर बात कर रहे थे.''
नेहा ने कहा था, ''मुझे लगता है कि इन प्रदर्शनों ने यह दिखाया कि देश के युवा अब मौजूदा सत्ता से क्या नहीं चाहते. मुझे लगता है कि इस आंदोलन ने जो कुछ दिया, इस आंदोलन ने हम सभी को जो सबक सिखाए, वे इस बात से कहीं आगे थे कि फासीवादियों से भी जवाबदेही तय कराई जा सकती है. इसी वजह से जब मैं भूख हड़ताल से वापस आई और माइक पर बोल रही थी, तो मैंने यही कहा था: युवाओं को इस भावना को याद रखना चाहिए - अभी जो महसूस हो रहा है, एक-दूसरे के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि एक-दूसरे के लिए लड़ने की भावना. पिछले 12 वर्षों में हमने यही जाना है.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.
प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
शॉर्ट वीडियो का अंत
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
© 2026 BBC. बाहरी साइटों की सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है. बाहरी साइटों का लिंक देने की हमारी नीति के बारे में पढ़ें.
Comments ()
Be the first to share your perspective on this story!