दलितों के आरक्षण में कोटा और सब-कोटा के मुद्दे पर एनडीए के बड़े नेता और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और जीतनराम मांझी के बीच मचे घमासान पर भाजपा के नेता और सम्राट चौधरी सरकार में एससी-एसटी कल्याण मंत्री लखेंद्र पासवान ने इशारों में सहयोगी पार्टियों के नेताओं को ही लपेट लिया है। लखेंद्र पासवान ने कहा कि दलित का नेता बनने की होड़ लगी है। भाजपा के मंत्री ने दावा किया कि जब तक नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं, तब तक आरक्षण को कोई छू भी नहीं सकता।
लखेन्द्र पासवान ने सोमवार को पटना में पत्रकारों से बातचीत में कहा कि जो नेता आरक्षण को लेकर बयानबाजी कर रहे हैं, उनको बताना चाहिए कि अपने परिवार के अलावा उन्होंने किसका भला किया है। उन्होंने कहा कि जीतनराम मांझी और चिराग पासवान केंद्रीय मंत्री के रूप में यह अच्छी तरह से जानते हैं कि मौजूदा सरकार में आरक्षण किसी भी सूरत में खत्म नहीं हो सकता। लेकिन, लगातार बहस और बयानबाजी की जा रही है ताकि खुद को दलितों का नेता साबित कर सकें। मंत्री ने कहा कि इन्हें लगता है कि आरक्षण का मुद्दा उठा देने से दलितों का नेता बन जाएंगे। वह नेता बनें लेकिन, ईमानदारी भी बनाए रखें।
लखेंद्र पासवान ने जीतनराम मांझी को संबोधित करते हुए पूछा कि क्या अपने परिवार का मोह त्याग सकते हैं? मांझी जी दावा करते हैं कि 18 जातियों को अब तक आरक्षण का लाभ नहीं मिला तो उन्हें बताना चाहिए कि परिवार से बाहर किस दलित का भला उन्होंने कर दिया। मुसहर समाज के चार-पांच अन्य लोगों को राजनीति की मुख्य धारा में ला सकते हैं क्या?
लखेंद्र पासवान का बयान ऐसे दौर में आया है जब दलित आरक्षण के कोटे में सब कोटा की मांग उठ रही है। मांझी के पुत्र और बिहार सरकार में मंत्री संतोष सुमन का कहना है कि दलितों में कुछ जाति के लोगों तक ही आरक्षण का लाभ पहुंचा। इन जागरुक जातियों के लोग आरक्षण के बल पर काफी आगे निकल गए। मांझी के बेटे ने कहा कि उनकी पार्टी आरक्षण खत्म करने बात नहीं करती क्योंकि यह वंचितों का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन, इसकी समीक्षा करते हुए सब कोटा निर्धारित करना चाहिए ताकि जो समुदाय पीछे छूट गए हैं, उन्हें आगे निकलने का मौका मिले।
इस मुद्दे पर केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी का कहना है कि दलितों में ही हमारे कुछ भाई आगे निकल गए और मजबूत हो गए। मुसहर जैसी गरीब जातियों को आरक्षण की व्यवस्था का पूरा लाभ नहीं मिल पाया क्योंकि मजबूत जातियों ने इसका अधिकांश भाग अपने हिस्से में कर लिया। इन जातियों को पढ़ाई, नौकरी, सरकारी योजना या राजनीति में आबादी और जरूरत के अनुसार प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया। मोतिहारी में आयोजित दलित सम्मेलन में उन्होंने कहा कि हमारे बड़े भाई को अपने छोटे भाइयों को आगे बढ़ाने के लिए कुछ त्याग करना चाहिए। उन्होंने दिल्ली तक इसकी लड़ाई लड़ने का ऐलान किया। वे अभी भी अपनी बात पर अड़े हैं कि कोटे के अंदर सब कोटा मिलना चाहिए क्योंकि चार पांच राज्यों में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर यह व्यवस्था लागू है तो बिहार में क्यों नहीं हो सकता। जो लोग इसका विरोध करते हैं वे अपने मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए थे। आरक्षण में वर्गीकरण बहुत जरूरी है।
इधर चिराग पासवान आरक्षण की समीक्षा पर कुछ भी सुनने को तैयार नहीं हैं। जो लोग आरक्षण की समीक्षा की बात करते हैं या ऐसी सोच रखते हैं वे इस पूरी व्यवस्था को समाप्त करना चाहते हैं। सामाजिक न्याय की सोच के साथ आरक्षण का प्रावधान किया गया है जिसे सामाजिक भेदभाव के आधार पर बनाया गया है। कोई इस व्यवस्था में छेड़छाड़ करने की सोचेगा भी तो देश की एक बड़ी आबादी सड़क पर आ जाएगी जिसे संभालना मुश्किल होगा। समीक्षा तो दूर की बात है, आज इस पर चर्चा किया जाना भी स्वीकार नहीं है।
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