"अपनी जड़ें छोड़ना बहुत मुश्किल होता है. लेकिन रोज़ी-रोटी के लिए हम यहां आ गए. शुरुआत में बहुत मुश्किलें झेलीं, लेकिन भगवान का शुक्र है कि अब यहां हम खुशहाल हैं."
ये शब्द 75 साल की सीता कौर के हैं. वह अपने परिवार के साथ गुजरात के कच्छ ज़िले के नरा गांव में रहती हैं.
सीता कौर कहती हैं कि अगर वह पंजाब में रहतीं तो उनके पास अपनी ज़मीन नहीं होती. लेकिन सरकार ने उन्हें यहां ज़मीन दी और अपनी मेहनत से उन्होंने इसे खेती के लायक बना लिया.
भारत-पाकिस्तान सीमा के पास उत्तर कच्छ में बसा नरा गांव लखपत तालुका में आता है. बड़ी संख्या में पंजाबी परिवार रहने की वजह से इसे 'पंजाबियों का गांव' और कच्छ का 'मिनी पंजाब' भी कहा जाता है.
यहां सबसे पहले 1970 के दशक में पंजाबी परिवार आकर बसे थे. इनमें सीता कौर का परिवार भी शामिल था.
आज नरा और उसके आसपास हरियाली दिखाई देती है. खेतों में फ़सलें लहलहाती हैं.
लेकिन एक समय था, जब यह पूरा इलाक़ा बंजर पड़ा था. खारी ज़मीन और सूखे रण की वजह से यहां खेती करना बेहद मुश्किल था.
80 साल के खजान सिंह साल 1972 में पंजाब के फ़िरोज़पुर ज़िले के एक गांव से यहां आए थे. सरकार ने उन्हें जंगल जैसी ज़मीन दी थी.
इस ज़मीन को खेती के लायक बनाने के लिए उन्हें और उनके परिवार को लंबे समय तक मेहनत करनी पड़ी.
खजान सिंह बताते हैं कि जब वह नरा गांव आए थे तो यहां कुछ भी पंजाब जैसा नहीं था. ज़मीन रेतीली थी और चारों तरफ़ कीकर के पेड़ और झाड़ियां उगी हुई थीं.
यहां आने के बाद उन्होंने सबसे पहले रहने के लिए एक झोपड़ी बनाई. इसके बाद खेती शुरू करने के लिए संघर्ष का दौर शुरू हुआ.
शुरुआत में उन्होंने अपने हाथों से कीकर के पेड़ उखाड़े. बाद में बैल ख़रीदे और उनकी मदद से खेती शुरू की.
आज खजान सिंह का परिवार खेती के लिए ट्रैक्टरों का इस्तेमाल करता है. लेकिन परिवार ने उस समय खेत जोतने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले कुछ पुराने औज़ार अब भी संभालकर रखे हैं.
खजान सिंह के मुताबिक़, "यहां सबसे बड़ी समस्या पानी की थी. पानी का कोई इंतज़ाम नहीं था. इसलिए कुआं खोदा और पानी का इंतज़ाम किया."
पीने का पानी लाने के लिए लोगों को कई किलोमीटर दूर से टैंकर मंगाने पड़ते हैं. आज यह इलाक़ा भले ही हरा-भरा हो गया है, लेकिन यहां का पानी अब भी खारा है.
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खजान सिंह की पत्नी सीता कौर बताती हैं कि उनकी पूरी ज़िंदगी संघर्ष करते हुए बीती है.
जब वह यहां आई थीं तो शुरुआत में उनका मन नहीं लगता था. लेकिन धीरे-धीरे काम में दिन बीतते गए और यहीं उनकी ज़िंदगी बस गई.
वह कहती हैं, "अब तो यहां खुशहाली है, लेकिन शुरुआती दिनों में हर क़दम पर संघर्ष करना पड़ता था. जंगल इतना घना था कि रास्ते में निशान लगाकर जाना पड़ता था. ऐसा नहीं करते तो लौटते समय रास्ता भूलने का डर रहता था."
सीता कौर के मुताबिक़, "उन दिनों बहुत ग़रीबी भी थी. अगर घर में दूध ख़त्म हो जाता तो काली चाय पीकर गुज़ारा करना पड़ता था. पहले घर के काम पूरे करने पड़ते थे और फिर पति के साथ खेतों में काम करना पड़ता था."
पुराने समय को याद करते हुए सीता कौर कहती हैं, "गांव से शहर जाने के लिए कोई रास्ता नहीं था. पहले 10 किलोमीटर पैदल चलकर एक कस्बे तक जाना पड़ता था. वहां से बस मिलती थी."
आज उनके घर में सुख-सुविधा की हर चीज़ मौजूद है. लेकिन जब वह यहां आई थीं तो उनके पास कुछ भी नहीं था. वे लोग लगभग खाली हाथ यहां आए थे.
पंजाब में रहने वाले रिश्तेदारों से संपर्क करना भी आसान नहीं था. कई बार एक साल बाद कोई चिट्ठी आती थी. तभी एक-दूसरे के हाल और सुख-दुख का पता चलता था.
कुछ महीनों बाद परिवार के बाक़ी सदस्य भी यहां आ गए. इसके बाद उनका मन यहां लग गया.
इस समय गांव में दो गुरुद्वारे हैं.
क़रीब 2,100 की आबादी वाले नरा गांव के सरपंच भी पंजाबी हैं. उनका नाम जुगराज सिंह राजू है.
उनके परिवार के बुज़ुर्ग भी 1970 के दशक में फ़िरोज़पुर से आकर यहां बसे थे.
जुगराज सिंह के मुताबिक़, "गांव में रोज़मर्रा की बातचीत के लिए पंजाबी और गुजराती, दोनों भाषाओं का इस्तेमाल होता है."
उन्होंने बताया कि नई पीढ़ी के ज़्यादातर युवा पगड़ी पहनते हैं. गांव के लोग दिवाली और गुरुपर्व मिलकर मनाते हैं.
गांव के ज़्यादातर लोग खेती पर निर्भर हैं. हालांकि, कुछ युवा अब ट्रांसपोर्ट और दूसरे कारोबार भी करने लगे हैं.
गुजरात के कच्छ ज़िले में पंजाबी मुख्य रूप से दो तरीक़ों से आकर बसे. पहले वे किसान थे, जिन्हें सरकार ने एक ख़ास नीति के तहत ज़मीन देकर यहां बसाया था.
दरअसल, साल 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई लड़ाई के बाद पंजाबियों ने गुजरात के कच्छ इलाक़े का रुख़ करना शुरू किया.
इसके पीछे एक वजह सीमावर्ती इलाक़े की सुरक्षा थी. दूसरी वजह कच्छ के इस हिस्से में लोगों को बसाना था.
इसके लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के किसानों को यहां ज़मीन दी. दूसरे लोगों को यहां ज़मीन ख़रीदने की इजाज़त भी दी गई.
दूसरे वे किसान थे, जिनके पास पंजाब में बहुत कम ज़मीन थी. पंजाब में छोटे किसानों के लिए गुज़ारा करना मुश्किल हो रहा था.
इसलिए संगरूर, मोगा, लुधियाना, फ़िरोज़पुर और माझा इलाक़े के किसान सस्ती और ज़्यादा ज़मीन की तलाश में कच्छ आए.
इन किसानों ने कम क़ीमत पर ज़मीनें ख़रीदीं और अपनी मेहनत से उन्हें खेती के लायक बनाया. कच्छ में पंजाबी किसानों के पास औसतन 25 एकड़ या इससे ज़्यादा ज़मीन होने की बात सामने आती है.
किसानों ने कई साल मेहनत करके कच्छ की रेतीली, खारी और बंजर ज़मीन को हरा-भरा कर दिया. इसके लिए उन्होंने ट्यूबवेल, बोरवेल और खेती की आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया.
आज भुज के आसपास की पंजाबी पट्टी में कपास, अरंडी, गेहूं, मूंगफली, सरसों और खजूर की खेती होती है. ज़्यादातर किसान खेतों में पानी देने के लिए ड्रिप सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं.
कच्छ ज़िले का मुख्यालय भुज है. यह एक बड़ा शहर है. भुज से करीब 80 किलोमीटर दूर कोथारा गांव है. यह गुजरात का एक बड़ा कस्बे जैसा गांव है.
इसके आसपास खेतों और ढाणियों में पंजाबी परिवार रहते हैं. कच्छ की स्थानीय भाषा में ढाणी को 'वाड़ी' कहा जाता है.
कोथारा से थोड़ी दूरी पर गड़वाड़ा गांव है. यहां रामनदीप सिंह की ढाणी या वाड़ी है. रामनदीप सिंह का संबंध पंजाब से है. उनका पुश्तैनी गांव तखरां है.
उनके परिवार के बुज़ुर्गों ने साल 1978 में गुजरात के कच्छ ज़िले में 25 रुपये प्रति किल्ले के हिसाब से ज़मीन ख़रीदी थी.
तखरां पंजाब के लुधियाना ज़िले के माछीवाड़ा ब्लॉक का एक गांव है.
रामनदीप सिंह बताते हैं, "हमारे बुज़ुर्गों ने यहां 25 रुपये प्रति किल्ले के हिसाब से जंगल जैसी ज़मीन ख़रीदी थी. "बाद में इसे खेती के लायक बनाने में हमारे बुज़ुर्गों की एक पूरी पीढ़ी लग गई. तब जाकर यह ज़मीन खेती के लायक बन पाई."
करीब 120 किल्ले में खेती करने वाले रामनदीप सिंह बताते हैं कि तखरां गांव में उनके पास बहुत कम ज़मीन थी. इसलिए उनके पिता सस्ती ज़मीन की तलाश में कच्छ आ गए थे.
शुरुआत में उन्होंने 50 किल्ले ज़मीन ख़रीदी थी. यह ज़मीन बंजर थी और जंगल से ढकी हुई थी.
वह कहते हैं, "हमारे बुज़ुर्गों ने अपने हाथों से पेड़ उखाड़े. कड़ी मेहनत करके ज़मीन को खेती के लायक बनाया. इलाक़े में पानी की भी कमी थी. इससे निपटने के लिए उन्होंने अपने हाथों से खुदाई की और पानी का इंतज़ाम किया."
खेती के साथ रामनदीप सिंह अपने छोटे भाई के साथ मिलकर डेयरी का काम भी करते हैं. उनके पास करीब 150 पशु हैं.
वह बताते हैं कि डेयरी का काम खेती के साथ अतिरिक्त काम के रूप में किया जाता है. कच्छ में लगभग हर पंजाबी किसान खेती के साथ पशुपालन भी करता है.
रामनदीप सिंह के छोटे भाई यादविंदर सिंह के मुताबिक़, पंजाब के मुक़ाबले यहां खेती करना मुश्किल है.
वो बताते हैं, "इसकी सबसे बड़ी वजह पानी की कमी है. इसलिए यहां ज़्यादातर किसान फ़सलों की सिंचाई के लिए ड्रिप सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं."
गुजरात में जन्मे यादविंदर सिंह बताते हैं कि 120 किल्ले में खेती करने के लिए वे तीन ट्रैक्टर इस्तेमाल करते हैं. इनमें एक 4×4 ट्रैक्टर भी है.
बीबीसी पंजाबी की टीम ने देखा कि गुजरात में रहने वाले ज़्यादातर पंजाबी किसान खेतों में बने घरों में रहते हैं.
घरों की छतों पर लैंटर की जगह सीमेंट की चादरें लगी हुई हैं. आमतौर पर घरों के चारों तरफ़ दीवार भी नहीं होती.
संगरूर ज़िले से संबंध रखने वाले प्रिथी सिंह यहां करीब 100 किल्ले में खेती करते हैं. उन्होंने यह ज़मीन 1990 के दशक में ख़रीदी थी.
प्रिथी सिंह के मुताबिक़, पंजाब में उनके पास बहुत कम ज़मीन थी.
यहां आने के बाद उन्होंने पहले कुछ ज़मीन ख़रीदी. इसके बाद धीरे-धीरे ज़मीन बढ़ती गई और आज उनके पास करीब 100 किल्ले ज़मीन है.
उनके मुताबिक़, "कच्छ का मौसम भले ही सूखा है, लेकिन पंजाब के मुक़ाबले यहां शांति है. पंजाब की तरह यहां आढ़ती व्यवस्था नहीं है और ज़्यादातर लेन-देन नक़द होता है."
उन्होंने बताया कि अगर किसी पंजाबी किसान को पैसों की ज़रूरत पड़ती है तो यहां रहने वाले पंजाबी मिलकर उसकी मदद करते हैं.
पंजाब की तरह गुजरात में फ़सल बेचने के लिए मंडियों की वैसी व्यवस्था नहीं है. यहां व्यापारी ख़ुद किसान के घर आते हैं. वे फ़सल ख़रीदकर ले जाते हैं.
कोथारा गांव के सूरता सिंह करीब 50 किल्ले में खेती करते हैं.
वह बताते हैं कि किसान फ़सल को खेत से घर लाता है. व्यापारी फ़सल की गुणवत्ता देखकर उसकी क़ीमत तय करता है. किसानों को फ़सल की क़ीमत नक़द दी जाती है.
खेतों में काम करने वाले मज़दूरों को मेहनताने के रूप में फ़सल का चौथा हिस्सा दिया जाता है.
लंबे समय से कच्छ में रहने की वजह से यहां बसे पंजाबी अब गुजराती और कच्छ की स्थानीय भाषा कच्छी बोल और समझ लेते हैं.
आमतौर पर पंजाबी परिवारों के बच्चे गुजरात के स्थानीय स्कूलों में पढ़ते हैं. इस वजह से रोज़मर्रा की बातचीत में वे गुजराती बोलते हैं.
कच्छ में रहने वाले पंजाबी बताते हैं कि घरों और गुरुद्वारों में आमतौर पर पंजाबी बोली जाती है.
सरकारी दफ़्तरों और खेतों में स्थानीय मज़दूरों से गुजराती में बात की जाती है.
यादविंदर सिंह बताते हैं कि जब उनके परिवार के बुज़ुर्ग पहली बार यहां आए थे तो भाषा की वजह से काफ़ी परेशानी हुई. लेकिन समय के साथ यह परेशानी दूर होती गई. अब हालात ये हैं कि नई पीढ़ी गुजराती संस्कृति और परंपराओं को भी अपनाने लगी है.
भुज में हरजिंदर सिंह सिद्धू गुजराती युवाओं को डांडिया सिखाते हैं.
हरजिंदर सिंह सिद्धू का जन्म अमृतसर में हुआ था. लेकिन परिवार के कारोबार की वजह से वह छोटी उम्र में ही भुज आ गए थे.
वह बताते हैं कि गुजराती लोग पंजाबी गायकों के गाने बहुत पसंद करते हैं. ख़ास तौर पर वे सिद्धू मूसेवाला और दिलजीत दोसांझ के गानों के शौकीन हैं.
काफ़ी समय पहले स्थानीय सरकार ने यहां के पंजाबी किसानों की ज़मीनों से जुड़े खाते फ्रीज़ कर दिए थे.
इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ पंजाबी किसानों ने पहले हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक लंबी क़ानूनी लड़ाई लड़ी.
गुजरात के इन किसानों के मामले की पैरवी प्रिथी सिंह ने की थी.
वह बताते हैं कि 'फ़िलहाल मामला अदालत में लंबित है और संकट टला हुआ है.'
हालांकि, ज़मीन से जुड़े खाते फ्रीज़ होने की वजह से किसानों को सरकारी सब्सिडी नहीं मिल पा रही है. वे अपनी ज़मीन पर क़र्ज़ भी नहीं ले सकते.
उन्होंने यह भी बताया कि इस समय गुजरात में खेती के लिए दूसरे राज्यों के लोगों के ज़मीन ख़रीदने पर रोक लगी हुई है.
कच्छ ज़िले के कोथारा, मांडवी, नखत्राणा, दयापुर और नरा गांवों में पंजाबी किसान रहते हैं.
कुछ पंजाबी कारोबारी भुज में भी रहते हैं. लेकिन पंजाबी किसानों की बड़ी आबादी कोथारा और उसके आसपास के गांवों में रहती है.
साल 2011 की जनगणना के मुताबिक़, कच्छ में पंजाबियों की कुल आबादी करीब 6,000 है.
यह स्थानीय आबादी का केवल 0.3 फ़ीसदी है.
इस वजह से पंजाबी ज़िला स्तर, विधानसभा या लोकसभा चुनावों में फ़ैसला करने वाली भूमिका नहीं निभाते.
सरपंच होने के कारण केवल जुगराज सिंह उर्फ़ राजू भाई स्थानीय राजनीति में सक्रिय हैं.
वह बीजेपी के कच्छ ज़ोन के महासचिव हैं. साल 2023 में उन्हें लखपत तालुका पंचायत का उपाध्यक्ष चुना गया था. यह पहली बार था, जब गुजरात में कोई पंजाबी इस पद तक पहुंचा था.
प्रिथी सिंह आम आदमी पार्टी से जुड़े हुए हैं.
वह बताते हैं कि यहां पंजाबियों का राजनीति की ओर झुकाव कम है. इसकी वजह यह है कि वे खेती और अपने काम में व्यस्त रहते हैं.
इसके अलावा पंजाबियों की संख्या कम है और वे अलग-अलग जगहों पर दूर-दूर रहते हैं. इस वजह से उनके वोट भी बंट जाते हैं.
इसी कारण फ़िलहाल कच्छ की स्थानीय राजनीति में पंजाबी समुदाय की अहमियत सीमित है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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