पिता के जिंदा रहते क्या पोता दादा की जमीन पर अपना हक जता सकता है? राजस्थान में जमीन के ऐसे ही एक मामले में पोते ने अपने पिता और चाचा को दादा की 75 बीघा जमीन बेचने को हाईकोर्ट में चुनौती दी। पोते का दावा था कि दादा की जमीन में उसका भी हिस्सा है और उसकी सहमति के बिना जमीन नहीं बेची जा सकती। लेकिन मामला सिर्फ दादा की जमीन होने तक सीमित नहीं था। सवाल यह था कि दादा की मृत्यु के बाद उनके बेटों को मिली जमीन क्या पोते के लिए पैतृक संपत्ति बनी या पिता की पर्सनल विरासत होगी?
राजस्थान हाईकोर्ट ने दादा की जमीन पर पोते के अधिकार को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ किया कि केवल इस आधार पर कि जमीन उसके दादा की थी, पोता उस पर अपना जन्मसिद्ध या पैतृक अधिकार नहीं जता सकता। अगर दादा की मृत्यु बिना वसीयत के होती है और उनकी संपत्ति हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 8 के तहत उनके क्लास-I उत्तराधिकारियों को मिलती है, तो बेटे के हिस्से में आई संपत्ति उसकी पर्सनल विरासत मानी जाएगी। ऐसी स्थिति में पिता के जीवित रहते बेटा यानी पोता उस प्रॉपर्टी या जमीन की सेल पर आपत्ति नहीं जता सकता।
यह मामला राजस्थान के जैसलमेर की 75 बीघा जमीन से जुड़ा है। सरकार ने यह जमीन चुतरा राम को राजस्थान लैंड रेवेन्यू एक्ट 1956 की धारा 101 के तहत आवंटित की थी। 24 अप्रैल 2004 को चुतरा राम की बिना वसीयत मृत्यु हो गई। इसके बाद उनकी जमीन उनके तीन बेटों खेताराम, रामाराम और लच्छूराम को बराबर हिस्सों में मिली।
इसके करीब 21 साल बाद 17 अप्रैल 2025 को खेताराम ने अपने भाइयों के साथ मिलकर जमीन मध्य प्रदेश के एक खरीदार को बेच दी। खेताराम के बेटे देवाराम ने इस सेल का विरोध किया। उसका कहना था कि जमीन में उसका भी 1/9 हिस्सा है और जमीन बेचने से पहले उससे सहमति नहीं ली गई। मामला राजस्थान हाईकोर्ट पहुंचा, लेकिन 20 अगस्त 2026 को कोर्ट ने देवाराम की अपील खारिज कर दी।
कोर्ट के सामने सबसे अहम सवाल यह था कि क्या चुतरा राम की जमीन उनके पोते देवाराम के लिए पैतृक थी। कोर्ट ने कहा कि देवाराम यह साबित नहीं कर सका कि जमीन हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) की संपत्ति थी या चुतरा राम ने इसे एचयूएफ के कर्ता के तौर पर रखा था।
सिर्फ परिवार में जमीन का दादा से बेटे और फिर पोते तक आना इसे अपने आप पैतृक संपत्ति नहीं बना देता। कोर्ट ने कहा कि अगर संपत्ति धारा 8 के तहत किसी बेटे को मिलती है, तो वह उसे अपनी पर्सनल हैसियत में हासिल करता है। उसके बेटे को उस संपत्ति में सिर्फ जन्म लेने के कारण तत्काल अधिकार नहीं मिल जाता।
इस मामले में चुतरा राम की मृत्यु के बाद उनके तीन बेटों को जमीन में एक-तिहाई हिस्सा मिला। खेताराम को मिला हिस्सा उनकी पर्सनल विरासत बना। इसलिए खेताराम के जीवित रहते देवाराम उस हिस्से में अपना जन्मसिद्ध अधिकार नहीं जता सकता था।
देवाराम ने यह दलील भी दी कि जब उसके दादा की मृत्यु हुई थी, तब वह नाबालिग था। हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी वारिस का नाबालिग होना उत्तराधिकार खुलने और संपत्ति के कानूनी रूप से वारिसों में जाने की प्रक्रिया को नहीं बदलता।
इस फैसले का सीधा मतलब यह है कि हर वह जमीन जो दादा से पिता को मिली हो, जरूरी नहीं कि पोते की पैतृक संपत्ति हो। अगर दादा की संपत्ति उनकी मृत्यु के बाद हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के तहत पिता को मिली है और उसे एचयूएफ साबित नहीं किया गया है, तो पिता अपने हिस्से का मालिक होता है। ऐसी स्थिति में पिता के जीवित रहते पोता उस जमीन में अपना जन्मसिद्ध हिस्सा बताकर उसकी सेल को चुनौती नहीं दे सकता।
कोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के उत्तम और सौभाग सिंह (2016) के फैसले के सिद्धांतों का भी सहारा लिया। साथ ही कृषि भूमि में खतेदारी अधिकार से जुड़े दावे के लिए राजस्व अदालत की भूमिका भी अहम मानी गई। देवाराम ने अपना खतेदारी अधिकार पहले राजस्व अदालत से घोषित नहीं कराया था, इसलिए सेल रद्द कराने के लिए दायर सिविल मुकदमे में भी उसकी स्थिति मजबूत नहीं हो सकी।
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