हर साल लाखों नौजवान अपनी आंखों में यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा की फाइनल लिस्ट में अपना नाम देखने का ख्वाब देखते हैं। कई लोगों के लिए यह सफर सालों की लंबी तैयारी, अनगिनत कोशिशों और मायूसियों से होकर गुजरता है। लेकिन श्रेया झा की कहानी थोड़ी अलग है। उनकी कामयाबी की बुनियाद में है एक साफ मकसद, लगातार कुछ नया सीखने की चाहत और अटूट फोकस। साल 2025 के यूपीएससी नतीजे जब आए, तो श्रेया ने ऑल इंडिया रैंक (AIR) 357 हासिल कर अपना सपना सच कर दिखाया। कानून, पब्लिक पॉलिसी और गवर्नेंस जैसी चीजों को लेकर उनकी जो किताबी दिलचस्पी थी, उसे उन्होंने एक शानदार कामयाबी में तब्दील कर दिया। एक लॉ ग्रेजुएट होने के नाते, उन्होंने इस परीक्षा को सिर्फ एक रेस या इम्तिहान की तरह नहीं देखा। उनके लिए यह एक ऐसा मौका था जिसके जरिए वो अवाम की सेवा करने के अपने असल मकसद तक पहुंच सकती थीं।
मूल रूप से बिहार की रहने वाली श्रेया का बचपन देश के अलग-अलग हिस्सों में बीता। उनके पिता एक बैंकर हैं और उनके काम के सिलसिले में परिवार को कई शहरों का रुख करना पड़ा। गुवाहाटी से लेकर कोलकाता, रायपुर और अहमदाबाद जैसे शहरों में उनके शुरुआती साल गुजरे। इसके बाद अपनी आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने दिल्ली का रुख किया। एक बातचीत में श्रेया ने कहा, "पिता की नौकरी की वजह से मुझे देश के कोने-कोने में रहने का मौका मिला। इन अनुभवों ने मुझे किताबों से बाहर निकलकर हिंदुस्तान की असली विविधता को समझने में बहुत मदद की।" आगे चलकर दिल्ली की गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी से उन्होंने बीए एलएलबी (ऑनर्स) की डिग्री हासिल की। यहीं से उनके मन में यह बात घर कर गई कि प्रशासन और नीतियां कैसे आम आदमी की जिंदगी को बदल सकती हैं।
अक्सर उम्मीदवारों के पास कोई एक खास वाकया या रोल मॉडल होता है, जिसे देखकर वो आईएएस बनने की ठानते हैं। मगर श्रेया का फैसला धीरे-धीरे उनके जहन में पुख्ता हुआ। वकालत की पढ़ाई के दौरान वो इस बात को लेकर काफी सोचने लगीं कि हमारे देश के संस्थान काम कैसे करते हैं और कानून का समाज पर क्या असर होता है। उनका मानना है कि सिविल सर्विस एक ऐसा अनोखा मंच है, जो आपको अलग-अलग सेक्टर्स में काम करने का मौका देता है। चाहे वो टैक्स का मामला हो, आर्थिक नीतियां हों या फिर सीधे तौर पर जनता तक सरकारी योजनाएं पहुंचाना हो।
सबसे खास बात यह रही कि श्रेया ने पहली बार ही मेन्स और इंटरव्यू का सामना किया और कामयाबी का परचम लहरा दिया। उन्होंने किसी बने-बनाए ढर्रे पर चलने के बजाय, परीक्षा की मांग को समझा। प्रीलिम्स के लिए उन्होंने अपनी बुनियाद मजबूत करने पर जोर दिया। इसके लिए स्टैण्डर्ड किताबें पढ़ीं, जमकर रिवीजन किया और पिछले सालों के पेपर्स के साथ-साथ मॉक टेस्ट को अपना हथियार बनाया। जब बात मेन्स की आई, तो उनका पूरा ध्यान आंसर राइटिंग पर था। उन्होंने सिलेबस के हिसाब से पढ़ाई की और अपने जवाबों में केस स्टडीज, ताज़ा घटनाओं और बेहतरीन उदाहरणों का खूब इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा, "लॉ मेरा ऑप्शनल था, इसलिए मैंने कानूनी सिद्धांतों को आज के दौर के अहम फैसलों और घटनाओं के साथ जोड़कर लिखने पर फोकस किया।"
हैरानी की बात यह है कि श्रेया की यह शानदार कामयाबी मुख्य रूप से सेल्फ-स्टडी का ही नतीजा है। उन्होंने बड़ी-बड़ी कोचिंग संस्थानों पर निर्भर रहने के बजाय खुद पर भरोसा किया। अनुशासन के साथ पढ़ाई, बार-बार रिवीजन और यूपीएससी की डिमांड को समझना—यही उनका असली मंत्र रहा। उनकी यह कहानी उन हजारों उम्मीदवारों के लिए एक बड़ी उम्मीद है, जिनके पास महंगी कोचिंग की सुविधा नहीं है। यूपीएससी का इंटरव्यू सबसे मुश्किल माना जाता है। लेकिन श्रेया के लिए यह अनुभव बहुत ही शानदार रहा। उनके मुताबिक, बोर्ड का रवैया काफी दोस्ताना था। वहां कानून, पब्लिक पॉलिसी, और देश-दुनिया से जुड़े मुद्दों पर लंबी चर्चा हुई। श्रेया ने इसे सिर्फ फैक्ट्स रटने का टेस्ट नहीं माना, बल्कि इसे अपनी संतुलित सोच और जागरूकता पेश करने का एक बेहतरीन मौका समझा।
यूपीएससी की तैयारी का सफर दिमागी तौर पर काफी थका देने वाला होता है। श्रेया के लिए खुद को तरोताजा रखने का काम किताबों और कुकिंग ने किया। उन्हें इतिहास पढ़ना बहुत पसंद है। इसके अलावा, लंबे समय तक पढ़ाई करने के बाद कुकिंग करना उन्हें काफी सुकून देता है। उनका मानना है कि इस लंबे सफर में कोई न कोई शौक पालना बहुत अहम है, क्योंकि यह आपके दिमाग को शांत रखता है।
अपनी इस कामयाबी के बाद श्रेया की सलाह बहुत ही सीधी और व्यावहारिक है। उनका कहना है, "यूपीएससी लगातार मेहनत, सही फैसले और बेइंतहा सब्र का इम्तिहान है। मेरी सलाह यही होगी कि इस परीक्षा को फतह करने से पहले, इसे गहराई से समझने की कोशिश करें।" वो मानती हैं कि सुधार अचानक नहीं होता, यह एक धीमी प्रक्रिया है जिसका अहसास आपको बाद में होता है। श्रेया झा का यह सफर साबित करता है कि कामयाबी किसी बैकग्राउंड या शॉर्टकट की मोहताज नहीं होती। अगर फंडे क्लियर हों और इरादे पक्के हों, तो मंजिल मिल ही जाती है।
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